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सीरिया का संकट समाधान के कितने करीब?

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सीरिया में रूस के हंस्तक्षेप से, पिछले चार सालों से जारी इस संकट के समाधान की संभावनायें बढ़ गयी हैं। यह लगने लगा है, कि सीरिया को इराक और लीबिया बनाने की यूरो-अमेरिकी मनमानी को रोका जा सकता है। यह समझ पैदा की जा सकती है, कि किसी भी देश की सरकर को बनाने का अधिकार उस देश की आम जनता को है, उन साम्राज्यवादी ताकतों को नहीं, जो राजनीतिक अस्थिरता को अपना हथियार समझते हैं। पेशेवर विद्रोहियों और आतंकियों का निर्यात सिर्फ इसलिये करते हैं, कि सैन्य हंस्तक्षेप की स्थितियां पैदा की जा सकें। उस देश की सरकार का तख्तापलट करना ही इन ताकतों का एकमात्र लक्ष्य होता है।

सीरिया में यूरोपीय देश और अमेरिकी सरकार ने इस खेल को बड़े पैमाने पर खेला है। अमेरिका का ‘आतंकवाद विरोधी युद्ध‘ आतंकवाद के विस्तार का प्रमुख कारण बना है। जिस ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘-आईएसआईएस- के खिलाफ अमेरिका और उसके मित्र देश इराक और सीरिया पर हवाई हमले कर रहे हैं, यह उन्हीं का उत्पाद है।

हम इस खतरे को अस्वीकार नहीं कर सकते कि सीरिया में रूस के सैन्य हंस्तक्षेप से युद्ध के विस्तार का खतरा बनता है, किंतु इस खतरे को उठाये बिना, समाधान के लिये वार्ता की मेज तक पहुंचन की तमाम राहें बंद हो चुकी हैं। अमेरिकी सरकार यूरोपीय देश और खाड़ी के उसके मित्र देशों ने ऐसी स्थितियां बना दी हैं, कि सैन्य हस्तक्षेप के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं है।

सीरिया का प्रायोजित संकट या तो अपने अंतिम चरण में है, या विश्व युद्ध के मुहाने पर है। तय होना बाकी है।

रूस के हमले एवं सीरिया की वैधानिक सरकार के आग्रह पर किये गये सैन्य हंस्तक्षेप से आतंकी खेमें में खलबली मच गयी है। उन्हें मिल रहे यूरो-अमेरिकी सहयोग एवं समर्थन और हो रहे दिखावटी हमलों का लाभ मिलना बंद सा हो गया है। रूस के साथ सीरिया की सेना जमीनी लड़ाई लड़ रही है। जिसे सीरिया की आम जनता का समर्थन हासिल है, जो मानते हैं, कि उन पर गृहयुद्ध आतंकी और साम्राज्यवादी हमले यूरो-अमेरिकी कारस्तानी है। अमेरिकी सरकार और पश्चिमी मीडिया अपने पक्ष में चाहे जो भी प्रचार करे सीरिया की आम जनता उनके विरूद्ध और बशर-अल-असद सरकार के पक्ष में है।

हाल ही में बीबीसी द्वारा प्रमाणित और मार्केट रीसर्च फर्म ओआरबी द्वारा सीरिया के सभी 14 गर्वनर अधिकृत प्रशासनिक क्षेत्रों में कराये गये ‘ओपिनियन पोल‘ के अनुसार- सर्वे में हिस्सा लेने वाले 81 प्रतिशत से ज्यादा, लगभग 82 प्रतिशत लोगों का मानना है, कि ‘‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया, जिसके खिलाफ बशर-अल-असद सरकार लड़ाई लड़ रही है, को वाशिंगटन ने ही बनाया है।‘‘

10 जून से 2 जुलाई के बीच पूरे देश में कराये गये इस सर्वेक्षण और मतसंग्रह में 1365 लोगों को शामिल किया गया। इसके परिणाम के बारे में आयोजकों का मामना है, कि गल्ती की संभावना 3 प्रतिशत ही हो सकती है। जाॅनी हील्ड, जो कि ओआरबी इण्टरनेशनल के मैनेजिंग डाॅयरेक्टर हैं, ने कहा कि ‘‘पोल (मतसंग्रह) में सीरिया की सरकार, इस्लामिक स्टेट, अल-नुसरा, वाईपीजी (कुर्द लड़ाके) और अन्य सीरियायी विपक्ष के नियंत्रण वाले क्षेत्र के लोगो को शामिल किया गया है।‘‘

मतसंग्रह से इस बात की भी जानकारी मिलती है, कि ‘‘सीरिया के आधे लोग अमेरिकी नेतृत्व में हो रहे हवाई हमलों के विरूद्ध हैं। मात्र 21 प्रतिशत लोगों का मानना है, कि उनका जीवन असद सरकार के शासन की तुलना में अब बेहतर है।‘‘

