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सरकार इतनी सीधी क्यों है भाई?

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‘‘सरकार इतनी सीधी क्यों है भाई?‘‘

यह सवाल मैंने खुद से किया

और एक जलेबी मेरे सामने टप्प से टपकी।

अब आप इसे जवाब समझें या पुरस्कार यह आप पर निर्भर करता है।

हमने समझा, यह जवाब है,

और हमने यह भी मान लिया, कि यह पुरस्कार है।

यह पुरस्कार हमें प्रधानमंत्री जी की तरफ से गृहमंत्री जी ने दिया। इसका दर्जा, सरकारी है। इसकी भावना निजी है। निजी तौर पर नरेंद्र मोदी जी, बकौल राजनाथ सिंह, पिछले कई सालों से असहिष्णुता के शिकार हैं।

हमारा जी चाहा- अपने हिस्से की जलेबी मैं उनके मुंह में डाल दूं, कि आपने सालों गरलपान किया, अब मुंह मीठा कीजिये।

मगर उनकी पांचों अंगुलियां घी में और सिर कड़ाही में मिला। जलेबी की वक़त घट गयी।

जिनको लाखों का पुरस्कार मिला, उन्होंने भी जलेबी को टेढ़ा और बासी मान लिया। वो बउराये हुए हैं। पुरस्कारों को बासी जलेबी सा धड़ाधड़ वापस कर रहे हैं। तमाम दुकान वाले परेशान हैं, कि जलेबी बासी कैसे होगी? तई-कड़ाही, तेल-सीरा और मैदे का खमीरदार घोल तो वही है?

उसमें से खून और मांस की बू क्यों आ रही है?

हमने सुना पहले यह मामला साहित्यिक था, अब सियासी हो गया है। सियासत और सियासी लोग इतने बुरे क्यों हैं?

मशहूर रहे शायर राहत इंदौरी साहब आपने यह क्या कह दिया, कि ‘‘अब यह मामला साहित्यिक नहीं सियासी हो गया है। जहां सियासत आ जाती है, वहां से शराफत अपने कदम पीछे खींच लेती है।‘‘

सियासत यदि इतनी गंदी है,

शराफत यदि इतनी दब्बू है, कि इज्जत बचाने में ही जिंदगी बिता दे, तब तो इससे बुरी कोई बात ही न हो।

फिर आप यह क्यों भूल रहे हैं जनाब, कि सियासत के शीर्ष पर मोदी जी बैठे हैं, और उनके सिपहसालार उनकी शराफत का बखान करते नहीं थकते। मीडिया गा रही है, साजिन्दे डफली बजा रहे हैं। कोई उन्हें सोच, कोई उन्हें विकास पुरूष तो कोई उन्हें कर्मयोगी बता रह है। इसके बाद भी किसी से कुछ छूट जाता है, तो मोर्चा, मोदी जी खुद संभाल लेते हैं। ‘मन की बात‘ करते हैं, मगर दूसरे के मन की न तो थाह लेते हैं, ना ही उसके मन की बात सुनते हैं।

हमारे मन की बात यह है, कि सियासत को शराफत से यूं जुदा न कीजिये। तमाम शरीफ सियासत के गलियारों में रहते हैं। बेचारे वहीं जीते, वहीं मरते हैं। जिनके लिये ‘नंगा नाच करने वाले‘ गैंग मास्टर तो साहित्यकार हैं, जिनकी चाहत बस इनती है, कि ‘‘हमें लिखने, पढ़ने और बोलने दो भाई।‘‘

हमने खुद से बस इतना कहा, कि हमारे सामने ‘टप्प‘ से एक नसीहत टपकी।

‘‘लिखने, पढ़ने, बोलने की आपको आजादी है।‘‘ जी खुश हुआ, मगर शर्त पढ़ कर हम बुझ गये-

दिन में 501 बार नरेंद्र मोदी लिखें।

दिन में 501 बार नरेंद्र मोदी पढ़ें।

दिन में 501 बार नरेंद्र मोदी बोलें।

अब यह आप पर निर्भर करता है, कि आप लिखने, पढ़ने और बोलने की आजादी का उपयोग कितना करते हैं? करते हैं, या नहीं करते हैं? यदि करते हैं तो यह उम्मीद करनी चाहिये कि साल के आखिर तक आप पर पुरस्कारों की जलेबी जरूर टपकेगी।

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