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अमेरिकी शटडाउन और दिवालियापन का खेल

23435746अमेरिकी सरकार सारी दुनिया को एक ऐसे बड़े संकट में फंसाने की तैयारी कर रही हैं, जिससे उसके वर्चस्व को चुनौतियां न मिल सकें। वह पिछले एक दशक से यही कर रही है। बराक ओबामा जिसकी सूरत हैं।

वैशिवक मंदी

लीबिया का युद्ध

सीरिया का संकट

सर्विलांस प्रोग्राम का खुलासा

एशिया प्रशांत क्षेत्र में नौ सैनिक बेड़ों का जमावड़ा

चीन की वित्तीय एवं सैनिक घेराबंदी

और अब अमेरिकी शटडाउन, दिवालिया होने के संकट का भय दिखाना।

जिसके बारे में कहा जा रहा है कि ”अमेरिकी संकट वैशिवक संकट को जन्म दे सकती है।” एक नये वैशिवक मंदी की शुरूआत हो सकती है। यदि आज अमेरिका को दुनिया के नक्शे से मिटा दिया जाये तो दुनिया को -खास कर तीसरी दुनिया को- जितनी राहत मिलेग, वैशिवक मुद्रा को लेकर उतनी ही नयी समस्याओं का जन्म हो जाएगा।

किसी भी साम्राज्य के पतन के बाद जो होता है, अमेरिकी साम्राज्य के पतन के बाद, उससे कुछ ज्यादा होगा, क्योंकि पूंजीवाद वैशिवक संरचना में बदल गया है, जिसके केंद्र में अमेरिका है। उसकी सामरिक एवं वित्तीय संरचना हैं अमेरिकी सरकार के पास अपने सही होने का जो झूठा तर्क था, अब वह भी नहीं रह गया है। वह अपनी समस्या और मिल रही चुनौतियों को सुलझाने में नाकाम है, यही कारण है कि अब वह इनका ‘फायदा उठाने की नीतियों’ पर चल रही है। ओबामा जानते हैं, कि अमेरिकी शटडाउन का मतलब वैशिवक संकट है। वित्तीय उथल-पुथल है, चीन जैसे वैशिवक वित्तीय व्यवस्था के सामने संकट है, जिसने अमेरिकी वित्त व्यवस्था में भारी निवेश कर रखा है। अमेरिका के दिवालिया होने से चीन ही नहीं ब्रजील और जापान की हालत भी बिगड़ जाती। भारत ने भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में ट्रेजरी बाण्ड के रूप में 59 अरब डालर निवेश कर रखा है। सबसे अहम बात की मुद्रा के रूप में डालर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा की तरह व्यवहार में है।

विश्व समुदाय बड़ी राहत की सांस ले रहा है, कि 17 अक्टूबर से पहले अमेरिकी सरकार के कर्ज की सीमा बढ़ा दी गयी, अमेरिका दिवालिया होने से बच गया। शटडाउन खत्म हुआ, डेमोक्रेट और रिपबिलकन के बीच सहमति बन गयी, मामला सुलझ गया। अमेरिका को भी अच्छा लग रहा है, मगर सच वह नहीं है, जो नजर आ रहा है, उससे गहरा है।

व्हार्इट हाउस और अमेरिकी कांग्रेस ने यह प्रमाणित कर दिया, कि वैशिवक वित्त व्यवस्था उसके बिना नहीं चल सकती।

इस नजरिये से यदि आप देखें, और यदि आप जानते हैं, कि व्हार्इट हाउस और अमेरिकी कांग्रेस (सीनेट और प्रतिनिधि सभा) के ऊपर भी वास्तव में कोर्इ है, तो आप को लग सकता है, कि यह सब डेमोक्रेटस और रिपबिलकन के द्वारा मिल-जुल कर खेला गया खेल है। खतरा टला नहीं, बलिक पहले से ज्यादा बढ़ गया, कि निजी वित्तीय पूंजी के विशाल साम्राज्य के नीचे वैशिवक वित्त व्यवस्था आ गयी है। वह जब चाहे उसे, उसकी संरचना को, अपने हित में बदल सकता है। अमेरिकी बाण्डों की कीमत गिरा सकता है, दुनिया के कारोबार को रोक सकता है, मुद्रा का संकट पैदा कर सकता है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में मान्य डालर उसके रहम-ओ-करम पर है। अब दुनिया की कमान बैंकों के ऊपर बैठे बैंक, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां और निजी कम्पनियों -कारपोरेशना के ऊपर बैठे उन लोगों के संयुक्त हाथों में है, जिसकी पहचान सिर्फ निजी पूंजी- वित्तीय पूंजी के रूप में की जा सकती है।

