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चीन के बाजारवादी अर्थव्यवस्था की थकावट (आॅस्ट्रेलिया का वित्तीय संकट)

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पिछले दो दशक से चीन दुनिया के बाजारवादी आर्थिक विकास की पटरी पर दौड़ने वाली रेल में इंजन का काम किया। उस दौरान उसका अपना आर्थिक विकास दर 8 से 15 प्रतिशत के बीच था। उसने दुनिया के प्राकृतिक संसाधन खनिज सम्पदा से लेकर उत्पादन के सभी स्त्रोतो का उपयोग किया। उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी ऐसी अर्थव्यवस्था बन गयी, जिसने मुद्रा बाजार में अपनी मुद्रा युआन को अमेरिकी डाॅलर के विरूद्ध अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में पेश किया, और विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी वैश्विक वित्तीय इकाईयों के समानान्तर वित्तीय इकाई ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैक‘ की स्थापना की। यही नहीं उसने मुक्त व्यापार के वैकल्पिक व्यवस्था और बहुध्रुवी विश्व की अवधारणां को भी अपना समर्थन एवं सहयोग दिया। दुनिया भर में उसने द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय आर्थिक एवं कूटनीतिक तथा सामरिक समझौते किये। रूस और तीसरी दुनिया के देशों को अपना सहयोगी बनाया।

चीन 20 साल के भीतर ही विश्व का बड़ा निवेशक और निर्यातक देश बन गया। चीन के विकास से जुड़े देशों और निजी कम्पनियों -उत्पादक देश आौर उत्पादक कम्पनियों- ने चीन से करोड़ों-करोड़ डाॅलर की कमाईयां की। चीन के आर्थिक विकास का लाभ जिन देशों को मिला आॅस्ट्रेलिया भी उनमें से एक है। उसकी अर्थव्यवस्था एक सीमा तक चीन की अर्थव्यवस्था पर निर्भर हो गयी है।

आज चीन का विकास दर घट कर 3 प्रतिशत के करीब पहुंच गया है, जो कि उसके 8 से 15 प्रतिशत के विकास दर के अनुपात में भारी गिरावट हैं अपनी अर्थव्यवस्था में आयी सुस्ती और गिरावट को रोकने के लिये जो कदम चीन की सरकार उठा रही है, उसकी प्रतिक्रिया विश्व भर में हो रही है। इस मंदी का असर उन देशों पर पड़ा है, जो कि चीन को खनिज और कच्चे माल की सप्लाई करते थे। आॅस्ट्रेलिया उनमें से एक है।

आॅस्ट्रेलिया की सरकार और सेण्ट्रल बैंक की कोशिश है, कि एक सीमा तक निश्चित हो चुके इस मंदी को रोका जा सके। किंतु ब्याज का एतिहासिक रूप से सबसे न्यूनतम दर और आॅस्ट्रेलियायी डाॅलर में पिछले एक साल में की गयी 25 प्रतिशत की गिरावट के बाद भी अर्थव्यवस्था के संभलने की संभावनायें नहीं बन पायी हैं। लगातार नकारात्मक कारकों का बढ़ना जारी है। बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि उत्पादन इकाईयों के सामने भी संकट है।

अगस्त के पहले सप्ताह में जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार -आॅस्ट्रेलिया में बेरोजगारी दर जुलाई में 6.1 से बढ़ कर 6.3 प्रतिशत हो गयी। अब बेरोजगार मजदूरों की संख्या 8,00,700 हो गयी है। बेरोजगारी दर के सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी पश्चिमी आॅस्ट्रेलिया में 0.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई, और बढ़ कर 6.4 प्रतिशत हो गयी और क्विंसलैण्ड में 0.4 की बढ़ोत्तरी के बाद 6.4 हो गयी है। यह खनिज उत्पादक क्षेत्र हैं। जो बेरोजगारी दर सरकारी आंकड़े बता रहे हैं, वह बेरोजगारी दर वास्तव में उससे कई गुणा ज्यादा है, क्योंकि ‘आॅस्ट्रेलियन ब्यूरो आॅफ स्टेटिसटिक्स‘ के अनुसार ‘‘वह व्यक्ति बेरोजगार नहीं है, जो कि सप्ताह में एक घण्टा भी मजदूरी पा कर काम करता है।‘‘ जबकि सप्ताह में एक घण्टा काम करने वाला मजदूर सही अर्थों में बेरोजगार ही होता है। सरकार का यह नजरिया वास्तव में बेरोजगारी दर को छुपाने की ऐसी कोशिश है, जिसे नाकाम ही होना है।

