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नीता पोरवाल की छः कविताएं

नीता  पोरवाल1. आज नही तो कल

आज नही तो कल
वे बना सकते हैं तुम्हें भी
दादरी और बनारस!
इतनी हैरत से मत देखो
तुमसे, हाँ, तुम्ही से मुखातिब हूँ मैं

क्योंकि
मचानों पर बैठकर
देख लिया है उन्होंने तुम्हारा सिरफिरापन
किस आसानी से
बना लेते हो धूर्त पाखंडियों को
तुम अपना ईश्वर
भेंट स्वरुप अर्पित कर देते हो
उनके कदमों में
तुम अपना विवेक

जानते हैं वे
उनकी ‘हुआ-हुआ’ सुनते ही
तुम मुंह उठाये भाग उठोगे
लाठी और बल्लम लेकर
अपने ही साथियों के रक्त से
रंग डालोगे माटी को तुम
फूंक डालोगे अपने ही हाथों
एक रोज तुम अपना वतन

 

2. वे

वे दौड पड़े हैं उन्मत्त हाथियों की तरह
सुनहला राज सिंहासन पाने के लिए
न सिर्फ रौंदते हुए घास और उड़ाते हुए धूल
देखो वे सूंड में दबा कर गरदनें
पटक-पटक अधमरी कर रहे इंसानियत

वे रातोरात निकलते हैं बिलों से
बड़ी-बड़ी पूँछ वाले चूहों की तरह
और चट कर रहे हैं बहुत होशियारी से
लहलहाती फसल के साथ तुम्हारा विवेक भी

सत्ता के इन पिपासुओं ने
जहरीले कर दिये हैं गिनती के रह गए मीठे सरोवर
घोल दिया है शरद की हवाओं में
जले हुए टायरों का दमघोंटू धुंआ

सभ्य से नज़र आते वे
मंच पर कस रहे हैं फब्तियां
विदूषकों की तरह खींच रहे हैं एक दूजे की टोपियां
सिर्फ पाने के लिए राज सिंहासन
वे शैतान से भी मिला रहे हैं हाथ

 

3. यह वह प्रेम है

यह
वह प्रेम है
जिसकी इफरात के वावजूद
नफरत से ही अटी दिखती है सारी कायनात

यह
वह प्रेम है
जो जमीं में दब अंकुरित होने का दर्द
झेलने के वजाय पलक झपकते ही बन जाता है
गुंचों वाला एक खूबसूरत शज़र

यह
वह प्रेम है
जो आखिरी साँसे भरते अपने कुछ निशानों पर
बिछा देगा अपने ही हाथों
तारकोल की स्याह परत

यह
वह प्रेम है
जब “प्रेम” लफ्ज़ आते ही
उसकी अपनी ही जुबां पर
फूट पड़ेगे एक रोज़ हरहरा कर अनगिनत छाले

ओ पग्गल !
यह वह प्रेम नहीं
यह प्रेम की धुन को बेसुरा बनाते हुए
प्रेम को इस जहां से
अलविदा कहने की एक साज़िश भर

 

4. सुना , सुना तुमने ?

अब जब
लुढकते हैं दिन
रीती सुराही की तरह
जब बाँध देती हूँ
शाम की कतरने
पेड़ की टहनियों से
किसी टोटके की तरह
इंकार कर देता है तब
मेरा अपना ही साया
मुझे पहचानने से
तब रात की स्लेट पर
उभर आती अपनी तस्वीर से
चीखते हुए कहती हूँ मैं ..
‘दया के पात्र हैं सिर्फ़ वे
जिनके पास बेशुमार वजहें थीं
निर्मम होने के लिए ! ’
सुना , सुना तुमने ?

