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यूरोप में अमेरिकी साझेदारी से बढ़ता अविश्वास

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दशकों से यूरोप अमेरिकी साम्राज्य के सदस्य देशों की तरह उसके पीछे चलता रहा है, आज भी यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की सरकारों की स्थितियां यही हैं, कि वो अमेरिकी हितों से संचालित हो रही हैं, किंतु 2007-08 के वैश्विक मंदी के बाद से यूरोप की आम जनता अपने देशों की सरकार ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और यूरोपीय संघ सहित अमेरिका विरोधी हो गयी हैं। मुक्त व्यापार के जिन समझौतों से उनके देश की सरकारें जुड़ रही हैं, आम जनता उन व्यापार समझौतों के खिलाफ है।

10 अक्टूबर को ‘ट्रांस अटलांटिक ट्रेड एण्ड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप‘ के विरोध में सेण्ट्रल बर्लिन में 1,00,000 से अधिक लोगों ने प्रदर्शन किये। यह व्यापार समझौता अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच होना है। जिसके बारे में जानकार और समीक्षकों का कहना है, कि ‘‘यह समझौता यूरोप के आम लोगों की कीमत पर बड़े काॅरपोरेशनों को लाभ पहुंचाने का समझौता है।‘‘ उनका मानना है, कि इससे यूरोप की आम जनता की हालत और बिगड़ जायेगी।

इस रैली के आयोजकों में ट्रेड यूनियन, इन्वायरमेंटल ग्रूप और जर्मनी के विपक्षी राजनीतिक दल शामिल थे। यह विरोध प्रदर्शन बर्लिन के मुख्य रेलवे स्टेशन से शुरू हो कर नेशनल पार्लियामेंट तक गया। प्रदर्शन में शामिल लोगों का अनुमान है, कि इस रैली में 2,50,000 लोगों ने हिस्सा लिया, लेकिन बर्लिन पुलिस का कहना है, कि 1,50,000 लोगों ने भाग लिया।

प्रदर्शनकारी ड्रम और सीटी बजा रहे थे, उनके पोस्टरों पर लिखा था- ‘‘यस, वी कैन स्टाॅप टीटीआईपी‘‘ (हां, हम रोक सकते हैं, ट्रांस अटलांटिक ट्रेड एण्ड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप को)। प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा समूह लकड़ी का घोड़ा लेकर आया था, जो कि ग्रीस के ‘ट्रोजन हाॅर्स‘ का प्रतीक था। प्रदर्शनकारी इस प्रतीक से यह प्रदर्शित कर रहे थे, कि कैसे यह समझौता काॅरपोरेट के लाॅबिंग के जरिये और यूरोपीय संघ के अधिकारियों को धोखा दे कर चुपके से कानून का दर्जा हासिल कर लेंगे।

‘ट्रांस अटलांटिक ट्रेड एण्ड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप‘ का मकसद अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच के व्यापार को उदारीकरण की नीति के तहत बेहतर बनाना है, इससे दसों बिलियन डाॅलर का अतिरिक्त मुनाफा होगा।

आज तक मुक्त व्यापार और उदारीकरण की नीतियों के तहत जितने भी व्यापारिक समझौते एवं साझेदारियां हुई हैं, उसका लाभ उन देशों की आम जनता और सरकारों को नहीं मिला है, बल्कि निजी कम्पनियों एवं काॅरपोरेशनों ने ही भारी मुनाफा कमाया है। इन्हीं माध्यमों से उन्होंने विश्व अर्थव्यवस्था पर अपने वर्चस्व को उस सीमा तक बढ़ा लिया है, कि वो निर्णायक बन गये हैं। अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की हालत ऐसी है, कि अपने देश की आम जनता से ज्यादा निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों को मुनाफा पहुंचाने, उनके हितों के लिये काम कर रहे हैं। अमेरिका के लिये ‘नाॅर्थ अमेरिकी फ्री ट्रेड एग्रिमेण्ट‘ वास्तव में एक घाटे का समझौता है, इसके बाद भी वह अपने राष्ट्रीय एवं आम अमेरिकी के हितों के खिलाफ इस समझौते से न सिर्फ जुड़ा हुआ है, बल्कि, वह ऐसे ही ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप‘ के षड़यंत्र में शामिल है। जिसका मकसद निजी कम्पनियों और दैत्याकार काॅरपोरेशनों का हित है।

ट्रांस अटलांटिक पार्टनरशिप के लिये यूरोप के समीझकों को डर है, कि इससे यूरोप की (आर्थिक एवं वैधानिक) सुरक्षा में तेजी से गिरावट आयेगी। इससे उपभोक्ता का हित प्रभावित होगा। भोजन एवं स्वास्थ्य तथा श्रमिकों के जीवन स्तर में गिरावट आयेगी, वह गिरकर अमेरिका के स्तर पर पहुंच जायेगा। यूरोप में खाद्य सुरक्षा (जेनीटिकली माॅडिफाइड फूड्स) और कामगरों के हित जैसे मुद्दों पर नियम काफी सख्त हैं, जबकि अमेरिका में ऐसा नहीं है। लोगों की आशंका है, कि यूरोप और अमेरिका के बीच की इस साझेदारी का परिणाम उनके लिये घातक होगा। वैसे भी आज यूरोप का जो भी संकट है, वह उसकी मुक्त व्यापार की नीति और बाजारवादी अर्थव्यवस्था की वजह से है।

