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बनारस में क्या हो रहा है?

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बनारस का बिगड़ा हुआ माहौल कहने को नियंत्रण में है।

सरकार और प्रशासन अपनी मुस्तैदी दिखा रही है।

घोषणां के अनुसार-

20 से 26 अक्टूबर तक काशी की निगरानी 3 ड्रोन करेंगे। 45 सीसी टीवी कैमरे संवेदनशील इलाकों में लगायें जा चुके हैं। 150 वीडियोग्राफरों की नियुक्ती की गयी है। पीएसी सीमा सुरक्षा बल और रैपिड एक्सन फोर्स की 15 कम्पनियां तैनात हैं। जनपद पुलिस के अलावा 3,000 पुलिसकर्मी आस-पास के जिलों से बुलाये गये हैं। सीतापुर से अंश्रुगैस और रबर बुलेट की आपूर्ति हो गयी है। बम निरोधक दस्ता एंटी सबाटोज टीम और डाॅग स्क्वाॅड की व्यवस्था है। सर्विलांस कार्यक्रमों की शुरूआत हो गयी है।

अन्याय प्रतिकार रैली के दौरान गोदौलिया बवाल के बाद 100 लोगों को बवाल मचाने वालों के तौर पर चिन्हित किया गय है और 68 लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है। कांग्रेसी नेताओं पर गाज गिर रही है। भाजपायी सुरक्षित है। संतों को न छूने की सतर्कता है। और भी बहुत कुछ है, जो विसंगतियों को दर्शा रही है। मामला मूर्तियों के विसर्जन का है।

गंगा पवित्र है।

गंगा प्रदूषित है।

विवादों में आग और हवा दोनों है।

मामलें को हिंदूवादी संगठनों और संतों ने बढ़ाया है। जो भाजपा समर्थक हैं। जिनसे संघ प्रमुख मिलते हैं। आहत होते हैं। भाजपायियों के लताड़ते हैं। संतों के साथ होते हैं। रामनगर का रामलीला देखते हैं।

मोदी जी किससे नाराज हैं और किससे खुश? इस बात की खोज हो रही है।

मीडिया में खबरे गायब सी है।

सोचने का आधार है, कि अघोषित सेंसर जारी है।

विवाद के मूल में भाजपा से जुड़े हिंदू संगठन और उसके पक्षधर संत समाज है, तो प्रदेश की सपा सरकार भाजपा के कार्यक्रमों को ही सुरक्षा और व्यवस्था के नाम पर लागू कर रही है।

किसी के लिये यह सवाल नहीं है, कि ड्रोन से निगरानी, सीसी टीवी कैमरे की घूरती आंखें और सर्विलांस प्रोग्राम की शुरूआत का मतलब क्या है?

ऐसे मुद्दों को क्यों खड़ा किया जा रहा है, जिससे चेहरा ही काला होना है, और जिसके जरिये व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता पर, उसकी निजता पर हमला होना है।

सबकुछ शुरू हो चुका है।

यह प्रदेश सरकार के जरिये केंद्र के कार्यक्रमों को लागू करना है या भाजपा संघ के जिस राष्ट्रवादी नजरिये से संचालित हो रही है, उसी का विस्तार है? जिसका लाभ वित्तीय ताकतों को मिलना है, और जिसका खामियाजा देश की आम जनता को ही भुगतना होगा।

देश भर में साम्प्रदायिकता के उन मुद्दों को खड़ा किया जा रहा है, जिसके आगे आम जनता को यह देखने की फुर्सत नहीं मिलेगी कि केंद्र की मोदी सरकार राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों के साथ मिल कर अर्थव्यवस्था का निजीकरण कर रही है।

आज बनारस में कानून और व्यवस्था और सुरक्षा के नाम पर जिन निगरानी कार्यक्रमों को जायज ठहराया जा रहा है, आने वाले कल में सरकार के जन विरोधी कार्यक्रमों के खिलाफ जनप्रदर्शनों और जन प्रतिरोधों को भी कुचला जा सकेगा। राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय तानाशाही का खतरा पैदा हो चुका है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि इसे साम्प्रदायिकता सद्भावना के लिये खतरा माना जा रहा है, जबकि दूसरे सम्प्रदाय -मुसलमान या अन्य- की कोई भूमिका नहीं है। उनकी कोई सम्बद्धता नहीं है। यह सिर्फ और सिर्फ हिंदू सम्प्रदाय के उन लोगों का मुद्दा है, जो गंगा को पवित्र भी मानते हैं, और गंगा में मूर्तियों के विसर्जन को अपनी परम्परा भी मानते हैं। यदि विवाद की बात करें तो यह विवाद केंद्र की योजना, राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन और हिंदू सम्प्रदाय के उन लोगों के बीच का मुद्दा है, जो परम्परा की लकीर पीट रहे हैं। परिपाटी का राग अलाप रहे हैं और उसे हिंदुत्व से जोड़ रहे हैं। जो केंद्र की सत्तारूढ़़ राजनीतिक दल के प्रबल समर्थक हैं।

इसलिये, यह विवाद भाजपा के द्वारा प्रायोजित भी हो सकता है और इसका लाभ उठाने की नीति भी हो सकती है। उसके दोनों ही हाथ में, उसके अपने लोग हैं। आम भाजपायी की सम्बद्धता प्रमाणित है, संघ भी सम्बद्ध है, हिंदूवादी संगठनो के हाथ में कमान है, लेकिन राजनीतिक दल के रूप में भाजपा अपनी असम्बद्धता दिखा रही है। राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन के विरूद्ध इन संगठनों और संतों का आरोप है। हिरासत में कांग्रेसियों के होने का मुद्दा है, जो केंद्र की ‘सुरक्षा नीतियों‘ से संचालित हो रही है।

अब राजनीतिक हितों के लिये भाजपा मुखर हो रही है। विश्व हिंदू परिषद दहाड़ रहा है। ‘दुर्गा मूर्तियों का विसर्जन गंगा में ही होगा‘ का माहौल बन रहा है। देश भर में हिंदुत्व और ऐसे ही साम्प्रदायिक मुद्दों का माहौल बनाया जा रहा है। शिवसेना महाराष्ट्र में भारत-पाक क्रिकेट और संघ पूरे देश में गो-मांस का कमाल दिखा रहा है। फाॅसिस्ट ताकतों के साथ वित्तीय ताकतों की अच्छी बन रही है। बनारस सबक बन रहा है।

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One comment

  1. पद्मनाभ

    मोदी सरकार अर्थव्यवस्था का निजीकरण कर रही है? या फिर उदारीकरण के उस बेताल को ढो रही है जिसे जाते जाते कांग्रेस ने उसके कन्धे पर लादा है। निजीकरण क्या पिछले एक वर्ष की नीति है? या पश्किम के दबाव मे दो दशक पहले दस्तखत किया मुक्त व्यापाल समझौता। और अब यह न केवल विककासशील देशों को डस रहा वरन विकसित देश भी इसके नागपाश में आ चुके हैं।

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