राॅय मार्गन कम्पनी के द्वारा कराये गये सर्वे के अनुसार -वास्तव में बेरोजगारी दर 8.7 प्रतिशत है, और छुपी हुई बेरोजगारी दर 16.4 प्रतिशत है। ये ऐसे लोग हैं, जो अपनी योग्यता और क्षमता से कम काम कर रहे हैं।

सेण्ट्रल बैंक ने आॅस्ट्रेलिया में राजनीतिक संकट के बढ़ने की चेतावनी दी थी। जिससे बचने की बाजारवादी कवायतें भी तेज हो गयी हैं, प्रधानमंत्री टोनी एबोट के स्थान पर नये प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल की सरकार बन गयी है। यह सत्ता परिवर्तन वहां के काॅरपोरेट जगत की अपनी कारस्तानी है।

रिजर्व बैंक के गर्वनर ग्लेन स्टीवेंस ने अगस्त के पहले सप्ताह में दिये गये अपने वक्तव्य में चेतावनी दी, कि ‘‘पहले आॅस्ट्रेलिया के विकास दर का अनुपात 3.25 प्रतिशत लगाया गया था, वह ज्यादा समय तक नहीं रहेगा। सेण्ट्रल बैंक के द्वारा 2016 के लिये विकास दर 2.5 प्रतिशत अनुमानित है।‘‘ स्टीवेंस का मानना है, कि लोहा, कायला और खनिज क्षेत्रों में पिछले एक साल से जारी गिरावट की वजह से ही बेरोजगारी दर बढ़ रही है, और विकास दर में भी गिरावट आई है। उन्होंने जनसंख्या वृद्धि को भी एक कारण माना है।

आॅस्ट्रेलिया के कई क्षेत्रों में एक साथ मंदी और गिरावट का संकट गहराता जा रहा है। चीन में निर्यात की वजह से जो उछाल खनिज एवं उत्खनन क्षेत्र में आया था उसके खत्म होने के बाद, रियल स्टेट मार्केट बबल के खत्म होने का डर तेजी से बढ़ रहा है। सिडनी और मेलबोर्न जिसकी चपेट में है। निवेशकों का डर भी बढ़ गया है। मई में अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने आौर प्रोत्साहित करने के लिये रिवर्ज बैंक ने आॅफिसियल इंटरेस्ट रेट को गिरा कर 2 प्रतिशत कर दिया -2008-09 के स्तर से भी नीचे- मगर इस का परिणाम यह हुआ कि कर्ज का उपयोग उत्पादकता को बढ़ाने के लिये निवेश की जगह, बड़े स्तर पर सम्पत्ति की खरीदी एवं उसे बढ़ाने में लगाया जाने लगा, जैसा कि वैश्विक स्तर पर होता रहा है।

7 अगस्त को आॅस्ट्रेलियायी शेयर के मूल्य से 38 बिलियन डाॅलर की गिरावट आयी। यह गिरावट 2008 की मंदी के बाद की सबसे भयानक, बैंक स्टाॅक में गिरावट है।

यह गिरावट बाजारवादी सट्टेबाज अर्थव्यवस्था की ऐसी गिरावट है, जिसे रोक पाना इसलिये आसान नही है, कि सरकारें अपने देश की आम जनता को मंदी से बचाने के बजाये बैंकों और वित्तीय इकाईयों को बचाने मंे लग जाती हैं। इस बात का प्रचार करती और कराती हैं, कि अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिये यह जरूरी है। इस तरह खर्च में कटौती, आम जनता को दी जाने वाली सुरक्षा और सहयोग में कटौती, उत्पादन इकाईयों को बंद कर, काम के अवसर में कटौती जैसी नीतियों को लागू कर देती है। एक तरीके से सारा बोझ आम लोगों पर लादती चली जाती है। उनकी व्यवस्था का संकट आम जनता के लिये रोजी-रोजगार और अस्तित्व के संकट में बदल जाता है। आॅस्ट्रेलिया की सरकार भी वित्तीय ताकतों के दबाव में यही कर रही है।

