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सोशल मीडिया के दौर में हिंदी – प्रेमचन्‍द गांधी

prem chand gandhiआप इस लेख के शीर्षक से चौंक सकते हैं, क्‍योंकि यहां शुरुआती दो शब्‍द हिंदी भाषा के नहीं वरन अंग्रेजी के हैं और एक शब्‍द अरबी भाषा का है। इसलिए अगर शुद्ध हिंदी में लिखना होता तो यहां शीर्षक होता ‘सामाजिक माध्‍यमों के युग में हिंदी।‘ लेकिन हिंदी जैसी दुनिया की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं की खूबसूरती इसी में है कि वे अपने भीतर इस प्रकार के बदलावों और प्रयोगों को इस तरह समाहित कर लेती हैं कि पराई भाषा के शब्‍द भी उनमें मिलकर अपने सौंदर्य से उन भाषाओं को और निखार देते हैं। और यह सिर्फ़ भाषा की ही विशेषता नहीं होती, बल्कि भाषा को इस्‍तेमाल करने वाले आम लोगों की भाषाई व्‍यवहार की भी विशेषता होती है कि वे पराई भाषा या संस्‍कृति से आए शब्‍दों को किस प्रकार अपने अनुकूल बना लेते हैं और अपनी भाषा को विकसित करते रहते हैं। क्‍योंकि भाषा का विकास उसे बोलने वाले लोग करते हैं, भाषा के वैयाकरण और आचार्य नहीं। हम अपने ज्ञान और अनुभव से जानते हैं कि हिंदी कोई बहुत प्राचीन भाषा नहीं है, बल्कि ‘हिंदी’ शब्‍द भी फारसी भाषा से आया है। दुनिया की तमाम भाषाएं किस आदिम भाषा से निकली हैं, यह तो अब तक ज्ञात नहीं हो सका है, लेकिन इतना अवश्‍य है कि उस आदिम भाषा के लोग जहां-जहां गए, उन्‍होंने अपनी भाषा का समय के साथ विकास किया। यही कारण है कि बहुत-सी भाषाओं में बहुत-से शब्‍द ऐसे पाए जाते हैं, जो ध्‍वनि, उच्‍चारण या अर्थ के आधार पर आपस में एक-दूसरे से बहुत-कुछ मिलते-जुलते हैं। जैसे मनुष्‍य जाति में एक जैसे चेहरे-मोहरे और कद-काठी वाले लोग मिलते हैं, वैसे ही अनेक भाषाओं में शब्‍द मिलते हैं। इस संबंध में हिंदी के महान वैयाकरण कामता प्रसाद गुरु ने हिंदी को आर्यभाषाओं के अंतर्गत मानते हुए कहा है, ‘’इस बात का अभी तक ठीक-ठीक निर्णय नहीं हुआ कि संपूर्ण आर्यभाषाएँ– फारसी, यूनानी, लैटिन, रूसी आदि वैदिक संस्कृत से निकली हैं अथवा और-और भाषाओं के साथ-साथ यह पिछली भाषा भी आदिम आर्यभाषा से निकली है। जो भी हो यह बात अवश्य निश्चित हुई है कि आर्य लोग, जिनके नाम से उनकी भाषाएँ प्रख्यात हैं, आदिम स्थान से इधर-उधर गये और भिन्न- भिन्न देशों में उन्होंने अपनी भाषाओं की नींव डाली। जो लोग पश्चिम को गए उनसे ग्रीक, लैटिन, अँगरेजी आदि आर्यभाषाएँ बोलने वाली जातियों की उत्पत्ति हुई। जो लोग पूर्व को आए उनके दो भाग हो गए। एक भाग फारस को गया और दूसरा हिन्दूकुश को पार कर काबुल की तराई में से होता हुआ हिंदुस्तान पहुँचा। पहले भाग के लोगों ने ईरान में मीडी (मादी) भाषा के द्वारा फारसी को जन्म दिया, और दूसरे भाग के लोगों ने संस्कृत का प्रचार किया, जिससे प्राकृत के द्वारा इस देश की प्रचलित आर्यभाषाएँ निकली हैं। प्राकृत के द्वारा संस्कृत से निकली हुई इन्हीं भाषाओं में से हिंदी भी है। भिन्न-भिन्न आर्यभाषाओं की समानता दिखाने के लिए कुछ शब्द नीचे दिए जाते हैं :