अमेरिकी सरकार -व्हार्इट हाउस और कांग्रेस- उसके सामने एक बड़ा मोहरा भर है। या यूं कह लें कि भारी मुनाफा कमाने का जरिया है। अमेरिकी सरकार के दिवालिया होने का मतलब होता, फेडरल रिजर्व का दिवालिया होना, जो अमेरिकी डालर और अमेरिकी बाण्ड छापती है, जिस पर अमेरिकी वित्त व्यवस्था और वित्तीय पूंजी की ताकत टिकी हुर्इ है। इसलिये यह सोचने की कोर्इ ठोस आधार बनता है, कि वित्तीय शकितयां मुनाफे के इतने स्थायी स्त्रोत को बंद करेंगी? निश्चय ही नहीं। कोर्इ ठोस आधार नहीं है। अमेरिकी साम्राज्य वित्तीय पूंजी के लिये मुनाफे का बड़ा धंधा हैं सबसे बड़ी दुकान है। जिसके पास दुनिया की सबसे बड़ी सेना भी है। और अब साम्राज्यवादी ताकतें अपनी कमजोरी दिखा कर, आम जनता और दुनिया को नये-नये खतरों का डर दिखाने लगे हैं। डर दिखा कर कमाने लगे हैं। राज्य पर बाजार के वर्चस्व को बढ़ाने की यह कारगुजारी है। जिससे आम अमेरिकी सहमत नहीं है।

रासमुसेन रिपोर्ट ने 17 अक्टूबर को एक सर्वे जारी किया। जिसके अनुसार 80 प्रतिशत अमेरिकी मतदाताओं का मानना है कि ”अमेरिकी सरकार गलत दिशा की ओर बढ़ रही है। सिर्फ 13 प्रतिशत लोग ही ऐसा मानते हैं कि अमेरिकी सरकार के विकास की दिशा सही है।” सरकार को गलत मानने वालों की संख्या एक सप्ताह में 4 प्रतिशत बढ़ी है। पीयू रिसर्च द्वारा कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार 81.1 प्रतिशत अमेरिकी अमेरिका में जो हो रहा है, उससे असंतुष्ट हैं, और मात्र 14 प्रतिशत लोग ही सरकार से संतुष्ट हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 16 दिनों के सरकारी शटडाउन की वजह से लोगों का विश्वास अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। 10 में से मात्र 2 लोगों का विश्वास आज भी बरकरार है।

ओबामा सरकार के ‘शटडाउन’ ने आम अमेरिकी के विश्वास को पूरी तरह तोड़ दिया है। उन्हें विश्वास हो गया है, कि ‘डेमोक्रेटस’ और ‘रिपबिलकन’ के बीच कोर्इ फर्क नहीं है। ‘गालप’ की रिपोर्ट है, कि 60 प्रतिशत अमेरिकियों का कहना है कि ”अमेरिका में इन दो पार्टियों के अलावा तीसरी पार्टी का होना जरूरी है, क्योंकि डेमोक्रेट और रिपबिलकन अब आम जनता का नेतृत्व (प्रतिनिधित्व) नहीं करते।”

