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अकादमी सम्मान- जनआकांक्षाओं के सांचे में खुद को ढ़ालने का सवाल

Sahitya

आपात काल (1975)

और आपात काल के बाद (1977)

इन दो सालों का दो दृश्य मुझे याद है, जिसे आप अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के हनन के खिलाफ प्रतिकार और चाहें तो परिणाम के रूप में देख सकते हैं।

एक- आपात काल अपने चरम पर था। किसी भी प्रकाशन और पत्र-पत्रिकाओं को सेंसर बोर्ड से हो कर गुजरना पड़ रहा था। आप समझ सकते हैं, कि सरकार की स्याही कितनी काली होती है। अभिव्यक्ति पर काली स्याही पोत दी जाती थी। कमलेश्वर जी के द्वारा एक साहित्यिक पत्रिका निकलती थी- सारिका। सेंसर बोर्ड से ‘पास‘ काली स्याही से पुति, एक अंक को उन्होंने उसी रूप में प्रकाशित कर दिया। कहानियां संदर्भहीन शब्दों के बीच काली स्याही में डूबी हुई थी, जिनका कोई अर्थ नहीं बनता।

हुक्मरां को दिया गया जवाब बिल्कुल साफ था- आप हमें जो देंगे, हम पाठकों के सामने वही रख देंगे।

आम जनता के सामने परोसी गयी थाली में सिर्फ कालिख थी।

जिसे मैं आज तक नहीं भूल सका हूं।

जिस सोच का गला आप घोंटेंगे उसके शब्द तो खीचेंगे ही सरकार। मूक शब्दों की मार भी मुखर होती है।

दो- आपात काल के बाद का आम चुनाव और चुनाव परिणाम के बाद का दृश्य।

एक तस्वीर-

कूड़े का ढूह लगा था। दीवारों से पोस्टर उखाड़े जा रहे थे। उस कचड़े के ढूह में आम चुनाव के पोस्टरों की भरमार थी। लेई से पुते, पानी से भीगे, उखाड़े गये पोस्टरों में श्रीमती इंदिरा गांधी पड़ी थीं। उनकी सूरत झांक रही थी। अधिकार बोध से पीडि़त प्रभावशाली सूरत की निरीहता झांक रही थी।

‘आपने हमें जो दिया, उसे ही हमने वापस किया है।‘‘ कहती हुई।

सरकार! आवाम उनके लिये डरने की चीज है, जो जुबान पर ताला जड़ने और उसे धोखा देने की फिराक में रहते हैं।

आपने हमें धोखा दिया

और धोखे में आपकी जान गयी।

जान हमारी भी गयी।

जान से हाथ लोकतंत्र को भी धोना पड़ा।

अब जान से हाथ धोने की नौबत फिर से आ गयी है।

जिस बुद्धिजीवी वर्ग की कांख दबी रहती थी और मुट्ठियां भी भिंची रहती थीं, उसके कांख में अब खुजली होने लगी है। हाथ उठाये बिना अब काम नहीं चल रहा है।

आपने यह कह तो दिया कि कांख खुजाने के लिये हाथ उठाना जरूरी नहीं है। मगर आप बतायेंगे कि बंधी हुई मुट्ठियों का हम क्या करें? या आप क्या करेंगे?

अभी तो सम्मान ही लौटाये जा रहे हैं, जब सम्मान के वापसी की आवाज उठेगी, तब आप क्या करेंगे? कहां जायेंगे? शब्दों का गला कैसे दबायेंगे? सोच को कैसे मार पायेंगे?

मामला टेढ़ा है जनाब,

आपके पास जुबान खींचने की ताकत तो है, मगर खींची गयी जुबान को आप कहां रख पायेंगे?

और यदि यह बात सचमुच फैल गयी, तो दृश्य नम्बर- दो से आप कैसे बच पायेंगे? जिसका डर तो आपको होगा ही, क्योंकि काॅरपोरेट भी उसी के पीठ पर हाथ रखता है, जिसके लिये लोग तालियां बजाते हैं।

अब, जिन्होंने पुरस्कार और सम्मान से किनारा किया, उन्हें सलाम के साथ सवाल,

यदि यह वापसी जो दिख रहा है- हिंसा, हत्या, साम्प्रदायिकता, उन्माद और अभिव्यक्ति के खिलाफ काली कवायतें- उससे किनारा कशी है, तो कोई खास नहीं, लेकिन यह वापसी इस कालिख को पोछने और ऐसी व्यवस्था को बदलने का खयाल है, जो रक्त बीजों को पुर्नजीवित कर लोगों को अपने सांचे में ढ़ालने में लगा है, तब कोई बात है।

आप तय करें, हम आम जनता के बीच आपकी राह देख रहे हैं, जहां दबी हुई कांख और भिंची हुई मुट्ठियों की मांग नहीं, जो आप कहते और चाहते हैं, उसी के साथ जीने की मांग है। खुद को और सरकार को जन आकांक्षाओं मे सांचे में ढ़ालने का सवाल है।

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