संस्कृत : पितृ, मातृ, भ्रातृ, दुहितृ, एक, द्वि-दौ, तृ, नाम, अस्मि, ददामि
मीडी : पतर, मतर, व्रतर, दुग्धर, यक, द्व, थृ, नाम, अह्मि, दधामि फारसी : पिदर, मादर, ब्रादर, दुख्तर, यक, दू, —, नाम, अम, दिहम
यूनानी : पाटेर, माटेर, फ्राटेर, थिगाटेर, हैन, डुआ, दृ, ओनोमा, ऐमी, डिडोमी
लैटिन : पेटर, मेटर, फ्राटर, —-, अन, डुओ, दृ, नामेन, सम, डिडोमी अँगरेजी : फादर, मदर, ब्रदर, डाटर, वन, टू, थ्री, नेम, ऐम, —
हिंदी : पिता, माता, भाई, धी, एक, दो, तीन, नाम, हूँ, देऊँ

इस तालिका से जान पड़ता है कि निकटवर्ती देशों की भाषाओं में अधिक समानता है और दूरवर्ती देशों की भाषाओं में अधिक भिन्नता।‘’

हमने भाषा की इस प्रकृति को तो समझा ही नहीं। यही कारण है कि आज़ादी के बाद हिंदी को राजभाषा बनाया गया तो उस समय हमारे लिए हिंदी का एक ऐसा स्‍वरूप बनाया गया, जिसमें संस्‍कृत से ऐसे शब्‍द बनाए जाते थे, जो अंग्रेजी शब्‍द का स्‍थान ले सकें। भारत सरकार के भाषावली आयोग आदि अनेक संस्‍थाओं ने ऐसे काम किए। आज भी यह कार्यालयी हिंदी प्रचलन में है तो सिर्फ सरकारी पत्रावलियों अर्थात फाइलों में ही। तमाम तरह के प्रचार और दुष्‍प्रचार के बावजूद जनमानस में वह संस्‍कृतनिष्‍ठ हिंदी अपनी जगह नहीं बना सकी। और आज के सोशल मीडिया वाले दौर में तो यह बिल्‍कुल भी संभव नहीं। हिंदी ही क्‍या कोई भी भाषा तभी समृद्ध होती है, जब उसे बोलने वाले लोग अपनी सांस्‍कृतिक परंपराओं से उसे पोषित करें। भाषा के विकास का दूसरा तरीका यह होता है कि जनमानस में पूरी तरह प्रचलित हो गए शब्‍दों को भाषा स्‍वयं अंगीकार कर ले। जैसे अंग्रेजी भाषा दुनिया के तमाम समुदायों में अधिक प्रचलित शब्‍दों को अपने कोश में समाहित करती जाती है और अपना बना लेती है, जबकि वह उसकी भाषा का शब्‍द नहीं है, लेकिन लोक में उसकी एक समुदाय में सहज स्‍वीकृति है। जैसे रोटी शब्‍द ही लें, अंग्रेजी ने इसे अपना लिया। लेकिन हिंदी में जो आरंभिक दौर में संस्‍कृत से अंग्रेजी के स्‍थान पर संस्‍कृत से नए शब्‍द बनाने की कोशिशें हुईं, उसकी वजह से बहुत-से ऐसे शब्‍द बनाए गए, जिनका लोकमानस से कोई सरोकार नहीं था। बहुत प्रयासों के बाद ऐसे शब्‍द सरकारी कार्यालयों की हिंदी में तो प्रचलित हुए लेकिन जनमानस में नहीं। आज भी यही स्थिति है।

बहरहाल आज के बहुप्रचलित सोशल मीडिया के दौर में देख रहे हैं कि दुनिया के हर कोने में हिंदीभाषी मौजूद है। और ऐसे में अगर हम विभिन्‍न भारतीय भाषाओं के बीच हिंदी को देखें तो एक बेहद ज़रूरी तथ्‍य यह‍ उभर कर सामने आता है कि आप अगर देवनागरी या कि भाषा की अधिकृत लिपि में कुछ लिखते हैं तो वह अधिक पढ़ा जाता है और रोमन में लिखा हुआ कम। कारण यह कि हम जिस भाषा से परिचित हैं, उसे उसकी लिपि में पढ़ने से ही उसकी अंतर्वस्‍तु अधिक ग्राह्य होती है और रोमन जैसी किसी अन्‍य लिपि में हमें न केवल पढ़ने में असुविधा होती है, बल्कि बहुधा अर्थ का अनर्थ होने की भी संभावना बनी रहती है। आज पूरी दुनिया में आप कहीं भी चले जाइये हिंदी कंप्‍यूटर पर यूनीकोड फोंट में कहीं भी अपनी बात लिखी-पढ़ी जा सकती है।