‘आकोपार्इ वाल स्ट्रीट मोमेन्ट’ के बाद से अमेरिकी सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। ओबामा सरकार इस गुस्से का समाधान करने के बजाये या तो गलत आंकड़ों से बेरोजगारी घटाने का दावा कर रही है, या डालर छाप कर अपने को बचाने का ढाेंग रच रही है। उसकी कोशिश आम जनता को वित्तीय पूंजी की गिरफ्त में जकड़ना हो गया है। जिस समय सरकारी शटडाउन से लाखों कर्मचारियों को अपनी नौकरी से हाथ धोने का डर परेशान कर रहा था, और कर्ज की सीमा न बढ़ने पर अमेरिकी सरकार के दिवालिया होने का खतरा सिर पर सवार था, ठीक उसी दौरान कर्इ सीनेटर और हाउस आफ रिप्रजेन्टेटिव के सदस्य जश्न मना रहे थे। निजी पार्टियां हो रही थीं, शराब का दौर चल रहा था। डब्ल्यू यू0एस0ए-9 न्यूज ने तस्वीरों के साथ ऐसी खबरें छापी। न्यूज स्टेशन ने शटडाउन की दूसरी रात, हाउस माइनोरिटी विप स्टेनी होयर की एक्ट्रेस सलमा हयाक के साथ फोटो के लिये पोज दे रहे थे। एक फोटो भी छपी।

1 अक्टूबर को टविटर पर ऐसे कर्इ ‘पोस्ट’ आये जिनमें उन कांग्रेस सदस्यों की जानकारियां थीं, जो अंतिम क्षण में समझौता तक पहुंचाने के लिये काम कर रहे थे। जिनसे आ रही अल्कोहल (शराब) की गंध को सूंघा जा सकता था।

‘पीयू रिसर्च’ की रिपोर्ट है कि ‘एक समय था, जब 1958 में जब अमेरिकी कांग्रेस पर 73 प्रतिशत लोगों का यकीन था, आज मात्र 19 प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं।’ यह भरोसा धीरे-धीरे ही सही मगर खत्म हो गया है।

इसके बाद भी आम अमेरिकी आज भी इस भरम का शिकार है, कि उनकी व्यवस्था तो अच्छी है, मगर उसे संभालने वाले लोग गलत हैंं। लगभग 58 प्रतिशत लोगों का कहना है कि ”राजनीतिक संरचना तो ठीक है, मगर कांग्रेस के सदस्य परेशानी हैं।” जबकि 32 प्रतिशत लोग यह मानते हंै कि देश की राजनीतिक संरचना ही गलत है।” सीबीएस न्यूज के अनुसार अपने देश की राजनीतिक संरचना से नाराज लोगों की संख्या अब 90 प्रतिशत हो गयी है।

अमेरिकी ‘शटडाउन’ इन्हीं नाराज लोगों पर अपनी पकड़ बनाये रखने नयी कटौतियों के लिये जायज तर्क बनाने का षडयंत्र है। जिसमें डेमोक्रेट पार्टी और रिपबिलकन पार्टी -दोनों ही बराबर के हिस्सेदार हैं। अमेरिका तेजी से यूरोपीय संकट सा बनता जा रहा है। जिन देशों की आम जनता अपने देश की सरकार, यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के खिलाफ है। जहां बेरोजगारी अपने चरम पर है, और सामाजिक कार्यों में कटौतियों सहित नये करों का भारी बोझ है। कर्ज का संकट वित्तीय संकट में बदल चुका है। जहां आधी से अधिक आबादी बेरोजगार हैं

सितम्बर में लगभग 1,12,55,000 अमेरिकी बेरोजगार थे। लगभग 9,06,09,000 अब लेबर फोर्स में नहीं हैं, उन्होंने काम ढंूढना बंद कर दिया है। यदि दोनों अंकों को जोड़ दिया जाये तो 101 मिलियन अमेरिकी लोगों के पास कोर्इ काम नहीं है। आपरचुनिटी नेशन कोलिशन के अनुसार 16 से 24 साल के अमेरिकी युवाओं की संख्या 6 मिलियन हो गयी है, जो न पढ़ते हैं, ना ही जिनके पास काम है।

