Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / मूल मुद्दों पर चुप रहने की नीति

मूल मुद्दों पर चुप रहने की नीति

lurl

भारत की राजनीति को नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द घुमाने की नीतियां सफल रही हैं। भाजपा के देशी-विदेशी नीतिकारों ने 2014 का आम चुनाव भी नरेंद्र मोदी के नाम से लड़ा और सरकार भी मोदी की ही बनी। आज भी मोदी को केंद्र में रखने की गोटियां ही चली जा रही हैं, और विपक्ष इस जाल में फंसा हुआ है। मीडिया भी यही कर रही है। जहां जीत और जीत की संभावनायें हैं, वहां मोदी प्रायोजित सत्य हैं, और जहां हार है और हार की आशंकायें हैं, वहां से मोदी जी गायब हैं। उन्हें गायब रखा जाता है।

‘मूल मुद्दों पर चुप रहने की नीतियां‘ बना ली गयी हैं, जिसे मानने के लिये नरेंद्र मोदी हर पल तैयार हैं। जहां उनके बढ़-चढ़ कर बोलने को, गहरी नींद आती है। अभी यह अच्छा लग रहा है। सत्ता के केंद्र में होने का सुख मिल रहा है, मगर देश की राजनीतिक संरचना के लिये एक खतरा लगातार बढ़ रहा है। सत्ता के केंद्र में एक ऐसी ताकत का निर्माण किया जा रहा है, जो देखने में अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह सबसे शक्तिशाली राष्ट्राध्यक्ष नजर आयेगी, मगर वास्तव में वह अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह ही वित्तीय ताकतों के इशारे पर काम करने वाली राजसत्ता की शक्ति होगी।

वास्तव में, यह राजसत्ता के नाम पर एक कठपुती का निर्माण है। उस पुतले का निर्माण है, जो लोकतंत्र के राजनीतिक आवरण के पीछे निजी वित्तीय पूंजी का कारिंदा है। जिसे प्यादे सा पिटवाने में इन ताकतों को थोड़ी भी हिचक नहीं होती।

नरेंद्र मोदी अभी ऊंची उड़ान पर हैं, और भारत में उन्हें उस राजनीतिक ब्राण्ड केे रूप में स्थापित किया जा रहा है, जहां आर्थिक विकास का क्षद्म छलावा और मूल मुद्दों पर चुप्पी की नीति है। 25 अक्टूबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने कहा- ‘‘मोदी जी एक अद्भुत कलाकार हैं। नीतिगत चुप्पी को उन्होंने हथियार बना लिया है। वो छोटे-छोटे मुद्दों पर बात करने और ट्वीट करने से पीछे नहीं हटते, लेकिन उन्होंने दादरी काण्ड, हरियाणा में दलित, दाल की कीमतों में उछाल, बिहार को विशेष राज्य का दर्जा और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर चुप्पी साध ली है।‘‘

यह चुप्पी नयी नहीं है।

संसद जब भाजपा की अपनी ही नीतियों की वजह से गतिरोध का शिकार थी।

मोदी जी चुप थे। पे्रस के सवालों पर भी उन्होंने चुप्पी साधे रखी।

और सत्र का अवसान होते ही, उसी शाम से वो वाचाल हो गये।

भूमि अधिग्रहण, श्रम कानून से लेकर जीएसटी पर भी उनकी चुप्पी तब तक बनी रही, जब तक बोलने की उन्हें हरी झण्डी नहीं मिल गयी। उनकी जुमलेबाजी भी वित्तीय ताकतों के हितों की पैरवी करती है। जिस आर्थिक विकास को उन्होंने मुद्दा बनाया है, वह आर्थिक विकास देश की अर्थव्यवस्था के लिये स्थायी खतरा है। खतरे में देश की राजनीतिक संरचना भी है। लोगों के संवैधानिक अधिकार और उनकी सामाजिक स्थितियां भी हैं। खतरे की बात यह है, कि राष्ट्रवाद के जरिये ‘एक दल, एक नेता और एक राष्ट्र‘ की सोच को फैलाया जा रहा है, और अर्थव्यवस्था के निजीकरण को आर्थिक विकास की सही दिशा मान लिया गया है। यह मान लिया गया है, कि भारत का विकास वैश्विक वित्तीय ताकतों के सहयोग के बिना संभव नहीं है।

एक दल के रूप में- भारतीय जनता पार्टी है, जिसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हिंदू राष्ट्रवादी नीतिकार हांक रहे हैं।

एक नेता के रूप में- नरेंद्र मोदी हैं, जो राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों के हितों से संचालित हो रहे हैं।

एक राष्ट्र के रूप में- हिंदू राष्ट्रवाद है, जिसे हिंदूवी संगठन रोज नये विवादों से बढ़ा रहे हैं।

सरकार जिनके बारे में सजीव है। राष्ट्रवाद के जरिये बहुराष्ट्रीय वित्तीय हितों को बढ़ाया जा रहा है।

सरकार इन मुद्दों को बहंस के केंद्र में आने देना नहीं चाहती, इसलिये नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द भारतीय राजनीतिक को घुमाने और मूल मुद्दों पर चुप रहने की नीति से संचालित हो रही है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top