माईनिंग, मैन्यूफेक्चरिंग और रीटेल एण्ड पब्लिक सेक्टर में बेरोजगारी का बढना जारी है। विश्लेषकों का अनुमान है, कि आने वाले अगले 12 महीनों में खनिज क्षेत्रों में काम के अवसर घटेंगे और दसों हजार नौकरियां समाप्त हो जायेंगी। जिसकी वजह मौजूदा गिरावटा और चीन की मंदी है।‘‘ आॅस्ट्रेलियन ब्यूरो आॅफ स्टेटिस्टिक्स के अनुसार- ‘‘आॅस्ट्रेलिया में अल्प बेरोजगार लोग, जो कि पूर्णकालिक काम की तलाश कर रहे हैं, की संख्या 27,200 से बढ़ कर, 5,41,200 हो गयी है। लगभग 1.3 मिलियन लोग सक्रिय रूप से काम की तलाश कर रहे हैं।‘‘ राॅय मार्गन रिसर्च स्टेटिस्टिक्स के अनुसार- ‘‘लगभग 1.2 मिलियन लोग या 9.3 प्रतिशत लोग या आॅस्ट्रेलिया की श्रमशक्ति बेरोजगार है, और 1.1 मिलियन या 8.9 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो छुपी हुई बेरोजगारी के शिकार हैं।‘‘

न्यूपोर्ट कन्सल्टिंग के द्वारा खनिज क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कराये गये एक वार्षिक सर्वेक्षण के अनुसार- ‘‘12 महीने के अंदर इस क्षेत्र में 80 प्रतिशत नौकरियों में कटौती की योजना भी है। इस कटौती के साथ 78 प्रतिशत पूंजी के खर्च में कटौती की योजना भी है। जोकि पिछले साल की कटौती का लगभग दो गुणा है।‘‘ सर्वेक्षण में इस बात का विशेष उल्लेख है, कि हंटर वेली, न्यू साउथ वेल्स के कोयले के खदान और पश्चिमी आॅस्ट्रेलिया के पिलबरा क्षेत्र के कच्चे लौह उत्पाद इससे गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। न्यूपोर्ट कन्सल्टिंग के मैनेजिंग डाॅयरेक्टर डेविड हैंड ने कहा है, कि उनका अनुमान है, कि अगले 12 महीनों में आॅस्ट्रेलिया के खनिज क्षेत्रों के 30,000 नौकरियां समाप्त हो जायेंगी।

एंग्लो-अमेरिकन कम्पनियों की योजना अगले कुछ सालों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 53,000 नौकरियों में कटौती करने की हैं, उसके कई कोयले के खदान आॅस्ट्रेलिया में भी हैं। कम्पनी ने कहा है, कि इस साल के अंत तक आॅस्ट्रेलिया में 1000 से अधिक नौकरियों में कटौतियां की जायेंगी। 2016 के अंत तक 1500 और कटौतियां होंगी। आॅस्ट्रेलिया में लगभग 3000 नौकरियों के कटौती की योजना है। ऐसी कटौतियों की घोषणा आॅस्ट्रेलिया में काम करने वाली कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भी की है।

दुनिया की एक ओर ग्लोबल मााइनिंग जाइंट कम्पनी -बीएचपी- बिल्टन ने जुलाई महीने के अंत में मीडिया से कहा कि ‘‘अपने मेलबोर्न हेडक्वाटर से वह 100 एडमिनिस्ट्रेटर पोजिशन की कटौती करेगा। कटौती के लिये उसने कम्पीन के मुनाफा में आयी गिरावट को जिम्मेदार ठहराया। कम्पनी ने इस वित्तीय वर्ष के लिये 13.2 बिलियन डाॅलर के मुनाफा का अनुमान लगाया है, जोकि पिछले साल की तुलना में 40 प्रतिशत कम है। गये साल कम्पनी ने 22.2 बिलियन डाॅलर का मुनाफा कमाया था।

बीएचपी बिलिटाॅन-मित्सुबिशि एलिआन्स (बीएमए) आॅस्ट्रेलिया के कोयले के निर्यात का एक तिहाई हिस्से का उत्पादन करता है, और वह दुनिया के सबसे बड़ी उत्पादक इकाई में से एक है। पिछले साल उसने आॅस्ट्रेलिया में काम करने वाले 700 कर्मचारी एवं मजदूरों को काम से निकाला था। वह अपना काम ‘काॅन्ट्रेक्ट वरकर्स‘ से कराने की नीति पर चल रहा है। मजदूरों के सामने काम और पगार का संकट है। वो पूरी तरह से आर्थिक अनिश्चयता का शिकार होते जा रहे हैं। जिन कर्मचारी और कामगरों ने सालों पहले किश्तों में घर लिया था, अब वो किश्त जमा नहीं कर पा रहे हैं और अपना घर गंवाने के कगार पर हैं। या तो वो बेरोजगार हैं, या उनकी आय आधे से भी कम हो गयी है। खनिज उत्पादन से जुड़े अन्य उद्योग एवं कामगरों पर संकट मंडरा रहा है।