अमेरिका और पश्चिमी देशों की भ्रष्ट मीडिया ने इस सर्वेक्षण की पूरी तरह अनदेखी की है। उन्होंने इसे एक सिरे से खारिज कर दिया। जिन्होंने इस बारे में रिपोर्ट भी किया है, तो इस रूप में कि हर पांच में से एक सीरियायी जो इस सर्वे में शामिल है, ने कहा कि ‘‘इस्लामिक स्टेट का प्रभाव सीरिया में सकारात्मक पड़ा है।‘‘ जबकि ‘‘सर्वे में शामिल पांच में से चार सीरियायी यह मानते हैं, कि इस्लामिक स्टेट अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिनिधित्व करता है।‘‘

हमारे लिये अमेरिका एवं पश्चिमी देशों की मीडिया का यह रवैया चैंकाने वाला नहीं है, क्योंकि अमेरिकी अधिकारी यह ‘प्रोपोगेण्डा‘ करते रहे हैं, कि सीरिया की सरकार का सम्बंध ‘इस्लामिक स्टेट‘ से है। जिसके साथ मिल कर सीरिया की सरकार सीरिया के उदारवादी विपक्ष (जो कि मौजूद ही नहीं है) को बद्नाम करने का काम कर रही है।‘‘

ओबामा सरकार सीरिया में जिस ‘उदार विपक्ष‘ की बात करती है, उसका अस्तित्व ही नहीं है। और जिसे वो असद सरकार के खिलाफ आर्थिक, कूटनीतिक और हथियारों से लेकर प्रशिक्षण शिविरों में जिन्हें प्रशिक्षित करते रहे हैं, वह अल कायदा और उससे जुड़े अल नुसरा फ्रंट जैसे आतंकी संगठनों के आतंकी हैं। इस्लामिक स्टेट के पास भी अमेरिकी हंथियार और उसी के द्वारा प्रशिक्षित आतंकी हैं।

यह विवादहीन सत्य है, कि उस क्षेत्र में आतंकी संगठनों का उदय अमेरिकी नीतियों और उसके आक्रामक हमलों का परिणाम है। 2003 में अमेरिकी नेतृत्व में बहुराष्ट्रीय सेनाओं ने जब इराक पर हमला किया था, उस समय इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट या उसके जैसा कोई भी आतंकी संगठन नहीं था। उसने ही उस क्षेत्र में शिया और सुन्नी को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा किया। नस्ल और सम्प्रदाय के तनाव को बढ़ा कर, उन्हें बांटने और हराने की नीतियों को अंजाम दिया।

सीरिया की तरह ही 4 से 22 जून के बीच ओआरबी और आईआईएसीएसएस ने इराक में एक सर्वेक्षण कराया था। 85 प्रतिशत इराकियों का मानना है, कि ‘‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ अमेरिका के द्वारा बनाया गया संगठन है। जिसका मकसद राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा है। यह अमेरिकी हितों से संचालित होने वाला ऐसा संगठन है, जिसके पीछे अमेरिकी साम्राज्य है। जिन देशों में लोकतंत्र का तमाशा अमेरिकी सरकार दिखाती रही है, उन देशों की आम जनता अमेरिका विरोधी है।

साल 2011 में अमेरिका और नाटो देशों ने लीबिया में कर्नल गद्दाफी को सत्ता से बेदखल करने के लिये अल कायदा और उससे जुड़े मिलिशियायी गुटों का उपयोग किया, जो कि आज इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया से जुड़ गये हैं। ये वे ही पेशेवर विद्रोही और आतंकी हैं, जिन्होंने मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ जमीनी लड़ाई लड़ी और उनकी हत्या की। जिसने लीबिया को एक ऐसा अस्थिर देश बना दिया है, जहां कहने को भी कोई केंद्रिय सरकार नहीं है। अघोषित रूप से -हालांकि यह खुलेआम है- लीबिया का विभाजन हो चुका है, और हथियारबद्ध मिलिशियायी गुटों के बीच संघर्ष आज भी जारी है।

लीबिया को तबाह करने के बाद वहां के पेशेवर लड़ाकों और हथियारों को अमेरिकी गुप्तचर इकाई सीआईए की निगरानी में सीरिया भेज दिया गया, जहां उन्हें लीबिया की वारदात और तख्तापलट की कार्यवाही को दोहराना था।

सीरिया में इस्लामिक स्टेट को, वाशिंगटन के प्रमुख क्षेत्रीय सहयोगी देश- सउदी अरब, तुर्की और कतर से भरपूर सहयोग मिल रहा है। जिसका मकसद बशर-अल-असद सरकार को सत्ता से बे-दखल करना है। यह वह उद्देश्य है, जिसके लिये अमेरिकी सरकार पिछले एक दशक से लगी हुई है। इसके बाद भी वह घोषित तौर पर इस्लामिक स्टेट के खिलाफ इराक के बाद अब सीरिया पर हवाई हमले कर रही है। वास्तव में अमेरिका ने इस्लामिक स्टेट को काफी मात्रा में हथियार देकर काफी मदद किया है। पिछले साल गर्मी में अमेरिका द्वारा हथियारबद्ध किये गये इराकी सिक्यूरिटी फोर्स के लगभग बिना लड़े हारने और वहां से पलायन के बाद, इस्लामिक स्टेट को भारी मात्रा में अमेरिकी हथियार हाथ लगे। इराकी सरकार के अनुसार- इस्लामिक स्टेट ने लगभग 2300 अमेरिकी हमवी -बख्तरबंद गाड़ी- को अपने कब्जे में ले लिया। टैंक, गोला-बारूद और छोटे हथियारों के संख्या की कोई जानकारी नहीं है।

