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असहिष्णुता निवेश के लिये खतरा?

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सरकार को अपनी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छवि की बड़ी फिक्र है। जिसका सम्मोहन टूट रहा है।

उसकी समझ में नहीं आ रहा है, कि वह इस मौके का फायदा उठाये या कदम खींच ले?

उसने यह सोचा नहीं था, कि लेखको, वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और कलाकारों के ‘सम्मान वापसी का मामला‘ बढ़ती असहिष्णुता का मामला बन जायेगा। वह इस सीमा तक तूल पकड़ लेगा, कि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू हो जायेगी। उसकी आर्थिक नीतियों और राजनीतिक उद्देश्यों को प्रभावित करने लगेगी।

सरकार अपनी मुश्किलें बढ़ाना नहीं चाहती, और यह भी नहीं चाहती कि उस पर असहिष्णुता का आरोप सिद्ध हो। जबकि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह मान लिया गया है, कि इस बीच भारत में असहिष्णुता बढ़ी है। जिसके लिये सरकार से जुड़े संगठन और स्वयं सरकार ही जिम्मेदार है।

नरेंद्र मोदी को सलाह दी जा रही है, कि वो अपने मंत्रियों की जुबान पर लगाम लगायें और उनसे मांग की जा रही है, कि वो अपना मुंह खोलें।

लगाम वो लगाना नहीं चाहते, या लगा नहीं पा रहे हैं?

जुबान वो खोलना नहीं चाहते, या न खोलने की हिदायत है?

यह वही बता सकते हैं।

ब-हरहाल, मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है, और उनकी आर्थिक नीतियां -निजीकरण और विदेशी पूंजी निवेश- प्रभावित हो रही है, जिसके लिये वो प्रायोजित प्रधानमंत्री हैं, और जिस पिंजड़े में दानव की जान बसती है। जो भारत में वित्तीय वर्चस्व उसके लोकतांत्रिक ढांचे में चाहता है। वह उन मुद्दांे को हवा देना नहीं चाहता, जिसकी वजह से सामाजिक असंतोष बड़ी बाधा बन सकती है। लेकिन सकरार और उससे जुड़े संघ और हिंदूवादी संगठन मोदी सरकार को अपने लिये विस्तार का अवसर मान कर चल रहे हैं। वैसे भी, सरकार की नीतियां लोगों को गलत मुद्दों से जोड़ कर रखने की है, ताकि सरकार की आर्थिक एवं राजनीतिक असफलताओं पर परदा पड़ा रहे और ऐसी अनिवार्यतायें बन सकें कि आर्थिक विकास के लिये पूंजी निवेश और राजनीतिक एकाधिकार को स्वीकृति मिल सके।

जिन मुद्दों पर सरकार परदा डाल कर रखना चाहती है, उन मुद्दों का वामपंथी रचनाकारों ने ‘असहिष्णुता‘ के जरिये मुद्दा बना दिया है।

नरेंद्र मोदी चाहे जितनी ऊंची आवाज में बोलें,

चाहे जितनी जगहों पर बोलें,

उनकी बातों को मीडिया चाहे जितनी बार दुहराये कि ‘सरकार की आर्थिक विकास योजनाओं का लक्ष्य देश की सवा सौ करोड़ अबादी का हित है।‘ यह खुली किताब है, कि सरकार काॅरपोरेट की है और अब तक मोदी की प्रचारित सभी योजनाओं में उन्हीं के हितों की वरियता हैं उनकी बाजारवादी सोच देश और जनविरोधी है। भले ही उन्होंने छठे दिल्ली आर्थिक सम्मेलन में अपनी 17 महीने की सरकार की उपलब्धियों का बखान करते हुए बड़ी-बड़ी बातें की। मगर यह भी सच है, कि देश की आम जनता की मुसीबतें लगातार बढ़ी हैं, उसकी नाराजगी भी बढ़ रही हैं प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था के मैराथन में शामिल हैं, और अब तक के छोटी दौड़ से बड़े-बड़े लोग ही मालामाल हुए हैं। इसी सम्मेलन में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य और अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज को वक्ताओं की सूची से सिर्फ इसलिये हटाया गया कि वो नरेंद्र मोदी को आईना न दिखा दें। जो मानते हैं, कि नीतियां जनविरोधी हैं, और असहिष्णुता बढ़ रही है।

