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संघ की तरह हो राज्य सरकारों के लिबास

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लोकतंत्र में आम चुनाव क्यों?

यह एक ऐसा सवाल है, जिससे टकराये बिना, न तो हम अपने देश की चुनी हुई सरकारों को समझ सकते हैं, ना ही हम यह जान सकते हैं, कि वो क्या कर रही हैं?

सामान्य रूप से माना यही जाता है, और यही वैधानिक प्रावधान है, कि अपने देश की सरकार को चुनने और उसे बनाने का अधिकार, उस देश की आम जनता को है। आम जनता की सर्वोच्चता सरकारों के माध्यम से ही व्यक्त होती है। जिसका एक ही अर्थ निकलता है, कि सरकारें आम जनता के प्रति जिम्मेदार होती हैं।

इसमें कुछ भी गलत नहीं।

लेकिन, बिहार चुनाव के बाद केंद्र की मोदी सरकार जो कर रही है, वह अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि आम जनता सरकार बनाने का ऐसा वैधानिक जरिया है, जिससे वित्तीय ताकतों के हितों को पूरा करने का वैधानिक अधिकार हासिल किया जाता है।

इस नजरिये से देखिये तो आम चुनाव सरकार बनाने का ऐसा जरिया है, जिसमें वित्तीय ताकतों का हित है। आम जनता का हित कहीं नहीं।

मोदी सरकार राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों को यह विश्वास दिलाने में लगी है, कि ‘आर्थिक सुधारों‘ पर बिहार चुनाव परिणाम का कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। ‘आर्थिक सुधार‘ जारी रहेंगे। उसकी नीतियों में कोई बदलाव नहीं आयेगा। उसकी प्रतिबद्धता उनके प्रति असंदिग्द्ध है। वह यह विश्वास दिलाने में लगी हुई है, कि जिन उद्देश्यों के तहत केंद्र में मोदी सरकार बनी है, वह उन्हीं उद्देश्यों को पूरा करने के लिये वचनबद्ध है।

वह आर्थिक सुधारों की नयी पेशकश कर चुकी है। 8 नवम्बर को चुनाव परिणाम के तत्काल बाद ही आर्थिक सुधारों एवं आश्वासनों की नयी खेप उतार दी गयी।

वह अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिये, होने वाले राज्यों के चुनावों की तैयारी में लग गयी है। उसके सामने उत्तर प्रदेश, प0 बंगाल और महाराष्ट्र है। वह तमाम गैर-भाजपायी सरकारों की जगह भाजपा की सरकार चाहती है। मगर, दिल्ली के बाद बिहार की पराजय से वह हिल गयी है।

भाजपा, संघ और सरकार के घरेलू विवादों में चुनावी हार ही मूल वजह है। नीतिगत मुद्दों में संगठन का ढांचा है, सरकार की नीतियां नहीं। उनकी सोच में यह बात ही नहीं है, कि आम जनता के हितों का खयाल न रखना बड़ा मुद्दा है। बल्कि उनकी सोच इस बात से संचालित हो रही है, कि सरकार वित्तीय ताकतों से किये गये वायदों के लिये ठोस कदम नहीं उठा सकी है। संगठन और नेतृत्व के बीच हार की जिम्मेदारी लेने का विवाद है।

भाजपा की मुश्किल यह है, कि वित्तीय ताकतों के लिये नरेंद्र मोदी भाजपा में इकलौती सूरत है, और संगठन पर संघ की रखवाली है। ‘कैडर बेस्ड पार्टी‘ चेहरों की सरपरस्ती में लामबद्ध हो गयी है। न कवायतें रोकी जा सकती हैं, ना ही चेहरों को बदला जा सकता है। और जो है, उससे काम नहीं चलने को है।

अब हम उस सवाल के सामने हैं, कि लोकतंत्र में आम चुनाव का मतलब क्या है?