 

5. मरजानी लडकियां

न जाने कहाँ से
ले आती हैं अपने हिस्से की
हवा औ धूप
और पलक झपकते ही
घर-आंगन में महक उठती हैं हरे धनिया सी
ये मरजानी लडकियां

गोल-मटोल नन्ही कलाइयों में
झमक कर पहन लेती हैं चूडियाँ माँ की
और खनक उठती हैं चूडियों सी ही
ये मरजानी लडकियां

न संवारों न दुलारो तो भी
न जाने कब और कैसे
ओक में भर लेती हैं अपने हिस्से की चांदनी
ये मरजानी लडकियां

नींद में भी चल देती हैं
संवारने बिखरा हुआ घर
कजरी सी गूंज उठती हैं बियाबानों में
ये मरजानी लडकियां

कहने को तो
कपास सी उड़ी फिरती हैं हवाओं संग
पर रो उठती हैं अक्सर मुस्कुराते हुए
ये मरजानी लडकियां

चटके दर्पण में निहारती हैं
अपनी आँखों की चमक
और खुद पर ही हो उठती हैं निसार
ये मरजानी लडकियां

 

6. वे अलबेले चितेरे

वे रंग रहे हैं दीवारें
एक अलबेले चितेरे से

वे रंग रहे हैं दीवारें
जैसे पत्तियों को रंगती है धूप
जैसे पूर्व दिशा को रंगती है भोर

वे रंग रहे हैं
हमारे घर और गलियारे
सिर्फ इसलिए नही
कि सुलग सके चूल्हा
उनके घरों में सांझ ढले

रंगते-रंगते दीवारें
देखो वे बन गए हैं माँ सरीखे
माँ, जो देखती ही भांप लेती है
अपने लाडले का मिजाज़
माँ, जो बखूबी जानती है
कि कौन सा हिस्सा मांगता है
उससे खास तवज्जो

वे रंग रहे हैं दीवारें
अपने छिले कटे हाथों की
परवाह किये बगैर
वे संवार रहे है उन्हें
सुनाते हुए लोरियाँ
उन्हें निहारते हुए बार-बार
वे बना रहे हैं उन्हें
देखो कैसा सजीला और सुंदर

-नीता पोरवाल

 

परिचय :

नाम : नीता पोरवाल
जन्म : 15 जुलाई
शिक्षा : परा स्नातक (अर्थशास्त्र ) बी. एड
सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन व अनुवादक
स्थल : अलीगढ ( उत्तर प्रदेश )
प्रकाशित कृतियाँ : समय–समय पर “वंचित जनता”, ‘कृत्या’ ‘अहा जिंदगी’, ‘हमरंग’, ‘वर्ड्स प्रेस’ व अन्य अनेक पत्र- पत्रिकाओं में कवितायें व कहानियां प्रकाशित
पुस्तकें : ‘पगडंडिया’, ‘सुनो समय कुछ कहता है’ व “बालार्क’ काव्य संग्रहों में रचनाएँ संकलित .
अनुवाद : टैगोर की लघु कविताओं , बांग्ला बाउल गीतों व देश-विदेश के कथाकारों व कवियों की कविताओं व कहानियों का हिंदी भाषा में अनुवाद
ई-मेल : neeta.porwal4@gmail.com

प्रस्तुति:- नित्यानंद गायेन

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5 comments

  1. nivedita srivastava

    नीता पोरवाल जी की कविताएँ चिंतन को नयी दिशा देने में पूर्णतया समर्थ।सामाजिक परिदृश्य का बेलाग चित्रण समाज की उन्नति में सहायक।मेरी अशेष शुभकामनाएँ।

  2. नीता पोरवाल की हर रचना…अपने आप में परिपूर्ण..) अपनी बात अपने मक़सद को बखूबी उकेरती हुई….कभी कुनैन सी कड़वी सच्चाई उगलती हुई…तो कभी रुई के फाहों पर रची ओस सी…तो खूब तलवे सहलाती मुलायम दूब सी….
    वाह…उत्कृष्ट सृजन..!

  3. यह
    वह प्रेम है
    जो जमीं में दब अंकुरित होने का दर्द
    झेलने के वजाय
    पलक झपकते ही बन जाता है
    गुंचों वाला एक खूबसूरत शज़र
    ह्म्म्म्म्म्म्…….

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