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सही मुददों को बदलने और पिछड़ने को आम जनता ही रोक सकती है

Indian-rupee-symbol-007क्यों हम सही मुददों को पिछड़ने देते हैं?

इस सवाल का जवाब जानने से पहले हमें जान लेना चाहिये, कि यह सवाल आम जनता की पाली में है, उनकी पाली में नहीं है, जो वास्तव में ऐसा कर रहे हैं। जिनके पास सरकार है, मंच है, मीडिया है, उनका समर्थन और सहयोग है जो मुददों को अपने हिसाब से बदलते और बनाते हैं। उनके पास और न जाने क्या-क्या है? जो कभी अपने और दागदारों के दाग भरे कपड़े धाने बैठ जाते हैं, तो कभी घपले और घोटालों को विकास योजनाओं के बर्क में लपेट कर आर्थिक विकास और सामाजिक खुशहाली के सपनों को राजनीति के बाजार में उतार देते हैं। वो खाध सुरक्षा की बात करते हैं, वो मिशन 2014 के जरिये राज्य, सरकार, निजी कम्पनियों और देश की आम जनता को आर्थिक विकास के अंधे गलियारे में डाल देते हैं। वो चाहते हैं कि मुददा आर्थिक न रहे।

आर्थिक मुददे यदि खड़े रहे, तो आर्थिक एवं सामाजिक विकास के दिशा का सवाल खड़ा हो जायेगा। उदारीकरण की नाकामियां खड़ी हो जायेंगी। महंगार्इ, खपले-घोटाले और कर्इ परतों में छुपे लोग सामने आ जायेंगे। यह खबर सरेराह आ जायेगी, कि सरकारें आम जनता के प्रतिनिधि नहीं। सरकार निजी कम्पनियां और कारपोरेशनें चला रही हैं। आम जनता जनतंत्र के वैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है। सरकार किसी की बने, चलती वित्तीय ताकतों की ही रहेगी।

मुक्त बाजारवादी-उदारीकरण की नीतियां जारी रहेंगी।

विदेशी पूंजी निवेश एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के लिये बचे खुचे बंद दरवाजे खुलते रहेंगे। निजीकरण की प्रक्रिया जारी रहेगी। राज्य एवं समाज की सम्पतितयों का हंस्तातरण निजी कम्पनियों एवं कारपोरेशनों को होता रहेगा।

महंगार्इ के बढ़ने, अर्थव्यवस्था के लड़खड़ाने और वर्गगत दूरियां बढ़ती रहेंगी। आर्थिक विकास के नाम पर जनता जिबह होगी और विकास योजनाओं का लाभ उन्हें मिलता रहेगा, जो सरकारें बनाती और बिगाड़ती हैं।

सुनते हैं खाध सुरक्षा अधिनियम के जरिये सरकार गरीबों को भरमाने पर यकीन कर रही है, और अब उसकी योजना मध्यम वर्ग को विश्वास में लेने, उसे गफलत में डालने की है। जो नाराज है। परिवर्तन चाहती है। नरेंद्र मोदी अपने साथ जिनके बीच भाजपा का भगवा फहराते जा रहे हैं।

समाज का मध्यम वर्ग व्यवस्था में परिवर्तन की बात नहीं सोच रहा है। जो सोचते हैं, उनकी तादाद इतनी नहीं है, कि वो समाज को प्रभावित कर सकें। जो बता सकें, कि सरकार चाहे जिसकी बने जो है, वही रहना है। और तब तक रहना है, जब तक पेशेवर-कारोबारी लोग हैं।

यदि हम आज की तारीख में सवाल करें, कि केंद्र की यूपीए सरकार और 2014 में सरकार बनाने का खम ठोंकने वाली भाजपा क्या चाहती है? तो जवाब होगा, ”किसी भी कीमत पर सरकार बनाना।” इसलिये सरकार जो कर रही है, और भाजपा जो कर रही है, दोनों का मकसद एक है। दोनों की आर्थिक नीतियां एक हैं। दोनों एक ही जैसी समाज व्यवस्था चाहती हैं, और दोनों चाहती हैं, कि सही मुददों को पिछड़ने दें। उन्हें पीछे खड़ा कर दिया जाये। क्योंकि दोनों के पास रोज बढ़ती जन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं है।