मुझे याद पड़ता है कि कंप्‍यूटर पर हिंदी के शुरुआती मुश्किल भरे दिनों में फोंट एक बड़ी समस्‍या हुआ करती थी। कुछ विश्‍व हिंदी सम्‍मेलनों में हिंदी में तैयार किए गए पावर प्‍वाइंट प्रजेंटेशन इसलिए बेकार सिद्ध हो गए थे कि यहां से तैयार की गई सीडी में लोग फोंट ले जाना ही भूल गए थे। अब मंगल यूनीकोड फोंट ने ऐसी तमाम समस्‍याओं से मुक्ति दिला दी है। कंप्‍यूटर बनाने वाली सभी कंपनियां अब पहले से ही मंगल फोंट लोड करके कंप्‍यूटर दे रही हैं। भारत में उपलब्‍ध तमाम मोबाइल फोन भी या तो पहले से ही मंगल यूनीकोड फोंट के साथ आते हैं या उनमें आसानी से फोंट इन्‍स्‍टाल किया जा सकता है। पहले कुछ निजी कंपनियों ने और बाद में स्‍वयं भारत सरकार ने कंप्‍यूटर पर हिंदी फोंट में आसानी से लिखने के उपकरण तैयार किए थे। अब ये उपकरण इतने सहज और आसान बना दिए गए हैं कि बिना हिंदी टाइप जाने हुए भी आप रोमन से हिंदी में टाइप कर सकते हैं और उपकरण ऐसे हैं कि आपको एक शब्‍द के ही विविध रूप भी बता देते हैं कि आप अपनी पसंद से विकल्‍प वाला शब्‍द चुन सकते हैं।

संचार क्रांति के दौर में जब हिंदी में कंप्‍यूटर और इंटरनेट पर हिंदी में लिखने-पढ़ने की शुरुआत हुई तो ब्‍लॉग लेखन का जबर्दस्‍त उभार हुआ। निजी और सामूहिक ब्‍लॉग-लेखन ने वैकल्पिक पत्रकारिता की नींव डाली और आज भी ब्‍लॉग लेखन साहित्‍य, कला और संस्‍कृति का ही नहीं जन पत्रकारिता का भी एक बड़ा माध्‍यम बना हुआ है। यह एक तरह से अभिव्‍यक्ति के लोकतंत्र का विस्‍तार है, जिसमें मुख्‍यधारा की पत्रकारिता के बरक्‍स सामूहिक और जनतांत्रिक सरोकारों की बात संभव है। संचार क्रांति की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है और ब्‍लॉग के बाद प्रचलित हुए फेसबुक, ट्वीटर, वाट्सऐप आदि सोशल मीडिया माध्‍यमों ने अभिव्‍यक्ति की इस जनतांत्रिकता को और विस्‍तार दिया।

किसी भी माध्‍यम की जनतांत्रिकता तभी बनी रह सकती है जब उसके सरोकार अपनी भाषा और अपनी संस्‍कृति से भी गहरे जुड़े रहें। भारत में आज सोशल मीडिया इसीलिए अधिक जनतांत्रिक है कि वहां अपनी भाषा, अपनी बोली-बानी में अपने समय की आवाज़ें मुखरित हो रही हैं। आरंभिक दौर में ब्‍लॉग की तरह ही फेसबुक पर भी कविताएं बहुत प्रस्‍तुत की जाती थीं, और उस दौर में हमने कवियों की एक पूरी ऐसी पीढ़ी देखी जो उम्र के लिहाज से प्रौढ़ थी, लेकिन साहित्‍य के हिसाब से बिल्‍कुल नई। यानी एक ऐसी पीढ़ी हमारी भाषा में छिपी हुई थी, जिसके पास व्‍यक्‍त करने के लिए प्रेम से लेकर घर-गृहस्‍थी और आस-पास का एक ऐसा संसार था, जिसे मुख्‍यधारा के हिंदी साहित्‍य में इतनी सहजता से नहीं देखा जा सकता था। अपने दैनंदिन कामकाज और दायित्‍वों से मुक्‍त होने के बाद नेट पर सक्रिय होने वाली इस पीढ़ी ने हिंदी में साहित्‍य के लोकतंत्र का विस्‍तार किया।

आर्थिक नवउदारवाद के बाद के बीते 25 वर्षों में हिंदी साहित्‍य में कम से कम तीन पीढि़यां आई हैं, जिनके पास अपनी बोली-बानी और संस्‍कृति की महक है। और ये पीढि़यां उस तरह से साहित्‍य में दीक्षित नहीं हैं, जिस तरह से पहले की पीढि़यां हुआ करती थीं। इन तीन पीढ़ी के लेखकों ने साहित्‍य और अभिव्‍यक्ति के क्षेत्र में बहुत कुछ बदला है और इस बदलाव को बखूबी महसूस किया जा सकता है, फिर वह चाहे कथ्‍य के तौर पर हो या शिल्‍प और भाषा की दृष्टि से हो। हम सिर्फ भाषा की दृष्टि से ही विचार करें तो पाएंगे कि हिंदी को समृद्ध करने में बीते 25 वर्षों में आए लेखकों का बड़ा योगदान है। हिंदी में अब ऐसे तमाम शब्‍द और कथोपकथन सहज और सामान्‍य हो गए हैं कि पिछली पीढि़यों की तुलना में देखें तो इन्‍हें आंचलिकता की श्रेणी में रखना होगा। लेकिन नहीं, अब आंचलिकता को संवाद की भाषा में पहले की अपेक्षा अधिक स्‍वीकार्यता मिली है और इसे हिंदी के महत्‍वपूर्ण समृद्धिकारक तत्‍व के रूप में माना जाता है।