हालांकि मोसूल और अन्य शहरों का इराकी फोर्स के हाथों से निकल जाना इराक मे अमेरिकी नीति की असफलता को ही प्रदर्शित करता है, जहां कि उसने सालों-साल कई बिलियन डाॅलर इराकी फोर्स को ट्रेनिंग देनेे में खर्च किया। लेकिन अमेरिकी सरकार उसे अपनी असफलता नहीं मानती। उसने इराकी सेना के ऐसे पलायन और पराजयों के जरिये इस्लामिक स्टेट के आतंकियों को भारी मात्रा में हथियारों की आपूर्ति की है।

ऐसी स्थिति में यह सोचा नहीं जा सकता कि सीरिया में जिन उद्देश्यों के लिये ओबामा सरकार सालों से लगी है, उन्हीं उद्देश्यों के लिये लगे, सबसे बड़े हथियारबद्ध इस्लामिक स्टेट को अमेरिकी सहयोग और समर्थन प्राप्त नहीं होगा? सच तो यह है, कि अघोषित रूप से इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने ही वाशिंगटन को सीरिया पर हवाई हमले करने की पृष्टभूमि बना कर दी। यह तो रूस और असद सरकार की अपनी कूटनीतिक एवं राजनीतिक समझदारी है, कि अमेरिकी सेना इस हमले को सीरिया की सरकार और सेना पर हमले की कार्यवाही में नहीं बदल सकी, और अब सीरिया में रूस का खुला सैन्य हस्तक्षेप सिर्फ इस्लामिक स्टेट के खिलाफ ही नहीं, तमाम आतंकी और हथियारबद्ध अमेरिका समर्थित तथ असद सरकार विरोधी आतंकवादियों के खिलाफ हो चुका है। सीरिया की सेना को रूस का सक्रिय सहयोग हासिल है। और यही ओबामा सरकार की बेचैनी है।

यह सवाल गंभीर है, कि क्या यह संभव है, कि एक साल से ज्यादा समय से इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अमेरिका हवाई हमले कर रहा है, इसके बाद भी न तो इस्लामिक स्टेट के आंतकियों की तादाद घटी ना ही उसके कब्जे में इराक और सीरिया के जो क्षे़त्र हैं, उनकी संख्या घटी। जबकि सप्ताह भर के रूसी हमले के साथ ही पाशा पलटता जा रहा है। रूस ने इस बात की घोषणां भी कर दी है, कि सीरिया में तीन से चार महीने में ही उसके सैन्य अभियानों की समाप्ति हो जायेगी।

सच यह है कि सीरिया में अमेरिका अपने लिये जमीन तैयार नहीं कर सका है। 2015 के लिये पेंटागन ने सीरिया के ‘उदर विपक्ष‘ को प्रशिक्षित करने के लिये, जो कि इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ेंगे, के लिये 500 मिलियन डाॅलर का बजट पारित किया है। 16 सितम्बर 2015 को अमेरिका के सेंट्रल कमाॅण्ड के जनरल लाॅयड आॅस्टीन ने कहा कि ‘‘सीरिया में आईएस लड़ाकों के खिलाफ 500 मिलियन डाॅलर के प्रशिक्षण कार्यक्रम में से 40 मिलियन डाॅलर खर्च करने के बाद सीरिया में कुल 4 से 5 लड़ाके -जिन्हें अमेरिका ने प्रशिक्षित किया है- जमीन पर हैं। जबकि लगभग 100 अन्य लड़ाकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।‘‘ अमेरिका जिन लड़ाकों को प्रशिक्षित करता है, वो अपने प्रशिक्षण और हथियारों सहित पूरे संसाधनों के साथ इस्लामिक स्टेट के सहयोगी हो जाते हैं। यह अमेरिकी चालबाजी है, या अमेरिकी नीतियों की असफलता? इसे हम बराक ओबामा और पेंटागन को तय करने दें।

सीरिया की 81 प्रतिशत से ज्यादा आम जनता यह मान कर चल रही है, कि ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ के पीछे अमेरिकी साम्राज्य है। जिसके खिलाफ सही अर्थों में रूस और सीरिया की सेना अब सैन्य कार्यवाही शुरू कर चुकी है। जिसे इस बात की संभावनायें बढ़ी है, कि सीरिया के संकट का समाधान संभव है। इसके बाद भी तय होना बाकी है, कि वह समाधान के कितने करीब है?

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