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कारोबारी सरकार राज्य के असितत्व के लिये खतरा बन चुकी है

DSC_2592-handenvelopदुनिया की ज्यादातर सरकारें आम जनता के खिलाफ होती हैं, इसे स्वाभाविक मान लिया गया है। यह मान लिया गया है, कि सरकारें ऐसी ही होती हैं। जबकि, जनविरोधी सरकारें भी, आम जनता की भलार्इ, सामूहिक विकास और समाज कल्याण की बातें करती हुर्इ जनसमर्थन हासिल करती हैं, और सरकार बनाती हैं। आम जनता जब उनसे सवाल करती है, अपनी भलार्इ, विकास और समाज कल्याण की मांग करती है, सरकारें अपने ही देश की ऐसी आम जना के खिलाफ हो जाती हैं। ऐसी विधि-विधानों का प्रावधान रच देती हैं, कि सरकार का विरोध देश और समाज के विरोध में बदल जाता है। जबकि, देश और समाज सरकार से नहीं, बलिक सरकारें देश और समाज से बनती हैं। और आम आदमी के बिना न तो देश है, न समाज है, ना ही सरकारें हैं। आम जनता को नकार कर सरकारें, अपने वैध होने को नकारती हैं। हम कह सकते हैं, कि सरकारों का जनविरोधी होना, देश और समाज विरोधी होना है।

क्या दुनिया की ज्यादातर सरकारें देश और समाज विरोधी हैं?

इस सवाल के साथ एक सवाल और करना चाहिये, कि ऐसा क्यों है?

आम जनता के अपने देश की सरकारों को जन और समाज और देश विरोधी नहीं बनाया, यह तय है। इसके बाद भी सरकारें जन-विरोधी हैं। उन्होंने अपनी सोच-समझ और विचारों से ऐसी समाज व्यवस्था का निर्माण किया है। जहां आम आदमी जरूरी तो है, मगर आम आदमी के लिये कोर्इ जगह नहीं है। उसे कारगर औजार और हंथियार बना दिया गया है, उसे औजारों और हथियारों के उपयोग के लिये, जरिया बना दिया गया है। वह बाजार के लिये मानव श्रमशकित का स्त्रोत और उपभोक्ता भर है।

इस तरह, अपने ही द्वारा बनायी गयी सरकारों पर न तो उसका नियंत्रण है, ना ही अपने श्रमशकित से उत्पादित वस्तु, सामान या उत्पाद पर उसकी पकड़ है। यदि इसकी वजह हम जानता चाहें तो, वर्ग विभाजित समाज में पूंजी और राज्यों की उपसिथति से हमारा वास्ता पड़ता है। इस बात से हमारा वास्ता पड़ता है, कि समाज पर राज्यों की श्रेष्ठता कायम हो गयी है, और राज्य की सरकारों पर उस वर्ग का नियंत्रण कायम हो गया है, जिस वर्ग के हाथों में पूंजी-वित्तीय पूंजी है। जिसकी गिरफ्त से बाहर आज कोर्इ नहीं है।

एक ऐसी समाज व्यवस्था का निर्माण हो गया है, जिसके क्रमिक विकास में ही उसके पतन का बीज भी विस्तार पाता रहा है। कल तक एक देश इसकी गिरफ्त में होता था, किंतु साम्राज्यों के उदय के बाद, आज सारी दुनिया इसकी गिरफ्त में है। यह अपने विकास के चरम अवस्था में है, और अब चारो ओर उसके सामने सिर्फ ढ़लान ही ढ़लान है। खडड, खंदक और खार्इयां हैं। मौजूदा समाज व्यवस्था और उसकी वैशिवक संरचना के पांव के नीचे पिघलती हुर्इ जमीन है। पतन का जो बीज मौजूदा समाज व्यवस्था के उदय के साथ था, अब वह पूरी तरह विस्तार पर चुका है। उसकी ऊपरी और भीतरी संरचना संकटग्रस्त है। आम जनता को धोखे में रखना मुशिकल हो गया है। यह बात खुले आम हो गयी है, कि वित्तीय पूंजी और राज्य की सरकारों की साझेदारी पक्की हो गयी है। यह बात भी खुले तौर पर सामने आ गयी है, कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां, निजी कम्पनियों एवं दैत्याकार कारपोरेशनों ने राज्य की सरकारों और उनकी वित्त व्यवस्था पर कब्जा कर लिया है। सरकारें वास्तव में वित्तीय पूंजी की चाकरी कर रही हैं। ज्यादातर सरकारों के जनविरोधी होने की वजह भी खुलेआम हो गयी है। वर्तमान वैशिवक मंदी ने व्यवस्था की विसंगतियां और उसकी असफलता को ही नहीं, उसकी संभावनाओं को भी खत्म कर दिया है। पूंजीवाद पूरी तरह असंदर्भित हो गया है।

