Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / बिहार – जीत के बाद बहस जारी है

बिहार – जीत के बाद बहस जारी है

Nitish-Lalu-PTI

बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम को ले कर बहस जारी है। इस बहस को अभी जारी रहना है।

बहस हार और जीत पर होगी,

भारतीय राजनीति में बनते हुए विकल्पों की होगी,

कांग्रेस और राजद की होगी,

लालू प्रसाद यादव के वापसी की होगी

और सबसे ज्यादा नरेंद्र मोदी की होगी। उनकी नीतियों की असफलता और उनके सम्मोहन के टूटने की होगी।

बहस यदि नहीं होगी, या होगी तो सबसे कम, उन ताकतों के बारे में जो आज देश की अर्थव्यवस्था और उसकी राजनीतिक संरचना पर अपनी पकड़ बढ़ाती जा रही हैं। जिसने चुनाव को जश्न बना दिया है। चुनाव प्रचार में विदेशी कम्पनियों के दखल को बढ़ा दिया है। चुनाव को इतना महंगा बना दिया है, कि अब यह करोड़ों-करोड़ का कारोबार है।

राजनीति अब इतना बड़ा उद्योग है, कि उसे चलाने के लिये बड़ी पूंजी और कई छोटे-बड़े उद्योगों की अनिवार्यता बन गयी है। कह सकते हैं, कि अब वह बाजार की चीज बन गयी है। जिसमें मतदाता श्रमशक्ति की तरह उत्पादन का स्त्रोत है, जिसे पूंजी के नियंत्रण में डाल दिया गया है। पूंजी की वरियता कायम हो गयी है। ‘अपने देश एवं प्रदेश की सरकार बनाने का अधिकार उस देश एवं प्रदेश की आम जनता को है‘ की सोच को व्यावहारिक रूप में घेर दिया गया है। आम जनता या मतदाता विकल्पों की रचना नहीं कर रहा है, बल्कि वह रचे गये विकल्पों को चुनने के लिये विवश है।

2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी कांग्रेस के विरूद्ध प्रायोजित विकल्प थे, और बिहार 2015 में नीतीश, लालू और राहुल नरेंद्र मोदी का विकल्प हैं। जिन्हें बड़ी सफलता मिली।

नीतीश कुमार बिहार के विकास की सूरत बने।

लालू प्रसाद यादव के सारे पाप धुल गये

राहुल गांधी (कांग्रेस) के गिरावट की रफ्तार घट गयी।

नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ अपने ही रचे सवालों और अपने ही किये वायदों से घिर गये। उनके कारनामों ने भी बड़ा काम किया। ‘मोदी कार्ड‘ पिट गया। आजमाये हुए नुस्खों के खिलाफ लालू के आजमाये हुए नुस्खों ने काम किया। कह सकते हैं, कि बिहार का चुनाव परिणाम आजमाये हुए नुस्खों का परिणाम है। जिसका सकारात्मक पक्ष बस इतना है, कि मोदी इकलौता नहीं। आम जनता की बात करें तो वह विकास के नाम पर बाजार और राष्ट्रीयता के नाम पर हिंदुत्व के पक्ष में नहीं है।

modi-nitish-bihar-final2भाजपा नरेंद्र मोदी के लिये रचे गये अपने ही झूठ का शिकार हो गयी है। अपने को ‘कैडर बेस्ड‘ कहने वाले राजनीतिक दल की हालत इतनी खराब हो गयी है, कि वह बिहार चुनाव में नरेंद्र मोदी के अलावा और किसी को उतार नहीं सकी। अमित शाह नरेंद्र मोदी की बेढब काया ही प्रमाणित हुए। इसके बाद भी कोई खुल कर यह कहने की स्थिति में नहीं है, कि यह चुनावी हार नरेंद्र मोदी की है। वह लाख आत्म मंथन करें, लेकिन उसकी नीतियां नरेंद्र मोदी को ही प्रायोजित करते रहने की बनेगी, जिसे ‘राष्ट्रीयता‘ के घातक मुद्दे के तहत संघ और ‘आर्थिक विकास‘ एवं ‘आर्थिक सुधार‘ के मुद्द के तहत राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय ताकतें नियंत्रित करती हैं। मोदी कूटनीतिक समझ का दिखावा भर करेंगे।

भाजपा और संघ अपने ‘आर्थिक सुधार‘ और ‘राष्ट्रीयता‘ के मुद्दे को छोड़ने की स्थिति में नहीं है।

लालू यादव भले ही नरेंद्र मोदी को संघ का प्रचारक कहें, मगर यह प्रचार वित्तीय ताकतों का जरिया है, भारत की पहली काॅरपोरेट सरकार का मुखिया है। वह एकाधिकारवादी सोच का प्रतिनिधि है। जिसका सम्मोहन अब टूट रहा है, लेकिन उसे ‘सबसे बड़ा‘ प्रमाणित करने का मुहीम जारी है, और यह मुहीम अभी थमने को नहीं है।

बिहार चुनाव के परिणाम ने सबसे ज्यादा नरेंद्र मोदी को ही चैंकाया है। आने वाले कल में ‘अर्थव्यवस्था के निजीकरण‘ को राष्ट्रीय नीति और समाज में बढ़ती असहिष्णुता के मुद्दे को समझने की जरूरतें पेश आयेंगी। उन्हें प्रधानमंत्री के पद की गरिमा को भी समझना होगा। यह भी समझना होगा कि सस्ती लोकप्रियता स्थायी नहीं होती।

बिहार में, जो जनसमर्थन नीतीश कुमार और महागठबंधन को मिला है, उसमें लालू प्रसाद यादव का उदय एक सवाल है। यदि नीतीश सरकार पर लालू प्रसाद का दबाव बढ़ता है, तो सरकार की मुश्किलें बढ़ेंगी। गठबंधन की सरकार के सामने सवाल खड़े होंगे। इसके बाद भी सच यह है, कि भाजपा और संघ के खिलाफ राजनीतिक ध्रुवीकरण का बढ़ना तय है। भाजपा के लिये अन्य राज्यों का चुनाव एकतरफा या आसान नहीं होगा।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top