सोशल मीडिया ने जिस तरह की निकटता पिछले कुछ वर्षों में पैदा की है, वह देखने में भले ही कितनी भी आभासी लगे, लेकिन इस आभासी संसार ने हिंदी के संसार को वैश्विक बना दिया है। दुनिया के किसी भी कोने में हिंदी लिखने-पढ़ने वाला व्‍यक्ति बैठा हो, वह अपने परिवेश में अपने दु:ख-सुख की व्‍यथा-कथा, उस हिंदी में व्‍यक्‍त कर रहा है, जो उसने अपनी सांस्‍कृतिक भूमि से अर्जित की है। और इसे पढ़ने वाला पाठक अपनी सांस्‍कृतिक पृष्‍ठभूमि से अर्जित भाषा के संस्‍कार वाला पाठक पढ़ कर उस पर टिप्‍पणी कर रहा है। इस तरह दो नहीं अनेकानेक भिन्‍न भाषाई संस्‍कारों की हिंदी इस वैश्विक परिदृश्‍य में सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही है।

आज सोशल मीडिया में फेसबुक और वाट्सऐप पर कई रचनात्‍मक और भाषाई समूह बन गए हैं, जहां दुनिया भर से लोग संवाद कर रहे हैं। भाषा की दृष्टि से इस तरह की सामूहिकता एक नई भाषा को जन्‍म देती है, क्‍योंकि वहां नए-नए शब्‍द संवाद में आकर सहज हो रहे हैं। जैसे अवधी-भोजपुरी का ‘मने’ आज हिंदी में इतना सामान्‍य हो गया है कि लगता ही नहीं कि यह किसी स्‍थानीय बोली-बानी से आया है। मोबाइल फोन पर वाट्सऐप में तो लगता है कि रचनात्‍मक क्रांति हो रही है। हजारों की तादाद में यहां समूह बने हुए हैं, जहां नियमित रूप से कविता, कहानी, लेख, यात्रा संस्‍मरण आदि पोस्‍ट किए जाते हैं और उन पर लंबी बहसें तक होती हैं। यह तुरंता किस्‍म की बहसें संवाद का एक बड़ा प्‍लेटफॉर्म बना रही हैं। इन समूहों में देशी-विदेशी ही नहीं भारतीय और स्‍थानीय भाषाओं से भी अनूदित रचनाएं पोस्‍ट की जाती हैं, जिससे हिंदी का एक नया वैश्विक स्‍वरूप बन रहा है।

आज सोशल मीडिया के दौर में हम देख रहे हैं कि हिंदी में अनेक भाषाई संस्‍कारों वाले लोग सक्रिय हो रहे हैं। ऐसे समय में हमें इस पर विचार करना है कि हम हिंदी में कौनसी बोली-बानी और भाषा के उन शब्‍दों को अपना सकते हैं, जो अंग्रेजी के प्रचलित शब्‍द का स्‍थान ले सकते हैं। विश्‍व हिंदी सम्‍मेलनों में पता नहीं कभी इस तरह से विचार हुआ कि नहीं, लेकिन अब समय की मांग है कि हम इस तरीके से भी हिंदी के विकास पर बात करें। जैसे उर्दू में अंग्रेजी नावेल के लिए कोई शब्‍द नहीं था तो उन्‍होंने उसे ज्‍यों का त्‍यों ले लिया, लेकिन हमने हिंदी में उपन्‍यास शब्‍द बनाया, जबकि मराठी से हम कादंबरी ले सकते थे। वैश्विक गांव में बदलती दुनिया के दौर में हमें भाषाई शुचिता का आग्रह अब छोड़ना ही होगा। अगर हम चाहते हैं कि हमारी हिंदी आज भी भारत में बहुप्रचलित अंग्रेजी शब्‍दों के स्‍थान पर अपनी भाषा के शब्‍द अपनाए तो उसके लिए हमें हमारी विविधतापूर्ण भाषाई संस्‍कृति से ही समानार्थी शब्‍द लेकर उन्‍हें हिंदी के कोशों में शामिल करना होगा।

-प्रेमचन्‍द गांधी
220, रामा हेरिटेज,
सेंट्रल स्‍पाइन, विद्याधर नगर,
जयपुर 302 039

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