माइनिंग -खदानों- में काम आने वाले विस्फोटक निर्माता कम्पनियों ने भी नौकरी में कटौतियां शुरू कर दी है। खनिज एवं कायेले का परिवहन करने वाली डच की कम्पनी स्मिथ लेमनाल्को ने न्यूकैसल में अपने बोटों को बंद करने का निर्णय लिया है। यह कोयला परिवहन के लिये सबसे बड़ा बंदरगाह है।

खनिज उत्पादन में आयी गिरावट का प्रभाव उससे जुड़े तमाम उद्योगों एवं परिवहन जैसे क्षेत्रों पर भी पड रहा है, जहां नौकरी की कटौतियां हो रही हैं, काम के अवसर लगातार घट रहे हैं। ‘जनरल मोटर्स‘ से लेकर ‘फोर्ड‘ तक ने नौकरियों में कटौती की घोषणां की है। आॅस्ट्रेलिया की पूरी कार इण्डस्ट्री 2017 तक बंद होने की प्रक्रिया से गुजर रही है। ऐसा होने पर 1,50,000 नौकरियां जायेंगी। 2014 के एकाउन्टिंग फर्म- पीडब्ल्यूसी के अध्ययन के अनुसार- ‘‘देश की एक तिहाई अर्थव्यवस्था वित्तीय संकट के बुरे दौर से गुजर रही है।‘‘

एबीएस के आंकडों के अनुसार- ‘‘दक्षिण आॅस्ट्रेलिया में बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा 8.2 प्रतिशत है।‘‘

खनिज एवं उससे जुड़े तमाम क्षेत्रों में आयी यह गिरावट और बढ़ती हुई बेरोजगारी की वजह भले ही चीन की मंदी से प्रभावित है, लेकिन सच यह भी है, कि अर्थव्यवस्था पर उस वर्ग का अधिकार हो गया है, जो सिर्फ लाभ कमाना चाहता है। इसलिये चीन से जुड़े ‘मााइनिंग बुम‘ के खत्म होने का असर आॅस्ट्रेलिया की पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा हैं

सिडनी के स्टाॅक एक्सचेंज में सूचीबद्ध 33 ‘रिसोर्सेज कम्पनी‘ के स्टाॅक मूल्यों में भी भारी गिरावट देखने को मिली। यह गिरावट साल 2011 से, उनके सामूहिक मूल्यों में, 255 बिलियन डाॅलर -57 प्रतिशत- की गिरावट है, और इसमें से ज्यादातर गिरावट आखिरी 1 साल में आयी है।

बीएचपी ने अगस्त 2015 के आखिरी सप्ताह में घोषणां की है, कि उसके लाभ में 50 प्रतिशत की गिरावट आई है, जोकि पिछले 12 साल की सबसे बड़ी गिरावट है। खनिज से जुड़े क्षेत्रों में निवेश की स्थितियां बिगड़ गयी हैं। आॅस्ट्रेलिया में ऐसे निवेश में 40 प्रतिशत की कमी हुई है।

आॅस्ट्रेलिया के 4 बड़े बैंक- जिन्होंने अब तक भारी मुनाफा कमाया था, इस साल उनके मुनाफ में 20 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आयी है।

खनिज निर्यात की तेजी के साथ आॅस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था के विकास को रियल स्टेट की सट्टेबाजी ने भी विकास दिया। सिडनी जैसे शहरों में साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद से -जिसमें 60 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। वर्तमान में आॅस्ट्रेलिया का ‘हाउस होल्ड‘ कर्ज, उसके राष्ट्रीय उत्पाद का 130 प्रतिशत है। जोकि दुनिया भर में सबसे ज्यादा है। मंदी की चपेट में वह क्षेत्र भी आता जा रहा है। जो स्थिति 2008 की मंदी में अमेरिका की हुई थी, वही स्थितियां आॅस्ट्रेलिया के रियल स्टेट की होती जा रही है। स्पेन की अर्थव्यवस्था तो डूब ही गयी थी।

‘‘आॅस्ट्रेलियन ब्यूरो आॅफ इस्टेटिस्टिक्स‘‘ द्वारा 2 सितम्बर को जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जुलाई 2015 के बीच उसका विकास दर मात्र 0.2 प्रतिशत था, जो कि उसके सकल घरेलू उत्पाद के पूर्वानुमानों से काफी कम है। जिसकी वजह विश्व बाजार में माल के मांग में आयी कमी और मूल्यों में गिरावट है। वैश्विक मंदी का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। आस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था चीन की संकट से पूरी तरह प्रभावित है। उसके विकास दर में भारी गिरावट -वास्तव में जो नजर आ रहा है- उससे कहीं ज्यादा है। यह जून की तिमाही में पूरी तरह नकारात्मक होती, मगर सरकार के द्वारा सेना के क्षेत्र में किये गये खर्च का सहयोग उसके विकास दर में 0.4 प्रतिशत के बराबर है, जबकि निर्यात के क्षेत्र में 0.7 प्रतिशत की गिरावट आयी है।

