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अनीता चौधरी की चार कविताएँ

अनीता चौधरी1. हम चुप है

हम चुप है
ये चुप्पी हमारा आभूषण है
डांट से फटकार से
बचपन से अब तो यहीं तो सिखाया है
चुप रहना अनुशासन की निशानी है |
पीने को पानी नहीं है
हम चुप है
रहने को घर नहीं है
ये हमारे पिछले कर्मों का फल है
रोशनी के लिए बिजली नहीं है
बढ़ती जनसंख्या जिसका कारण है
वे ऐसा कहते है
फिर भी हम चुप है
शिक्षा मुफ्त है
चाहे विद्यालय में शिक्षक नहीं है
हम चुप है
अस्पताल तो है इलाज के लिए
लेकिन दवा नहीं है
हम चुप है
चंद लोगों की लगाईं निजी कम्पनियां हैं
जिनमें कामानुसार पगार नहीं है
हम चुप है
मंहगाई मुहँ से निवाला छीन रही है
हम चुप है
हमारी जमा पूंजी विदेशों में
काले धन के रूप में जमा है
हम चुप है
लूट बेईमानी और अपराध
अपने चरम पर है
फिर भी हम चुप है
महिलाओं पर अत्याचार बढ़ रहे है
हम चुप है
आखिर हम कब तक चुप है ?
अगर यूँ ही चुप रहे तो
वो दिन दूर नहीं
जब हम इतिहास को दोहराएंगे
और जर्मनी का हिटलर यहाँ पायेंगे
इसलिए साथियों चुप्पी तोड़ों
और संगठित हो जाओ
अपने हक़ को पाने के लिए एक हो जाओ
जिस दिन सब एक होकर
हंसिया हथौड़ा हाथ में लेकर
सड़कों पर आ जाओगे
उस दिन अपने सारे हक़ पा जाओगे ।

 

2. मिटटी का पहाड़

मिटटी से बना हुआ पहाड़
एकदम तटस्थ
अपनी जगह पर अविचल खडा
हर तरफ तूफ़ान को रोकता हुआ |
हर वक्त अपने होने का एहसास कराता
खुश होता अपनी तलहटी में
खेलता देख मानुष को
इस भ्रम के साथ कि
नहीं कर सकता कोई छेद
उसकी तलहटी में
क्योंकि
वो कर चुका है कायम
एक रिश्ता
उसके साथ |

 

3. अपनापन

हम स्वयं में कितनी जल्दी
पराये हो जाते है।
क्योंकि
उसे अपना न मानने की
भूल कर बैठते है।
और लगातार उससे दूर रहने का
ढोंग करते रहते हैं।
जब कि जानते है कि
वो हमसे दूर नहीं हो सकता है।
और न ही हम
फिर भी हम
अपने को कष्ट देते रहते है।

 

4. एहसास

किस किस आवेग को रोकोगे
जो साथ बन गया है योग
कैसे उसे तोड़ोगे।
मैं कोई सूखी डाल नहीं
जिसे अपने से काट कर
दूर फेंक दोगे।
तुम्हारी धड़कनों में
बसा हुआ गहरा एहसास हूँ।
प्यार में पला विश्वास हूँ।
तुम्हारे अंग से लिपटी सुगंध हूँ।
इतनी सामर्थ नहीं तुम में कि
खुद को अलग कर पाओ
ये अलग बात है कि
मारकर अपनी आत्मा को
हमें ज़िंदा रहने का
आभास कराओ।

 

परिचय:

अनीता चौधरी जी पेशे से शिक्षिका हैं | एक बेहतरीन कवयित्री / लेखिका होने के साथ –साथ वे एक शानदार अभिनेत्री और रंगकर्मी भी हैं | ‘द बिगनिंग’ और ‘कैद’ जैसी सामाजिक मुद्दों पर बनी दो लघु फिल्मों में इनकी अदाकारी काबिले तारीफ हैं |

इनकी कविताओं में जीवन की जटिल अनुभवों को महसूस किया जा सकता है जो गहरी संवेदनाओं से लैस हैं |

प्रस्तुति:- नित्यानंद गायेन

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