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बिहार – चुनाव परिणाम से पहले

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अंतिम दौर के मतदान और चुनाव परिणाम से पहले, बिहार में किसकी सरकार बनेगी? यह बताना या अनुमान लगाना, शायद जल्दबाजी होगी, और हम ऐसी जल्दबाजी करना नहीं चाहते। इसके बाद भी कुछ बातें ऐसी हैं, जिसका जिक्र हमें करना चाहिये। यह भारतीय लोकतंत्र और चुनाव में आम जनता की हिस्सेदारी का मामला है।

यदि बिहार चुनाव और उसके परिणाम के बीच, मतदान का कोई महत्व है, तो सरकार नीतीश कुमार की बननी चाहिये।

और यदि चुनावी मतदान और चुनावी परिणाम के बीच कोई करिश्मा है, तो सरकार नरेंद्र मोदी की बननी चाहिये।

भाजपा की सरकार मैं जान-बूझ कर नहीं कह रहा हूं क्योंकि बिहार में भाजपा का इकलौता प्रत्याशी नरेंद्र मोदी हैं। मोदी जी ही चुनाव लड़ रहे हैं, बाकी जो भी हैं, बेचारों को काट-छांट कर, उनके होने को, छोटा बना दिया गया है। उनकी क्या कहें, वहां तो भाजपा की वकत भी छोटी बन गयी है। यह सब लोकसभा में जीत की पैंतरेबाजी है।

मोदी की सूरत लोकसभा में चल गयी और भाजपा यह मान कर चल रही है, कि यह सूरत बिहार में भी चल ही जायेगी।

छवि को भुनाने की राजनीति, वैश्विक वित्तीय ताकतों की प्रचारित नीति है। प्रचारतंत्र से ऐसी हवा बनायी जाती है, कि मतदाता सम्मोहित हो जाता है। सम्मोहन का यही जाल भारत में बुना गया, और अब बिहार में भी।

नरेंद्र मोदी वित्तीय ताकतों के प्रायोजित पीएम हैं। उन्होंने अपनी विश्वसनियता भी प्रमाणित की है, और राज्य सभा में भाजपा के अल्पमत में होने को भी आर्थिक सुधारों की रफ्तार धीमी होने की वजह भी बनाया है। ‘भूमि अधिग्रहण‘ के लिये राज्य सरकारों की भूमिका को बढ़ा कर उन्होंने यह भी प्रमाणित कर दिया है, कि ‘सुधारों‘ के लिये राज्यों में भाजपा के सरकारों की अनिवार्यता है।

यही वह बात है, जो इन आशंकाओं को जन्म देती है, कि जनमत चाहे जिस ओर हो बिहार में मोदी की सरकार बन सकती है।

यदि ऐसा नहीं होता, तो मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने की नीतियां नहीं बनायी जातीं।

वैसे, पहले और दूसरे चरण के मतदान ने भाजपा को आशंकित कर दिया है। तीसरे और चैथे चरण के मतदान से वह आश्वस्त हुई या नहीं? यह तो नहीं कहा जा सकता, किंतु भाजपा और मुख्यधारा की मीडिया यही प्रचार कर रही है, कि बिहार में मोदी का जादू चल रहा है, भले ही कांटे की टक्कर है। इसी टक्कर का परिणाम है, कि भाजपा की चुनावी नीतियां बार-बार बदल रही हैं। विकास की बातें और विकास पुरूष की यात्रा गो-मांस से लेकर जादू-टोना से होती हुई निजी आरोपों केे साथ चलती है। मोदी अति पिछड़े लोगों की जमात में शामिल हो गये हैं। सबसे बड़ी बात यह है, कि बिहार का आम मतदाता, जिन मुद्दों पर भाजपा बातें कर रही है, उन मुद्दों के बारे में सोच नहीं रहा है। नीतीश कुमार की विश्वसनियता अभी भी बनी हुई है। वित्तीय ताकतें ‘विकास के लिये‘ नीतीश कुमार को अपना जरिया बना सकती हैं। यदि ऐसा हुआ तो मोदी की अनिवार्यता घटेगी, और कद भी।

बिहार चुनाव का हासिल, सरकार बनने के नजरिये से, चाहे जो भी हो, लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद, बिखरे हुए विपक्ष के लिये एकजुटता के नजरिये से, महत्वपूर्ण होगा। यह सोचा जा सकता है।

यह सोचने का आधार भी है, कि एक नये मोर्चे का गठन भी हो सकता है।

भाजपा जिस तरह से राज्य की सरकारों पर कब्जा जमाने की नीतियों से संचालित हो रही है, उसकी वजह से क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय दलों के बीच अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये, नये राजनीतिक धु्रवीकरण की अनिवार्यता बढ़ गयी है।

इस बात पर आम मतदाता की नजरें अभी ठीक से ठहरी नहीं हैं, कि अपने देश और प्रदेश में सरकार बनाने के आम जनता के संवैधानिक अधिकार पर वित्तीय ताकतों का दखल बढ़ता जा रहा है। उन्होंने चुनावों को अपने कब्जे में लेने की रणनीतियां बना ली हैं, जिसमें मौजूदा सरकारें भी शामिल हैं। मोदी की सरकार एक ऐसी ही प्रायोजित सरकार है, जो प्रदेशों में प्रायोजित सरकार बनाने में लगी है, ताकि ‘आर्थिक सुधारों‘ के नाम पर अर्थव्यवस्था का निजीकरण और राजनीति का केंद्रियकरण हो सके। उसने राज्य की स्वायत्तता और देश की सम्प्रभुसत्ता के साथ अपने देश की सरकार चुनने के आम जनता के अधिकारों को राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों के पास गिरवी रख दिया है।

यदि उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव परिणामों को हम बिहार के चुनाव का आगाज मान लें तो भाजपा और मोदी के लिये अंजाम का अंदाजा लगा सकते हैं। जहां मोदी के द्वारा गोद लिये गये जयापुर गांव में भी मोदी को पानी नहीं मिला, और उनका संसदीय क्षेत्र उनके लिये सूखे की सौगात ले कर आया। आम जनता मोदी ब्राण्ड के शोर से ऊब चुकी है।

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