सरकार अपनी छवि को अपने ही तरीके से ठीक रखना चाहती है। उसने अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेन्सीज -जिसकी रिपोर्ट से विदेशी पूंजी निवेश की परिस्थितियां बनायी जाती हैं- के असहिष्णुता सम्बंधी आंकलन को सरकार स्वीकार नहीं कर सकी है, जिसका खयाल है, कि बिगड़ती हुई स्थितियों का प्रभाव विदेशी पूंजी निवेश पर पड़ेगा और यह सुधारों की गति में अवरोध पैदा कर सकती है।

सरकार की प्रतिक्रिया और उसकी मीडिया के रवैये को खारिज करते हुए रेटिंग एजेन्सी मूडीज के विश्लेषकों ने स्पष्ट किया है, कि उसके द्वारा जारी वक्तव्य उसके आर्थिक विश्लेषण का हिस्सा है। वाशिंगटन और अमेरिकी अखबारों ने भी भारत में बढ़ी असहिष्णुता को, उसके आर्थिक सुधारों के लिये ‘निराशाजनक‘ करार दिया है। न्यायाॅर्क टाइम्स ने ‘हिंदू अतिवाद की कीमत‘ के रूप में संपादकीय लिखा है।

‘‘यह वह भारत नहीं है, जैसा बड़ी संख्या में भारतीय चाहते हैं। यह वह भारत भी नहीं है, जो विदेशी निवेश को आकर्षित कर सके, जिसके लिये मोदी ने अपने विदेश यात्राओं में मेहनत की है।‘‘

मूडीज ने भी चेतावनी दी थी, कि ‘‘राजनीतिक विफलता आर्थिक परिणामों के लिये घातक हो सकती है।‘‘ उसने प्रधानमंत्री को भाजपा नेताआंे और मंत्रियों पर लगाम लगाने की सलाह देते हुए कहा है, कि ‘‘मोदी घरेलू और वैश्विक स्तर पर अपनी विश्वसनियता खो देंगे। इस बात का खतरा है।‘‘

मोदी अपने सिपहसालारों के जरिये अभी भी आक्रामक बने हुए हैं। सरकार यह मानने के मूड में नहीं है, कि देश में असहिष्णुता बढ़ी है। वो रचनाकारों, कलाकारों, वैज्ञानिकों और समाज के बहुद्धिजीवी वर्ग पर अपने समर्थक ऐसे ही लोगों के द्वारा, अपने पक्ष में माहौल बनाने में लगे हैं। अनुपम खेर बिना जड़ और बाल के बुद्धिजीवी बने हैं। जो उन लोगों का मोर्चा संभाल रहे हैं, जिसके पास अपने पक्ष में सिर्फ एक ही तर्क है, कि ‘‘1984 में सिक्खों के खिलाफ देश में दंगा हुआ था।‘‘ जिसे किसी बुद्धिजीवी ने बाबरी मस्जिद के ध्वंस की तरह ही जायज करार नहीं दिया। वामपंथी तबीयत के लोग तो हर हाल में साम्प्रदायिकता और जातीय हिंसा के विरूद्ध हैं। उन्होंने सम्मान वापस करने वालों पर देश को बद्नाम करने का आरोप लगाया और अरूंधति राय को ‘फण्ड के लिये भारत के खिलाफ बोलने वाला‘ करार दिया। खेर साहब, पिछले 17 महीनों से नरेंद्र मोदी, क्या फण्ड (विदेशी पूंजीनिवेश) के लिये देश को बद्नाम नहीं कर रहे हैं?

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