इस साझेदारी के लिये सरकारें, जिस गुप्त तरीके से वार्ताओं का दौर चला रही हैं, और आम लोगों की पहुंच से, जिस तरह समझौतों की शर्तों को छुपाया जा रहा है, उसकी वजह से संदेह और संशय का वातावरण बन गया है। यूरोप की आम जनता यह मान रही है, कि अमेरिका के साथ की जाने वाली यह साझेदारी उनके हित में नहीं है। ‘ट्रांस अटलांटिक ट्रेड एण्ड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप‘ के वो विरूद्ध है। जर्मनी में तो लोग सड़कों पर हैं।

जून में एमनिड द्वारा कराये गये जनमत संग्रह में 36 प्रतिशत जर्मन इस साझेदारी के विरूद्ध हैं, वो इसे यूरोप के लिये गलत मानते हैं। जबकि पिछले साल फरवरी में यह आंकड़ा 25 प्रतिशत था। और यह विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है।

प्रदर्शनकारियों ने ‘कम्प्रीहेन्सिव इकोनाॅमिक एण्ड ट्रेड एग्रीमेण्ट‘ का भी विरोध किया। यह यूरोप और अमेरिका के बीच ट्रांस अटलांटिक पार्टनरशिप की तरह ही यूरोप और कनाड़ा के बीच होने वाला करार है, जिस पर वार्तायें चल रही हैं।

यूरोपीय संघ का नेतृत्व वास्तविक रूप में जर्मनी के हाथों में है। जहां अमेरिका के प्रति अविश्वास लगातार बढ़ता जा रहा है। जर्मन कम्यूनिकेशन के ‘मास इलेक्ट्राॅनिक सर्विलांस‘ के खुलासे के बाद से लोगों की नाराजगी बढ़ गयी है। दूसरी ओर यूरोप जिस ‘शरणार्थी संकट‘ को झेल रहा है, उसने भी लोगों की नाराजगी को बढ़ा दिया है। वो मानते हैं, कि यूरोप का शरणार्थी संकट मध्यपूर्व एशिया में अमेरिका की नीतियों की असफलता का परिणाम है।

यह खुली सच्चाई है, कि शरणार्थी संकट के बारे में यूरोप की सरकारों की नीतियों के पक्ष में वहां की आम जनता नहीं है। वह इस बात को मान कर चल रही है, कि इस संकट के मूल में अमेरिका और यूरोपीय संघ की नीतियां हैं। यूरोप में यदि वास्तव में आम जनता की चुनी सरकारें बन जायें तो ‘ट्रोइका‘ ही नहीं अमेरिका के लिये भी यूरोप में जगह नहीं होगी। रूस पर लगाये गये अमेरिकी प्रतिबंधों और यूरोपीय संघ की नीतियों ने भी यूरोप की आम जनता को इसके लिये विवश किया है, क्योंकि रूस की जवाबी कार्यवाहियों ने -जिसे वो गलत नहीं मानते- यूरोप के आर्थिक संकट को बढ़ा दिया है।

यूरोप की लड़खड़ाती हुई अर्थव्यवस्था जर्मनी के लिये भी गंभीर चेतावनी है।

10 अक्टूबर का विरोध प्रदर्शन, जिसमें जर्मनी की ट्रेड यूनियनें, नागरिक अधिकारों के पक्षधर संगठन और आॅक्सफेम, ग्रीन पीस जैसे पर्यावरण संगठनों ने हिस्सा लिया, जर्मनी में अब तक का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन है।

जर्मनी के प्रसारण कर्ता -जेड डी एफ द्वारा कराये गये सर्वे के अनुसार- ‘‘जिन 3000 लोगों के बीच सर्वे कराया गया उनमें से 88 प्रतिशत लोगों का कहना है, कि ट्रांस अटलांटिक पार्टनरशिप से जर्मनी की अर्थव्यवस्था को कोई लाभ नहीं होगा।‘‘

मई 2015 में कराये गये यूरोबैरोमीटर पोल के अनुसार- ‘‘51 प्रतिशत जर्मन लोगों ने कहा, कि वो ट्रांस अटलांटिक पार्टनशिप के विरूद्ध हैं। 31 प्रतिशत लोगों ने ही इस साझेदारी का समर्थन किया था।

इसके बाद भी, यदि इस सझेदारी का करार होता है -जिसकी अशंका है- तो अमेरिकी विरोध का बढ़ना तय है।

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