कुल मिला कर आॅस्ट्रेलिया के निजी क्षेत्रों का जीडीपी 0.2 प्रतिशत सिकुड़ा है।

इस साल की दूसरी तिमाही में सरकार के खर्च में 2.7 बिलियन डाॅलर की बढ़ोत्तरी हुई है, जिसका बड़ा हिस्सा सैन्य खर्च में गया।

एबोट सरकार ने अमेरिका के ओबामा सरकार के युद्ध के प्रति प्रतिबद्धता और युद्ध की तैयारी के लिये युद्धक साज-ओ-सामान की खरीदी की है और इराक-सीरिया पर हमले की साझेदारी पर खर्च की है। 1 बिलियन डाॅलर का 2 अतिरिक्त सी-17 ट्रांसपोर्ट एयरक्राॅफ्ट, 900 मिलियन डाॅलर में डिफेन्स कम्यूनिकेशन सिस्टम, 400 मिलियन डाॅलर में रीफ्यूलिंग एयरक्राॅफ्ट और 325 मिलियन डाॅलर में ऐंटी राॅकेट सिस्टम की खरीदी की है। 120 मिलियन डाॅलर अमेरिकी नेतृत्व में इराक और सीरिया में हमले के लिये ट्रूप्स और एयरफोर्स बम्बर के साथ साझेदारी पर खर्च किये।

यह खर्च एबोट सरकार ने तब किया, जब चीन से निर्यात पर टिकी आॅस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे मंदी के चपेट में आती जा रही थी। उसकी नीतियां वैश्विक स्तर पर अमेरिका के साथ कवायत करने की और चीन के साथ नजदीक आर्थिक सम्बंधों को बढ़ाने की थी। आॅस्ट्रेलिया अमेरिकी ‘पिवोट टू एशिया‘ और ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप‘ की नीतियों में भी अमेरिका का सहयोगी देश रहा है। जिसका मकसद चीन के बढ़ते आर्थिक एवं कूटनीतिक वर्चस्व को रोकना है। प्रधानमंत्री टोनी एबोट को लिबरल पार्टी के आंतरिक मतदान के द्वारा सत्ता से बेदखल करने के बाद मैल्कम टर्नबुल की सरकार की नीति को जारी रखेगी या नहीं? यह सवाल हो सकता है। नये प्रधानमंत्री टर्नबुल ने चीन से अपने सम्बंधों को बढ़ाने की घोषणां की है। जोकि आॅस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था की अनिवार्यता है।

इस साल के पहले तिमाही में आॅस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था 13.5 बिलियन डाॅलर के घाटे में थी, जो दूसरे तिमाही में बढ़ कर लगभग 19 बिलियन डाॅलर हो गयी। यह अब तक की सबसे बुरी स्थिति है। इस आंकड़े के बाद आॅस्ट्रेलिया पर कुल विदेशी कर्ज 1 ट्रिलियन डाॅलर के काफी करीब पहुंच गया है। विदेशी पूंजी निवेश, जिस पर कि आॅस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था पूरी तरह निर्भर है, अब वह खत्म होता जा रहा है। जून की तिमाही में सीधे पूंजी निवेश 8.6 बिलियन डाॅलर हुआ, जोकि इस साल की पहली तिमाही से 4.9 बिलियन डाॅलर कम है।

इस तरह आॅस्ट्रेलिया का बड़ा हिस्सा -विशेष कर खनिज क्षेत्र- पश्चिमी आॅस्ट्रेलिया, दक्षिण आॅस्ट्रेलिया, क्वींन्सलैण्ड और उत्तरी क्षेत्री मंदी के दौर में प्रवेश कर गये हैं।

आॅस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था कनाडा और ब्राजील की राह पर है, जहां चीन की अर्थव्यवस्था में आयी गिरावट की वजह से मंदी के नये दौर की शुरूआत हो गयी है।

आज दुनिया की अर्थव्यवस्था इस कदर आपस में जुड़ी हुई है, कि किसी एक बड़ी अर्थव्यवस्था के लड़खड़ाते ही दुनिया भर की, अर्थव्यवस्था की रफ्तार में थकावट नजर आने लगती है। वास्तव में चीन में यह पिछले दो दशक के बाजारवादी अर्थव्यवस्था के विकास की ऐसी थकावट है, जिससे नहीं बचा जा सकता।

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