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पुरस्कार लौटाने वालों का ‘गैंग‘

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सरकार और संघ का हमला वामपंथियों पर होगा, यह तय है।

लोकतांत्रिक ताकतों को खत्म करने की साजिशें रची जा चुकी हैं।

यह सोचने का कोई आधार नहीं है, कि केंद्र की मोदी सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों का खयाल रखेगी, और संघ सामाजिक सह-अस्तित्व को अपनी स्वीकृति देगा।

सरकार के सामने राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों का हित है, और संघ के सामने हिंदू राष्ट्र का सपना।

जिसे राजनीतिक एवं सामाजिक धु्रवीकरण के आधार के रूप में पेश किया जा चुका है।

सरकार आक्रामक है, और संघ तथा उससे जुडे तमाम हिंदूवादी संगठनों और समूहों के तेवर सख्त। जुनूनी।

कह सकते हैं आप, कि एक ऐसी सेना हमारे सामने है, जो बरसों से डेरा डाले हुए थी, और अब सल्तनत उसके हाथ में है। उन्हें अपनी जीत और अपने राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय सहयोगियों पर यकीन है। भले ही ‘मूडीज‘ यही कह रहा है और भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर का भी यही खयाल है कि आर्थिक विकास के लिये सामाजिक सहिष्णुता जरूरी है। जरूरी है, कि सरकार के पास हर वर्ग और समुदाय का समर्थन हो।

मूडीज जैसी रेटिंग एजेन्सियां मूलतः किसी भी देश में पूंजीनिवेश के लिये माहौल बनाने का काम करती हैं, और सेण्ट्रल, फेडरल या रिजर्व बैंकों के गर्वनर वास्तव में, दुनिया के बैंकिंग सिस्टम का वह महत्वपूर्ण पुर्जा होते हैं, जिसके जरिये वित्तीय ताकतें किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेने और उसे निर्देशित करने का काम करती हैं।

यदि रेटिंग एजेन्सीज और बैंकों के गर्वनर को बढ़ती हुई सामाजिक असहिष्णुता की चिंता होती है, तो इसका सीधा सा मतलब है, कि वास्तव में वह समाज में मौजूद हैं। जिसे केंद्रिय वित्तमंत्री एम. वेंकैया नायडू अस्वीकार कर रहे हैं। उसे खारिज कर रहे हैं, और पुरस्कार लौटाने वालों के खिलाफ हमलावर हो रहे हैं, कि वो मोदी सरकार के खिलाफ साजिशों का हिस्सा हैं।

बढ़ते हुए सामाजिक तनाव और असहिष्णुता के मौजूदा माहौल के खिलाफ पुरस्कार और सम्मान वापस करने वाले साहित्यकार, इतिहासकार, कलाकार और वैज्ञानिकों के खिलाफ मुहीम छेड़ा जा रहा है। उन्हें ‘नंगा नाच करने वाले‘ और ‘पुरस्कार वापस करने वालों का गैंग‘ कहा जा रहा है। सरकार और संघ वामपंथियों-लोकतंत्रवादियों के खिलाफ ‘गैंगवार‘ की शुरूआत कर रही है। जिन्होंने देश और समाज को अपना ‘सर्वोच्च‘ दिया, उन्हें अपराधियों की जमात में शामिल कर रही है।

संभवतः 29 अक्टूबर को अनुपम खेर (फिल्म अभिनेता) पुरस्कार लौटाने वाले निर्देशकों के समूह को ‘पुरस्कार वापसी गैंग‘ कहा, और 30 अक्टूबर को संघ के सह सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले ने कहा- ‘‘सहिष्णुता-असहिष्णुता की बहंस उन्होंने जानबूझ कर शुरू की है। देश में ऐसी स्थिति नहीं है। ये नंगा नाच कर रहे हैं।‘‘ उन्होंने हिंदूवादी नजरिये से स्थितियों पर अपने टिप्पणी की और कहा- ‘‘पुरस्कार लौटाने वालों का यह गैंग अपने लिये सहिष्णुता का ठेका नहीं ले सकता कहीं कुछ गलत होता है, तो हम उसकी निंदा करते ही हैं। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों की दुकानदारी बंद हो गयी है, इसलिये ये मानसिक संतुलन खो बैठे हैं।‘‘

मतलब, ठेका संघ के पास है।

मतलब, सही या गलत को तय करने और उसकी निंदा करने का अधिकार सिर्फ उनके पास है।

मतलब, बुद्धिजीवी वर्ग दुकानदार है।

मतलब, पुरस्कार वापस करने वालों का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है, उन्हें पागलखाने में होना चाहिये। सरकारी पागलखाने में। संघ की निगरानी में।

होसबोले जी आप होशो-हवास न खोयें। होश खोने के लिये केंद्रिय मंत्री ही काफी हैं।

जो सोचते हैं, कि यह सब वामपंथी रचनाकारों की कारस्तानी है।

जो सोचते हैं, कि यह सब मतांध भाजपा विरोधी है।।

जिनकी नाराजगी है, कि इन्होंने वाराणसी में नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा चुनाव में चुनावी प्रचार किया।

जिनकी फिक्र है, कि बिहार चुनाव में भाजपा को चोट लग सकती है, जहां के तमाम विधान सभा सीटों के इकलौते उम्मीदवार नरेंद्र मोदी हैं।

जिन्हें होश नहीं कि दादरी कलबुर्गी हत्याकाण्ड हो या सामाजिक असहिष्णुता का कोई भी काण्ड, वहां वामपंथियों की कोई भूमिका नहीं है, वो तो देश के बिगड़ते हुए माहौल के खिलाफ अपना विरोध भर दर्ज करा रहे हैं। उनकी लड़ाई अभी शुरू ही नहीं हुई। और कब शुरू होगी? वो खुद नहीं जानते।

इस देश के रचनाकारों ने राजनीति बहुत कम की है।

और अब ‘पुरस्कार वापसी‘ से शायद, इसकी नयी शुरूआत हो। उन्हें यह समझना ही होगा कि श्रम कानूनों में संशोधन, भूमि अधिग्रहण विधेयक या वस्तु एवं सेवा कर से अलग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा नहीं है, जिसे गलत दिशा देने के लिये धर्म एवं सम्प्रदाय के साथ राष्ट्रवादी भावनाओं को उग्र किया जा रहा है। आज देश में जो भी हो रहा है, उसमें राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों की सम्बद्धता है, जिनके लिये राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय तानाशाही सख्त जरूरी है।

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