यदि हम मान लें, कि समाज की व्यवस्था के लिये राज्य का उदय और सरकारों का जन्म हुआ है, तो समाज को सुव्यवसिथत रखने, व्यकित की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने, और एक सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज की रचना करने की जिम्मेदारी सरकारों की है। आर्थिक अनिश्चयता, सामाजिक असमानता और वर्गगत संघर्षों को घटाने और उन्हें खत्म करने की जिम्मेदारियां सरकार की हैं। समाज व्यवस्था और विधि-विधान का आधार भी यही होना चाहिये। सुख, शांति और समृद्धि का आधार भी यही होना चाहिये। राज्य के माध्यम से सामाजिक एवं प्राकृतिक सम्पदा पर सभी का समान अधिकार होना चाहिये। लेकिन, ऐसा नहीं है। जिसका सीधा सा अर्थ यह है कि राज्य के उदय और सरकारों के जन्म के लिये रचा गया तर्क या तो गलत है, या राज्य और सरकारों ने इन तर्कों को गलत प्रमाणित कर दिया है। जन-विरोधी सरकारों के पास आम जनता के पक्ष में, कोर्इ तर्क नहीं है। उन्होंने अपने होने की वजह को, जिसे उनके ही द्वारा गढ़ा गया है, पूरी तरह खारिज कर दिया है। उन्होंने वह किया है, जो उन्हें नहीं करना चाहिये था। उन्होंने देश, जन और समाज को धोखा दिया है।

सामाजिक सम्पतित पर राज्य की पकड़ ढ़ीली कर दी गयी है।

प्राकृतिक सम्पदा को निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों के हवाले किया जा रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां -विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष- राज्य की विकास योजनाओं नियंत्रित कर रही है।

फेडरल रिजर्व और सेण्ट्रल बैंकों तथा उनकी राष्ट्रीय इकार्इयों के जरिये वित्त व्यवस्था का ऐसा तिलस्म खड़ा किया गया है, कि दुनिया की ज्यादातर सरकारें अब वित्तीय इकार्इयों के निर्देशों का पालन कर रही है।

सटटेबाज और एक युद्धपरक अर्थव्यवस्था का निर्माण हो गया है। अमेरिकी सरकार पर फेडरल रिजर्व और वाल स्ट्रीट अब भारी है। व्हार्इट हाउस जिनके आदेशों का पालन करता है। यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष तथा विश्व बैंक से यूरोपीय देश संचालित हो रहे हैं। वैशिवक सिथतियां इसलिये विस्फोटक हैं, कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां, फेडरल एवं सेण्ट्रल बैंक, निजी कम्पनियां और विशालतम कारपोरेशनों के पीछे बैठी ताकतें दुनिया पर एकाधिकार चाहती हैं। जनविरोधी सरकारों के पास जितनी भी सामरिक शकितयां हैं, वह इनके नियंत्रण में हैं।

इसके बाद भी यूरोपीय देशों में कर्ज का संकट रोज बढ़ता जा रहा है, और अमेरिका की वित्तीय संरचना, उसकी वैशिवक वित्तव्यवस्था लड़खड़ा रही है। वैशिवक मंदी का यह दौर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। एक दौर की समापित नहीं होती, कि दूसरे दौर की नयी शुरूआत हो जाती है। युद्ध और लूट के अलावा, उन्हें अब कुछ नहीं सूझ रहा है। यूरोपीय देश बढ़ते हुए कर्ज और बढ़ते हुए जन-असंतोष को संभालने की सिथति में नहीं है। कम-ओ-बेश यही सिथति अमेरिकी सरकार की है। तीसरी दुनिया के देशों पर जो वित्तीय एवं सामरिक हमले हो रहे हैं, उसकी वजह इन ताकतों के द्वारा अपनी वैशिवक संरचना को बचाने की आखिरी कोशिश है। जो युद्ध और लूट में अपने संभलने की संभावनायें तलाश रहे हैं। सीरिया में जिन्हें न सिर्फ राजनीतिक पराजय का सामना करना पड़ा है, बलिक उन ताकतों से भी उनका वास्ता पड़ गया है, जो वैकलिपक समाज व्यवस्था का निर्माण कर रही हैं।