ओबामा सरकार ने इस ‘शटडाउन’ से अपनी व्यवस्था को बचाने के लिये सरकारी खर्च में नयी कटौतियों के लिये तर्क रच लिया है, ताकि आम अमेरिकी को धोखे में डाला जा सके। खर्च में कटौती के नाम पर सरकार के द्वारा चलाये जा रहे सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम और स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के लिये दिये जाने वाले सरकारी सहयोग में कटौती का प्रस्ताव ही सामने आता है। वह युद्ध, सुरक्षा और सेना पर कटौतियां करने की सिथति में नहीं है, ना ही बड़े लोगों पर टैक्स बढ़ा सकती है। जो अर्थव्यवस्था पर बोझ है। वह अंतर्राष्ट्रीय साजिशों और षडयंत्राें को रोक नहीं सकती, जो अब अमेरिकी साम्राज्य के पक्ष में नहीं है। सच यह है, कि अमेरिकी सरकार और अमेरिकी वैशिवक वित्तीय संरचना अब संभलने की संभावनायें खो चुकी है। उसका जनविरोधी होते जाना ही उसकी नियति है। और वह उसी ओर बढ़ रही है।

अमेरिका ट्रेजरी डिपार्टमेण्ट ने 16 अक्टूबर को इस बात की घोषणा की कि अमेरिका का सार्वजनिक घाटा, देश के इतिहास में पहली बार 17.076 टि्रलियन डालर पहुंच गया है। बराक ओबामा ने जब पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभाला था, तब अमेरिका का कर्ज 10.627 टि्रलियन डालर था। जो अब ओबामा के दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष में 6.5 टि्रलियन डालर बढ़ा है। किसी भी देश का कर्ज में डूबने का यह रिकार्ड अपने आप में बेमिशाल है। जो इस बात का प्रमाण है, कि अब आगे और कोर्इ रास्ता नहीं है।

अमेरिकी व्यवस्था उसकी वित्तीय संरचना पहले ही दिवालिया हो चुकी है, वह आज तक सिर्फ इसलिये खड़ी है, कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में अमेरिकी डालर का प्रचलन है, जिसे छापने का अधिकार फेडरल रिजर्व के पास है। अमेरिकी व्यवस्था वास्तव में अपनी मुद्रा -डालर और पेट्रोडालर के रहम-ओ-करम पर है। जिसे गंभीर चुनौतियां मिल रही हैं। यही अमेरिका की सबसे बड़ी परेशानी और अब तक के अमेरिकी दबाव का आधार है। अमेरिकी सरकार वास्तव में मुद्रा (डालर) का निर्यात करती है। आप चाहे तो कह सकते हैं कि ”वह डालर का निर्यातक देश है।”

दुनिया भर में डालर की मांग अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में सबसे ज्यादा है। दो देशों के आपसी व्यापार के लिये इसका उपयोग होता है, जिसके केंद्र में पेट्रो डालर है। दुनिया भर में तेल की खरीदी-बिक्री के लिये पेट्रोडालर की जरूरत होती है। जिसे अब गंभीर चुनौती मिलने लगी है। दुनिया में ऐसे 11 समझौते हुए हैं, जो आपसी व्यापार में अपनी मुद्रा (दोनों देशों) का उपयोग कर रहे हैं। इनमें से 9 समझौतों में चीन है। चीन अमेरिकी शटडाउन और उसके दिवालिया होने की सिथतियों का पूरा लाभ उठाना चाहता है। जिस से अमेरिकी सरकार दुनिया की मुद्रा व्यवस्था को संकट में डालने का डर दिखा रही थी, उन्हीं कमजोरियों से चीन ने वैकलिपक मुद्रा व्यवस्था और समानांतर वित्त व्यवस्था की अनिवार्यता दिखाने में सफलता हासिल कर ली है। अमेरिकी डालर पर गंभीर हमले की शुरूआत हो गयी है।