सरकार यदि वित्तीय ताकतों का हित और अपनी सरकार बनाये रखने की कवायत है, तो आम जनता की सरकार कहां है? वह लोकतंत्र कहां है, जिसकी सरकारें अपने देश की आम जनता का खयाल रखती हैं।

केंद्र के बाद, राज्यों में अपनी सरकार बनाने का मतलब भी यदि वित्तीय ताकतों का हित है, तो बड़ी सरकार के बाद देश की छोटी सरकारों को भी केंद्र की संघीय सरकार का वित्तीय लिबास पहनाना है। भारत में भाजपा यही चाह रही है। उसका मकसद देश को उग्रराष्ट्रवादी और अर्थव्यवस्था को बाजारवादी बनाना है। केंद्र में अपनी सरकार बनाये रखने और राज्यों में अपनी सरकार बनाने की बेचैनी भाजपा में साफ नजर आती है। वह चुनावों के माध्यम से राज्यों में अपनी सरकारें बना कर सत्तारूढ़ राजनीतिक दल बने रहना चाहती है। चाहती है, कि राष्ट्रीय परिदृश्य में उसकी अपनी सरकारें हों।

बिहार चुनाव ने मोदी के करिश्मा को घटा ही नहीं दिया है, नीतीश कुमार को राष्ट्रीय परिदृश्य में भी ला दिया है, जो मोदी के चलता-पुर्जा व्यक्तित्व के विरूद्ध सम्मानित और सौम्य हैं। इसलिये, भाजपा तथा मोदी सरकार ऐसे किसी भी व्यक्तित्व या राजनीतिक दल को राष्ट्रीय राजनीति में अपने लिये खतरा मान रही है। एक चुनाव के बाद दूसरा चुनाव जीतना ही उसका मकसद बन गया है। वह अपने को एकमात्र राजनीतिक दल और अपने नेता को एकमात्र राष्ट्रीय नेता बनाने की नीतियों पर चल रही है। वह कांग्रेस का विकल्प बन कर उभरी और अब विकल्पहीनता की नीतियों पर चल रही है। उसकी सोच भारतीय लोकतंत्र में एकाधिकारवादी सरकार का निर्माण करना है, देश एक उसके राज्यों में एक ही किस्म की ऐसी सरकार का निर्माण करना है, जो बाजारवादी अर्थव्यवस्था के तहत वित्तीय तानाशाही का निर्माण करे।

भाजपा सब कुछ अपने और अपने नेता के नाम से कराना चाहती है, और चाहती है, कि लोग इसे लोकतंत्र मानें। वह इस सच को नहीं देख पा रही है, कि साम्राज्यवादी वित्तीय ताकतों के लिये किसी भी देश की सरकार, उस देश की अर्थव्यवस्था और उसके प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार जमाने का जरिया होती है। वो जिन सरकारों को बनाती है, उन्हीं सरकारों का तख्तापलट भी कर देती है।

मिस्त्र में उन्होंने यही किया। तीसरी दुनिया के देशों में वो ऐसा करती रही है। सैंकड़ों उदाहरण हैं। वो विकल्पों की राजनीति से आम लोगों को विकल्पहीन बनाती है। इसलिये भाजपा और मोदी उनके लिये तब तक अपने हैं, जब तक उपयोगी है। वो अपने हितों के लिये सरकारों को बनाती और बिगाड़ती है। मोदी के साथ इस देश में इस खेल की शुरूआत हो गयी है।

हम उस बुरे दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जहां जनविरोधी सरकार का विकल्प दूसरी जनविरोधी सरकार ही होगी। चुनाव का हासिल जनसमर्थक सरकर के रूप में, तब तक संभव नहीं है, जब तक वर्गगत राजनीतिक चेतना का विकास नहीं होगा। जिसकी पहल भी इसी दौरान संभव है। जिसे रोकने के लिये सरकार और वित्तीय ताकतें फाॅसिस्ट ताकतों को बढ़ावा देंगी, जिसकी शुरूआत हो चुकी है।

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