राजनीतिक असिथरता, आर्थिक नाकेबंदी और सैन्य हस्तक्षेप के विरूद्ध लगभग डेढ़ दशक बाद शीतयुद्ध की वापसी हो गयी है। रूस और चीन की एकजुटता नये शिविर के रूप में उभर आयी है, जो सहअसितत्व की सोच से संचालित हो रही है। इन दोनों ही पूर्व समाजवादी देशों के सामने मुक्त बाजार के नये क्षेत्र के निर्माण का आदर्श है। हम यकीन के साथ नहीं कह सकते, कि यहां की सरकारें आम जनता के पक्ष में कमर कस कर खड़ी हैं। हां, यूरोप और अमेरिका की तरह यहां की सरकारें पूरी तरह जनविरोधी नहीं हैं। राज्य और सरकार के नियंत्रण से वित्तीय पूंजी न तो पूरी तरह बाहर है, ना ही बे-लगाम है। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां यहां की सामाजिक विकास योजनाओं और वित्त व्यवस्था पर इतनी पकड़ नहीं रखती, कि वो सरकारों का संचालन कर सके। चीन की निजी कम्पनियों में राज्य की निर्णायक पूंजी है। मुक्त बाजारवादी सोच सरकारी देखरेख में है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने देश की वित्तीय उपलबिधयों का आंकलन करते हुए सामाजिक असमानता के साथ सामाजिक विकास के तहत लोगों के जीवनस्तर वित्तीय उपलबिधयों के अनुपात में कम परिवर्तन को स्वीकार करते हुए, उस ओर आगे बढ़ने की बातें की है। रूस में व्लादिमीर पुतिन के राष्ट्रपति बनने के बाद आर्थिक एवं सामाजिक सिथतियों में भारी बदलाव आया है।

दुनिया में नये शिविर के उदय से तीसरी दुनिया के छोटे, अविकसित और विकासशील देशों में सीरिया की घटना के बाद, अमेरिकी साम्राज्य, यूरोपीय संघ और नाटो सैन्य संगठन तथा अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के वित्तीय एवं सामरिक हस्तक्षेप के विरूद्ध सुरक्षा की भावना बढ़ी है। यह यकीन बढ़ा है कि इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसी वारदातों को रोका जा सकता है। वित्तीय, कूटनीतिक एवं सामरिक हस्तक्षेपों के जरिये जिस अमेरिकी वैश्वीकरण को बढ़ाया जा रहा है, उस खतरे के प्रति बहुध्रुवी विश्व की अनिवार्ययता ने गैर-साम्राज्यवादी विकल्पों को नयी दिशा दी है। नये शिविर से लातिनी अमेरिकी देशों के समाजवादी देश एवं विकास के जरिये समाजवादी समाज के निर्माण में लगे देशों को भी सुरक्षा एवं सहयोग का आधार मिला है। जिन्हें अमेरिकी सरकार और यूरोपीय ताकतें अपने लिये सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं। और वास्तव में समाजवाद ही पूंजीवादी विश्व के लिये सबसे बड़ी चुनौती है, जो ऐतिहासिक विकासक्रम में सिर्फ विकल्प नहीं, बलिक विकास की सही दिशा है।

लातिनी अमेरिका के समाजवादी देश और विकास के जरिये समाजवादी समाज की रचना के आदर्शों से जुड़े देशों की सरकारें आम जनता के पक्ष में खड़ी हो रही हैं। जिसके केंद्र में क्यूबा है। फिदेल कास्त्रो और चेग्वेरा ने जिस समाजवादी क्रांति की शुरूआत की अब वह पूरे महाद्वीप मे ंसमाजवादी बोलिवेरियन क्रांति में बदल गया है। वेनेजुएला, निकारागुआ, इक्वाडोर, जैसे देशों में विकास के जरिये समाजवादी समाज का निर्माण हो रहा है। राज्य और उनकी सरकारों को आम जनता के पक्ष में खड़ा किया जा रहा है।

नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था के विरूद्ध खनिज एवं उधोगों का न सिर्फ राष्ट्रीयकरण हो रहा है, बलिक वेनेजुएला में औधोगिक इकार्इयों एवं सरकारी कम्पनियों को मजदूरों के नियंत्रण में दिया जा रहा है। ‘स्ट्रीट गर्वमेण्ट’ के माध्यम से सरकार को राजभवनों से निकाल कर, आम जनता की हिस्सेदारी बढ़ार्इ जा रही है, उसे समाज की सड़कों और गलियों में लाया जा रहा है। कम्यूनों का निर्माण किया जा रहा है और राज्य के सरकार की जिम्मेदारियों को उन्हें सौंपा जा रहा है।

राज्य की बदलती हुर्इ अवधारणा के बीच, आम जनता के पक्ष में खड़ी सरकारें ही राज्य के ऐतिहासिक जिम्मेदारियों को पूरा कर सकती हैं। आम जनता के विरूद्ध खड़ी कारोबारी सरकारें, राज्य के असितत्व के लिये गंभीर खतरा बन चुकी हैं।

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