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जनतंत्र में जनधु्रवीकरण

imageकिसी भी समाज व्यवस्था की गति यदि थम जाये तो, वह नदी की तरह ही मर जाती है। समस्याओं के टीले उभर आते हैं, आम जनता पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है, कुछ लोगों के पास जरूरत से ज्यादा सबकुछ होता है, और ज्यादातर लोगों के पास कुछ नहीं होता। राजनीति जो है, उसे ही बनाये रखने की वैधानिक कवायतें करने लगती हैं, और जुगाड़ पर टिकी व्यवस्था की सांसें उखड़ जाती हैं। उम्मीदें थमी-ठहरी सी खत्म होने लगती हैं। बाजार और कारोबार को व्यवस्था बनाने का परिणाम अब हमारे सामने है।

भारतीय जनतंत्र पर मंड़राते गिद्ध-कौवों को देख कर शक होने लगा है- क्या वह जीवित है?

यदि वह जीवित है, तो लाशों पर मंड़राने वाले यहां क्यों हैं? क्यों लोगों की उम्मीदें टूट गयी हैं? क्यों जो यूरोपीय संघ के देशों और अमेरिका में हो रहा है, उसे यहां दुहराया जा रहा है?

क्या इसके अलावा हम कुछ और नहीं कर सकते?

यकीन मानिये, बुरा लगता है, यह सोच कर, कि हम एक मरती हुर्इ व्यवस्था में सिर्फ इसलिये जी रहे हैं, कि हमारे पास कोर्इ विकल्प नहीं है, और जो विकल्प है, उसके लिये वर्गगत राजनीतिक चेतना नहीं है। कम से कम भारत में तो यह मान ही लिया गया है, कि यूरोप और अमेरिका से आगे कोर्इ दुनिया नहीं है। अफ्रीका हमारे लिये काले लोगों का ऐसा काला महाद्वीप है, जहां हमारे लिये कुछ नहीं है। आस्ट्रेलिया एक क्रीकेट टीम है। लातिनी अमेरिकी देशों का होना, हमारे होने न होने से खारिज रहा है, जहां उम्मीदें सचमुच बन रही हैं। चेग्वेरा की शक्ल हमारे टी-शर्ट पर एक अर्से से है, मगर हम नहीं जानते कि उन्होंने ऐसा क्या किया कि उनकी सूरत की ख्याति इतनी है? कि आम जनता के पक्ष में सरकारों के खड़ा होने का मतलब क्या है? हम क्यों जनविरोधी सरकारों से घिरे हैं? हमारे साथ आजादी के बाद से अब तक जारी एक हादसा हो चुका है। बुरा लगता है, किसी भी क्रमिक हादसे का चश्मददीद गवाह बनना। उसे देखना ओर परखना और निष्कर्षहीन बने रहना। भारतीय राजनीति में विकल्पहीनता की सिथति रोज बढ़ती जा रही है।

आम चुनाव से पहले, जब भी तीसरे मोर्चे की सुन-गुन सुनायी पड़ती है, या थोड़ी सी हरकत नजर आती है, तो ऐसा लगता है जैसे लुटे हुए लेगों को लूटने के लिये एक तीसरा खेमा भी है।

आप सोच सकते हैं, कि हम भारत की राजनीति में तीसरे खेमें के खिलाफ हैं।

आप यह मानने की भूल भी कर सकते हैं, कि हम दो खेमों की चलती हुर्इ राजनीति के पक्ष में है।

मगर, ऐसा नहीं है। हम यह मानते हैं कि भारत में गठबंधन की सरकार आम जनता की असहमति की वजह से है। उसकी नाराजगी और जो है, उसके प्रति असंतोष की वजह से है। इसलिये बनी हुर्इ सरकारें उसका प्रतिनिधित्व नहीं करती है। देश की आम जनता वैश्वीकरण, मुक्त बाजार व्यवस्था, खुदरा क्षेत्रों में विदेशी पूंजीनिवेश और ऐसे ही बड़े-बड़े मुददों को नहीं जानती, मगर, इतना जरूर जानती है, कि उसकी सिथतियां बिगड़ती जा रही है। हर एक चीज की कीमतें बढ़ गयी हैं। भूख, गरीबी, और बेरोजगारी है। वह अपनी समस्याओं का समाधान चाहती है। उसकी राजनीतिक अपरिपक्वता उसे धोखा खाने के लिये विवश कर देती है, मगर उसे सही विकल्पों की खोज है। वह गठबंधन के विकल्प से सहमत नहीं है। फिर भी वह मतपत्रों के प्रति संवेदनशील है।