अब ओबामा सरकार की नीतियां आपस में उलझ गयी हैं। वह न तो अपने राजनीतिक हितों को पूरा कर पा रही है, ना ही उसकी वित्त व्यवस्था ऐसी बची है कि वह उन पर अमल करा सके। यदि सउदी अरब जैसे दुनिया के बडे़ तेल निर्यातक देश अपना तेल व्यापार अमेरिकी डालर के स्थान पर दूसरी मुद्रा में करने लगे तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त होने में समय नहीं लगेगा। वह उसी दिन ध्वस्त हो जायेगा। उसका मुंह के बल गिरना तय है। यही कारण है कि वाशिंगटन सउदी अरब को हर हाल में अपनी पकड़ में रखना चाहता है। उसे खोने का मतलब मुद्रा बाजार में डालर के वर्चस्व को खोना है। इसलिये सउदी अरब को खुश रखना उसकी नीति है।

इस बीच सउदी अरब और अमेरिका के सम्बंधों में गहरा तनाव आ गया है। सउदी अरब सीरिया और र्इरान के बारे में आये अमेरिकी नीतियों में बदलाव से सख्त नाराज है। सउदी अरब के स्पार्इ प्रिंस बंदर-बिन-सुल्तान ने यूरोपीय राजनीतिज्ञों से कहा है कि ”अमेरिका सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद के खिलाफ और इस्त्राइल-फिलिस्तीन मुददे पर कुछ भी प्रभावशाली कर पाने में असफल रहा है। वह र्इरान से अपने सम्बंधों को बढ़ा रहा है और बहरीन में सउदी अरब को समर्थन देने में भी असफल रहा है।” डेली-मेल में छपी इस रिपोर्ट का विशेष महत्व है, क्योंकि अमेरिका अब अपने मित्र देशों की अपेक्षाओं -जो भले ही गलत है और जिसे अरब जागत में अमेरिकी सरकार ने ही बढ़ाया है- को पूरा करने की सिथति में नहीं है, जिसकी वजह हो रहे वैशिवक परिवर्तन हैं। सउदी अरब हर हाल में चाहता है, कि अमेरिकी सेना सीरिया के गृहयुद्ध में राष्ट्रपति बशर-अल-असद के खिलाफ विद्रोहियों के पक्ष में हस्तक्षेप करे। मगर रूस और सीरिया के मित्र देश एवं संगठन तथा विश्व जनमत की वजह से ऐसा किया नहीं जा सका, और अमेरिकी सरकार को कूटनीतिक पराजय का सामना करना पड़ा।

सीरिया के प्रायोजित गृहयुद्ध ने इराक, अफगानिस्तान और लीबिया में किये गये अमेरिकी -नाटो एवं बहुराष्ट्रीय सेना- सैन्य हस्तक्षेप तथा आतंकियों से उसके सम्बंधों को नये सिरे से खुलेआम कर दिया। कतर में किया गया सत्ता परिवर्तन और मिस्त्र में मुसलिम ब्रदरहुड़ के राष्ट्रपति मुर्सी की विदार्इ ने तुर्की को आशंकित कर दिया है। प्रधानमंत्री एरडोगन अपने को असुरक्षित पा रहे हैं। अमेरिकी सरकार अब अपने ही मित्र देशों के लिये विश्वसनिय नहीं रह गयी है। रार्इटर्स के अनुसार- ”सउदी अरब का यह कहना कि ”इस वक्त सभी विकल्प खुले हुए हैं”, का प्रभाव तो कुछ न कुछ पड़ेगा ही।”

सउदी अरब अमेरिकी जुबान में ही अपनी बातें कर रहा है। जो बातें अमेरिकी सरकार और बराक ओबामा सीरिया और र्इरान के खिलाफ कर रहे थे, अब अमेरिका से नाराज सउदी अरब कह रहा है।

अमेरिकी शटडाउन और दिवालिया होने की सिथति के लिये चली गयी अमेरिकी गोटियों का असर अमेरिका के खिलाफ ही पड़ा है। वह अपने को, अपनी कमजोरियों से, दुनिया को खतरे में डालने की लड़ार्इ हारता जा रहा है। चीन ने इसे बड़ा मुददा बना दिया है। चीन को घेरने की उसकी सामरिक एवं वित्तीय नाकेबंदी का खेल अमेरिका के लिये जोखिमों से भरा खेल बन गया है। डालर के वर्चस्व का टूटना और अमेरिकी साम्राज्य का ढ़हना लगभग तय है।

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