यह बात तो अपने आप में प्रमाणित है कि, इस चुनाव का आम जनता के हित में कोर्इ परिणाम नहीं निकलना है। जन मुददों का पिछड़ना जारी है। राजनीति से परहेज करने वाले और राजनीति की सही समझ रखने वालों के बीच संवाद की सिथतियां नहीं हैं। आम जनता जो समझती है, और जो चाहती है, उसे समझाने और जताने का उसके पास विकल्प नहीं है। तीसरा मोर्चा(?) कहता है, प्रधानमंत्री हम बनायेंगे। जिसके पास पहले से बने दो मोर्चों के विरोध के अलावा और कोर्इ सकारात्मक मुददा नहीं है। जनसंघर्ष नहीं है। जन-समस्याओं का सही समाधान नहीं है।

क्या साम्प्रदायिकता और गैर-साम्प्रदायिकता के मुददे से आज की समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है?

क्या राजसत्ता के वर्ग चरित्र और उसके वर्गहित को परिभाषित और उसे बदला जा सकता है?

क्या ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे आंदोलनों और जन संघर्षों को मुजफ्फरनगर एवं उसके ग्रामीण क्षेत्रों के दंगों से समझा जा सकता है, या उसे सही दिशा दी जा सकती है?

क्या सरकारी विकास योजनाओं से उजड़ते गांव और विस्थापन जैसी मुसीबतों का हल साम्प्रदायिक तरीके से हो सकता है?

क्या कृषि क्षेत्रों की समस्या और औधोगिक इकार्इयों का हल इस रूप में संभव है?

बढ़ती हुर्इ महंगार्इ, अनियंत्रित बाजार और मुनाफे को रोकने के लिये साम्प्रदायिकता का मुददा, कारगर हो सकता है? यदि नहीं, तो इस मुददे को आधार बनाने की जरूरत क्या है? मानी हुर्इ बात है, कि वर्तमान सरकार और विपक्ष मिल कर मुददों को बरगला रहे हैं। हर एक मुददे पर साम्प्रदायिकता का मुददा चढ़ाया जा रहा है। मुददे बदल-बदल के यह परखा जा रहा है, कि देश की आम जनता, छोटे मुददों के झांसे में कितना आयेगी?

वो दागदारों के दाग भरे कपड़ों की नुमार्इश कर मसूद और लालू जैसे दागदारों को सजा सुना कर, इस बात का यकीन पैदा करना चाहते हैं, कि घपले और घोटालेबाजों को बख्शा नहीं जायेगा। वो दंगा-फसाद को रोकने के नाम पर उसे फैलाते हैं। आम जनता के लिये उनकी फिक्र उसे बांटने और नकारा बनाने से जुड़ी है, ताकि वह निर्णायक भूमिका निभाने की बात तक न सोच सके। उसकी सोच को अविकसित रखना ही, मौजूदा व्यवस्था के लिये जरूरी है।

औधोगिक विकास के बारे में हम दशकों से सुनते आ रहे हैं, कि ”पहले देश में सुर्इ तक नहीं बनता था, अब हम हवार्इ जहाज बना रहे हैं।” विवादहीन रूप से यह बड़ी बात होती, यदि देश का हर एक नागरिक हवार्इ जहाज पर चढ़ने लायक होता। मगर ऐसा नहीं है। छ: दशक बीतने के बाद भी, यदि खाध सुरक्षा अधिनियम की जरूरत पड़ रही है, तो सीधा सा मतलब है कि आधी से अधिक आबादी को आपने भूखा रखा है, अब तक। कृषि उत्पादन तो बढ़ा है, मगर भूख से मरने वाले किसानों की तादाद भी बढ़ी है। उसके उत्पाद की लागत तो बढ़ी है, मगर बाजार मूल्य उसके विरूद्ध ही रहे हैं। वह कर्ज में डूबा हुआ है, और उसे लूटने वालों की संख्या बढ़ार्इ जा रही है। बांध बनाये जा रहे हैं, परमाणु ऊर्जा के स्त्रोत बन रहे हैं, मगर बिजली के तार ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं। उसके हिस्से अंधकार के साथ तबाही के अलग-अलग मंजर हैं। ऐसा क्यों है? किसके दरवाजे जा कर विकास की गति थम जाती है?

