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हम बाजार में हैं

article-2264457-1702cf94000005dc-885634x573‘‘क्या साहित्य की अपनी अलग से कोई दुनिया होती है?‘‘

कई बार यह सवाल मैंने खुद से किया है। जिसका सही जवाब तो है, मगर उसे बरगलाने की कोशिशें ही ज्यादा हुई हैं।

‘‘रचनाकार का अपना सुख‘‘

‘‘रचनाकार की अपनी दुनिया‘‘

‘‘साहित्य का संसार‘‘ जैसे शब्दों से वास्ता पड़ता रहा है।

जिसे सुन और समझ कर ऐसा लगता है, जैसे रचनाकार अपने सुख के लिये, अपनी दुनिया में जीने वाला जीव होता है। जबकि रहता है, वह भी समाज में, उन्हीं नियमों और विधानों से बंधा हुआ, जिन नियमों और विधानों के तहत लोग जीते हैं।

उसे समाज से काट कर, विशेष दर्जे में शामिल कर दिया जाता है। जाने-अनजाने उसे वहां खड़ा कर दिया जाता है, जहां वह या तो होता नहीं, और यदि होता है, तो विशिष्ठता के बोझ से पीडि़त ऐसा जीव होता है, जहां उसे नहीं होना चाहिये।

आपके सामने यह स्वीकार करने में मुझे थोड़ी भी हिचक नहीं होगी कि मेरे पास चाकू की तरह तेज ऐसी नजर नहीं है, जो किसी भी चीज को काट कर अलग कर दे।

मुझमें आरी या कुल्हाड़ी चलाने की ऐसी ताकत भी नहीं है, जो किसी भी चीज को चीर कर दो फाड़ कर दे।

मैं ऐसा भी नहीं हूं, कि रेती से घिस-घिस कर, किसी भी चीज को कुछ ऐसा बना दूं, कि सच चाहे जो भी हो, वह जैसा मैं चाहता हूं, वैसा ही नजर आये।

सच बताऊं तो मुझमें ऐसी योग्यता नहीं है।

मैं उन लोगों की तरह हूं, जो पत्तों से पेड़ को पहचानते हैं। जो पेड़ों में जंगल को देखते हैं।

जहां की दुनिया न तो बाहरी है, ना ही लोग बेजुबान हैं।

जहां सभी की अपनी जुबान है। जिनसे मिल कर जंगल की अपनी जुबान बनती है।

मुझे तो लगता है जंगल पेड़ों का समाज है। मुसीबत से घिरे लोगों का संवेदनशील समाज। जिसकी जड़ें जमीन में धंसी होती हैं, तना जमीन के ऊपर और बाहों सी फैली टहनियां पत्तों की हंथेली से तालियां बजाती हैं। उनकी छांव बातें करती है, और अपनों को अपना समझने, उनकी देख-भाल करने की जिम्मेदारियां न सिर्फ दशकों से निभा रही हैं, बल्कि बीजो की सौगात भी देती हैं।

मुझे नहीं लगता कि बीजों से बड़ी कोई सौगात भी हो सकती है।

यदि हम किसी की हंथेली पर बीज रखते हैं, तो तय है, कि हम अपना आने वाला कल उन हंथेलियों पर रख रहे हैं, जिन पर बीज को पेड़ और पेड़ को जंगल में बदलने की जिम्मेदारी है।

साहित्य हर पल पेड़ों में बदलता हुआ बीज है। बीज जंगल है, जड़ जमा कर, खुल कर जीने वाला जंगल। जिसके खिलाफ आरी, कुल्हाड़ी ही नहीं बाजारवादी संस्कृति है। एक ऐसी व्यवस्था है, जिसे उजड़ी हई धरती और चटियल इंसान पसंद है।

बीज आसमान से नहीं टपका। वह पेड़ों के श्रम और संवेदना का, प्रकृति के सानिध्य और संघर्ष का परिणाम है।

इसलिये मुझे लगता है, कि मानव भी आसमान से नहीं टपका। वह श्रम और सानिध्य और संघर्ष का परिणाम है। उसने जो भी हालिस किया है, वह उसका सामूहिक संसार है। सामाजिक सम्बंध और निजी अनुभवों का संयुक्त संसार।

जिसे अलग-अलग टुकड़ों में बांट कर देखने का नजरिया विकसित किया गया है, ताकि जिसे जब और जैसे चाहें, उपयोग में लाया जा सके। आपसी हितों में बांटा जा सके। साहित्य की दुनिया को काटने का नजरिया भी यही है। जबकि साहित्य हमारी सोच और हमारे अनुभव और संवेदनाओं का व्यक्त संसार है। वह अलग है, या नहीं? इस सोच पर निर्भर करता है, कि हम खुद को कितना महत्व देते हैं? अपने और समाज से किस सीमा तक जुड़े हुए हैं?

यदि हमारी सम्बद्धता अपने लिये है, तो हमारे लिये साहित्य की दुनिया अलग है। यदि हमारी सम्बद्धता समाज के लिये है, तो साहित्य की दुनिया अलग नहीं है। जो वास्तविक दुनिया है साहित्य की दुनिया उसी के अच्छा या बुरा होने, उसे बनाये रखने या बदलने का व्यक्त रूप है।

अब आप कहां हैं? आप तय कर लें। अपने लिये सुविधाजनक तर्क रचने का सुख, बाजार का दस्तूर है।

हम बाजार में हैं, जहां सोच और समझ को खरीदने और बेचने की सुविधा है। यदि आप बिके, तो कोई नहीं कहेगा, कि ‘‘आप बिक गये।‘‘ और यदि आपने अपने लिये सुविधाजनक तर्क खरीदा, तो कोई नहीं कहेगा, कि आपके तर्क खरीदे हुए हैं।

-आलोकवर्द्धन

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