यही वह चीज है, जो हमें मतदान और मतपत्रों के बारे में नये सिरे से सोचने के लिये विवश करती है। इसे व्यवस्था में परिवर्तन के लिये गैर-जरूरी करार नहीं दिया जा सकता। जनमत और जनभावों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इसे जन हथियार और जन औजार में बदला जा सकता है। मतपत्रों से भी जनक्रांति संभव है।

मौजूदा समाज व्यवस्था में परिवर्तन के लिये दो बातें बिल्कुल साफ हो जानी चाहिये कि-

1. हम मतदान और मतपत्रों के विरूद्ध नहीं हैं। और

2. जो है, उसे बनाये रखने के लिये, हमें किसी खेमे की जरूरत नहीं है। हम सही विकल्प बनने के लिये तसीरे मोर्चे के पक्ष में हैं।

‘कहीं का र्इंट, कहीं का गारा’ से मोर्चा खड़ा करना, या खेमें की बुनियाद रखना, गलत है। भारत की वामपंथी राजनीतिक दलों के द्वारा जब भी ऐसी पहल की जाती है, वह पहल केंद्र में अपनी सरकार बनाने के लिये नहीं, बलिक, जनतंत्र के लिये साम्प्रदायिक ताकतों को सरकार बनाने से रोकने के लिये होती हैं। जिसका कोर्इ अर्थ नहीं है। साम्प्रदायिक ताकतों का उपयोग बाजारवादी शकितयां कर रही हैं, इसलिये सत्ता तक किसी को रोकने के साथ सरकार बनाने के लिये एकजुट होने की अनिवार्यता है। वामपंथी -लोकतांत्रिक ताकतों की एकजुटता का मतलब वामपंथ को लोकतंत्र के पीछे डालना नहीं, बलिक समाजवादी लोकतंत्र के लिये तीसरे मोर्चे का गठन करना है। भारत में वाममोर्चा लोकतांत्रिक ताकतों के साथ मिलकर तीसरे मोर्चे में बदलने का संघर्ष कर पायेगी या नहीं? हम नहीं कह सकते, क्योंकि विकास के जरिये समाजवाद का नजरिया कमजोर है, लेकिन, उन्हें इस बात की अनदेखी नहीं करनी चाहिये, कि भारत में मनमोहन सिंह के उदारीकरण ने देश के सभी राजनीतिक दलोंं के वित्तीय कार्यक्रमों को प्रभावित किया है और देश में बाजारवादी शकितयों को इतनी बढ़त मिल गयी है, कि सभी राजनीतिक दलों के विकास की आर्थिक दिशा एक हो गयी है। वो वित्तीय पूंजी के गिरफ्त में है। मुक्त बाजारवाद की उनकी समझ ढ़ीली-ढ़ाली है।

देश में किसी भी समाजवादी परिवर्तन से पहले और परिवर्तन के बाद, साम्राज्यवादी ताकतों के हस्तक्षेत्र से इंकार नहीं किया जा सकता। प्रतिक्रियावादी ताकतें पहले से एकजुट हैं। दो प्रमुख विरोधी दल -कांग्रेस और भाजपा- और दो प्रमुख गठबंधन -यूपीए और एनडीए- की सोच, समझ और विकास की अर्थपरक दिशा एक है। इन गठबंधनों के राजनीतिक दल दबाव बनाने और सुविधा हासिल करने के लिये पलड़े में पड़े मेढ़कों की तरह हैं। उछल-कूद भी वैसे ही करते हैं। आम जनता के प्रति प्रतिबद्धता से ज्यादा इन दलों की प्रतिबद्धता सरकार में शामिल होने के प्रति है। केंद्र में वो अपनी दखल चाहते हैं, और राज्यों में अपनी सरकारें। इन्हीं कारणों से तीसरे मोर्चे के लिये भारतीय राजनीति में जगह नहीं है। आम जनता पहले से ही राजनीतिक अनास्था की शिकार है।