देश को बाजार बनाने वालों की आंखों में भारत की खुशहाली के जो सपने हैं, वह आम आदमी के नहीं हैं। आम आदमी तो रोटी-रोजी के लिये हलकान है। भूख और गरीबी से बेहाल है। उसके दायरे में न तो अमेरिका है, ना पाकिस्तान है। आतंकवादी है, ना ही धर्म, जाति और सम्प्रदाय है। वह श्रमजीवी तो है, मगर श्रमजीवी होने की चेतना से महरूम है। वह ऊंची, बड़ी बातें नहीं जानता, वह जानता है, कि उसकी हालत रोज बिगड़ती जा रही है। उसके पास अपनी गरीबी का कोर्इ पैमाना नहीं है। वह देश का ऐसा सम्मानित नागरिक है, जिसके पास मतदाता पहचान पत्र है, राशन कार्ड है। जिसका दैनिक जीवन में महत्व घटता गया है। क्योंकि सरकार की नीतियां आम आदमी की जरूरतों से नहीं बनती, बलिक सरकार की अपनी जरूरतों से बनती है।

इसलिये, आम चुनाव जितना करीब आता जाता है, सरकार एवं उसे बनाने वालों की जरूरतें उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती हैं। बातें आम जनता की होती हैं, मगर आम जनता के मुददे पिछड़ते जाते हैं।

यदि आज हम देश के कारोबारी और पेशेवर राजनीतिज्ञों के दिमाग से सोचें तो, उनकी पहली जरूरत सरकार बनाने से ज्यादा, ‘जो है और जैसा चल रहा है’ को बनाये रखना है, ताकि देश में मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था को बढ़ाया जा सके।

कारोबारियों ने ऐसी सिथतियां बना ली है। राजनीतिक दलों का आश्वासन उन्हें हासिल है। वैसे, कहना यह चाहिये कि उन्होंने देश के राजनीतिक ढांचे को अपनी गिरफ्त में इस तरह ले लिया है, कि प्रमुख राजनीतिक दल और प्रमुख गठबंधन उन्हीं के हितों के लिये काम कर रही है। वो आश्वस्त हैं।

राजनीतिक दलों एवं गठबंधनों को मालूम है, कि कारोबारियों के हितों को पूरा किये बिना, वो अपने को न तो बना सकते हैं, ना बचा सकते हैं। जिनके हितों के लिये किये गये कामों को देश की आम जनता, अपने खिलाफ भी समझती है। पक्ष में तो कतर्इ नहीं समझती।

अब उनकी परेशानी और प्रतिस्पद्र्धा यह है, कि सरकारें किसकी हों?

इस तरह, राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव के बाद होने वाले लोकसभा के चुनाव के लिये ऐसे मुददों को वरियता दी जा रही है, कि मुक्त बाजारवादी व्यवस्था बची रहे, जनतंत्र वास्तविक जनतंत्र बनने से रूकी रहे, मतदान हो, मगर मतपत्रों का निर्णायक महत्व स्थापित न हो सके। जिस तरह निजी राष्ट्रीय कम्पनियां और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और कारपोरेशनों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों की प्रतिस्पद्र्धी सहयोगी हैं, सरकार भी नवउदारवादी वैशिवक ताकतों की साझेदार है। दुनिया भर में नस्लवादी फासिस्ट ताकतों को उभारा जा रहा है, ताकि, एकाधिकारवादी ताकतों को जीने की नयी खुराक मिल सके। भारत में भी यही हो रहा है। सही मुददों को पीछे धकेल कर गलत मुददों को तरजीह दी जा रही है।

यही कारण है कि सही मुददों को पिछड़ने देने के मुददे को हम सरकार और राजनीतिक दलों की पाली में नहीं, आम जनता की पाली में डालते हैं, क्योंकि हम मानते हैं, कि तमाम विपरीत परिसिथतियों और राजनीतिक चेतना की अपरिपक्वता के बाद भी, मुददों को बदलने और सही मुददों को पिछड़ने से आम जनता ही रोक सकती है। सवालों का सही जवाब और संघर्षों की सही दिशा का निर्धारण वही कर सकती है।

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