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मौत का जश्न क्यों?

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बनारस है या जुनून?

गंगा में प्रतिमा विसर्जन के लिये गोदौलिया चैक पर 30 घंटे का धरना! 22 सितम्बर मंगलवार की रात 1 से 1:30 बजे लाठीचार्ज!

संतों और पंडालों की सक्रियता!

मामला तनाव भरा!

सवाल कई!

यह है इसी महीने की पहली घटना!

दूसरी घटना-

बकरीद के दूसरे दिन,

मदनपुरा के पंजफेड़वा, आदमपुर के सलेमपुरा और जलामुद्दीनपुरा में सार्वजनिक रूप से -हजारों हजार लोगों की भीड़ के बीच- दी गयी ऊटों की कुर्बानियां!

प्रशासन उमड़ी हुई भीड़ को संभालने में व्यस्त!

मामला कोई नहीं! सवाल भी नहीं! मुस्लिम धर्म गुरूओं की सक्रियता! सउदी अरब में एक लड़के को सूली पर चढ़ाने की तैयारी चल रही है!

हम कहां हैं भई?

किस युग, किस सदी में?

कुर्बानी का किस्सा-

एक दिन हजरत इब्राहिम ने सपना देखा! सपने में देखा- अल्लाह उनसे अपने बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी देने को कह रहा है। (खुदा पाक है! रहम दिल वह शय है, जिसे किसी ने नहीं देखा। शायद उन्हें पैगम्बरों ने देखा हो?) सपने को हकीकत में बदलने के लिये अपने बेटे के साथ हजरत इब्राहिम निकल पड़े! रास्ते में तीन शैतानों ने कुर्बानी की राह में रूकावटें डाली, मगर सच्ची इबादत से बला टल गयी। अल्लाह ने इब्राहिम के बेटे इस्माइल को बचा लिया! बेटे की जगह बकरे की कुर्बानी हो गयी।

और यही रवायत बन गयी!

न जाने कैसे यह मान लिया गया, कि कुर्बानी का मकसद बुरे खयालों को खत्म करना है।

सपना क्या बुरा खयाल था?

कुर्बानी की खंजर भेड़, बकरे और ऊटों के गर्दन पर क्यों?

बेटों की जगह उन जानवरों पर क्यों, जिनके खयाल में किसी इंसान को मारने का खयाल नहीं आता!

मौत के जश्न में यह हुजुम क्यों?

क्यों लदे, लटके हैं लोग देखने के लिये छतों और मुंडेरों पर?

क्यों इंसानी घेरे में जानवर अकेला है?

हमें बख्श दें! कौम के हाथों में खंजर इंसानों ने थमाया है।

विसर्जन ईश्वर के प्रतिमा की अंतिम यात्रा है।

मौत का जश्न क्यों?

बनारस में एक कहावत प्रचलित है- ‘मुअले पाछे डोम राजा‘।

-आलोकवर्द्धन

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One comment

  1. पद्मनाभ

    बहुत अच्छा प्रश्न आलोक जी। कोई जवाब ठोस तो नही मिलेगा, रवायत पर सवाल उठाने की रवायत कहाँ?

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