इस तरह देखा जाये तो, भारत की राजनीतिक सिथतियां जटिल हैं। बड़ी अनगढ़ता है। देश की असहमत आम जनता, एक साथ दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ी है। मतदान और मतपत्रों के प्रति वह संवेदनशील है, मगर लगे हाथ वह राजनीतिक अनास्था का शिकार है।

ये विपरीत सिथतियां आपस में पीठ जोड़ कर नहीं खड़ी हैं, हालांकि ऊपर से देखने पर कुछ ऐसा ही लगता है। वास्तव में विपरीत परिसिथतियों के कंधे आपस में जुड़े हैं। हम कह सकते हैं, कि मौजूदा राजनीतिक विसंगतियों, आर्थिक असमानता और चौड़ी होती खार्इयों ने इन्हें ऐसा बना दिया है। अनास्था और विकल्पहीनता किसी भी व्यवस्था के लिये खतरे की घंटी है। और भारत में यह घंटी बज रही है, साम्राज्यवादी शकितयां, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां, निजी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और देश के औधोगिक घरानों के लिये इतनी जगह बना दी गयी है, कि देश की आम जनता के लिये, उसके हितों और जरूरतों के लिये, देश की चुनी हुर्इ सरकार में कोर्इ जगह नहीं बची है। आर्थिक विकास को ही सामाजिक विकास मान लिया गया। विकास योजनाओं का अर्थ बदल गया है। शहरों से लेकर गांवों तक जन-समस्याओं का विस्तार इतनी तेजी से हो रहा है, कि उन्हें भुलावे में रख पाना, अब संभव नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी यथा सिथतिवादी आंदोलन, साम्प्रदायिक दंगे और आतंकवादी हमले के भय से उन्हें न तो रोका जा सकता है, ना ही बरगलाया जा सकता है।

भारतीय जनतंत्र में जनधु्रवीकरण की शुरूआत हो गयी है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह धु्रवीकरण शहरों की अपेक्षा तेज है, क्योंकि राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के किसानों से जमीन लेने, खदानों के लिये गांवों को खाली कराने तथा आर्थिक विकास के लिये बांध निर्माण जैसी योजनाओं की मार ग्रामीण क्षेत्रों की जनता को ही भोजगना पड़ता है, विस्थापन और पलायन की मार भी वही सह रहा है। नक्सलवादियों के नाम से सरकारी दमन भी सबसे ज्यादा वहीं हुआ है। जिन मुददों को लेकर शहर आंदोलित होता है, उन मुददों को सहने की उन्हें आदत पड़ गयी है। भ्रष्टाचार, महिलाओं पर अत्याचार और समाजिक असुरक्षा के मुददे को लेकर हुए जनप्रदर्शन और जनसंघर्षों को समाज व्यवस्था में परिवर्तन (मूलभूत) के रूप में हम नहीं देख सकते, मगर अपनी समस्याओं को अपने हाथों में लेने की पहल के रूप में इसे जरूर देख सकतें हैं, जिसमें राजनेताओं और राजनीतिक दलों को बाहर ही रोक दिया गया था।

आम जनता के द्वारा अपनी समस्याओं को अपने हाथों में लेने की पहल, हमारे लिये विशेष है। वैसे भी दुनिया की आम जनता अपनी सरकार दुनिया की साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ अपनी तादाद से लड़ना सीख गयी है। भारत भी उससे अछूता नहीं रह सकेगा, क्योंकि समस्याओं का वैश्वीकरण हो गया है।

यह ठीक है, कि सामाजिक जन चेतना स्तर खास अच्छा नहीं है। यह भी ठीक है, कि बाजारवादी शकितयों ने राजसत्ता पर अधिकार जमा लिया है, और वित्त व्यवस्था में उन्हें बढ़त हासिल है। यह भी ठीक है, कि देश की प्रमुख राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता बदल गयी है, और किसी निर्णायक राजनीतिक धु्रवीकरण की तत्काल सम्भावनायें नहीं हैं। जनतंत्र पर गिद्ध और कौवों की तादाद बढ़ गयी, मगर यह भी तय है कि समाज में नाराजगी और जन असंतोष है। जोकि जनधु्रवीकरण का आधार है।

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