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मालिनी गौतम की चार कविताएँ

मालिनी  जी1. प्रेम में होना

प्रेम औरत के लिए होता है कुछ ऐसा….
जो पल-पल होता है
प्रस्फुटित, पल्लवित,
जिसमें हर रोज़ फूटते हैं नवांकुर,
बिखरता है रेशम,
कोख में गहरे-गहरे फूटता यह बीज
हर रोज अपनी कोंपलों की छुअन से
देता है हरपल मीठी-सी अनुभूति

औरत शायद एक पल के लिए भी
उबरना नहीं चाहती
पुरुष के प्रेम से,
आसान होता है उसके लिए
अपने सभी सरोकारों को
ताक पर रखकर
सिर्फ पुरुष के प्रेम में जीना,
वह डूबती जाती है
उस गहराई तक
जहाँ पहुँचकर
उसका स्वयं का अस्तित्व
हो जाता है विलीन
खुद को मिटा कर भी
वह जी जाती है प्रेम को…

पर पुरुष..
जिस तीव्रता से चढ़ता है
प्रेम की सीढ़ियाँ,
उतनी ही तेज़ी से वापस
उतरना भी चाहता है,
इस भँवर में गोता लगाकर
अपनी दुनिया में
सहज होकर लौटना चाहता है,
समाज, राजनीति, मित्र,
फिल्म, क्रिकेट ,साहित्य, कविताएँ,
इन सबको ताक पर रखकर जीने की
वह कल्पना भी नही कर सकता…
सिर्फ प्रेम में जीना
शायद डायबीटिक होता है उसके लिए
तभी तो बड़े ही सहज रूप से
वह कभी-कभी
नमकीन-सा फ्लर्ट भी कर लेता है,
उसके लिये जरूरी होता है
हर हालत में
स्वयं के अस्तित्व को बचाए रखना
वो रखता है स्वयं को जिन्दा
प्रेम को मिटाकर भी….

 

2. लड़कियाँ बदली-बदली सी

स्कूल और कॉलेज में बैठीं,
हँसतीं, गुनगुनातीं,
अपनी दो चोटियों को
हवा में झुलातीं,
आँखों को गोल-गोल नचातीं लड़कियाँ
कभी पढ़तीं हैं प्रेमचन्द की “बूढ़ी काकी”
तो कभी निराला की “वह तोड़ती पत्थर”
अभी उन्हें पढ़ना है
शेक्सपियर की “सॉलिलोकीज़”
और वर्डस्वर्थ की” डैफोडिल,’
करने हैं दो-दो हाथ
पाइथागोरस की प्रमेय से….

वे दौड़ कर जातीं हैं
केमेस्ट्री की प्रैक्टिकल लैब में,
सबकी नज़र चुराकर
सोडियम के छोटे से टुकड़े पर
पानी की बूँदें डाल
पूरी लैब में सोडियम का गोल-गोल घूमना
और फिर भक्क से
आग की लपटों में बदल जाना
विस्फारित नजरों से देखती रहतीं हैं
और फिर देर तक
ठठाकर हँसतीं हैं
अपनी इस चंचल, जानलेवा शरारत पर….

अरे हाँ….
मौका मिलते ही
वे कस देतीं हैं फब्तियाँ
पास से गुज़रते
गाँव के दो शर्मीले लड़कों पर,
हीरो से दिखाई देते
अपने अंग्रेजी के प्रोफेसर की क्लास में
लड़कों को धकिया कर,
सबसे आगे की बेंच पर बैठकर,
वे बिना पलक झपकाए सुनती हैं
जेन आयर की प्रेम कहानी…

पूरे दिन गिलास में से छलकते
एनर्जी ड्रिंक की तरह तरोताजा
ठहाके लगाती, शोर मचाती लड़कियाँ
शाम ढले धीमे-धीमे कदमों से
चल देतीं हैं अपने घरों को
हवा मे उडते दुपट्टे
सिमट जाते है वक्ष पर
बेपरवाह चाल
तब्दील हो जाती है
सधे हुए कदमों में
बिंदास हँसी…शरारती नज़रें…चुलबुले ठहाके
सब समा जाते हैं
किसी जादुई बोतल में
कसमसाते-कसमसाते
अगले दिन का इंतज़ार करने के लिए….

घर आते-आते
ये लड़कियाँ
इतनी क्यों बदल जातीं हैं…???

 

3. सजा एक अपराध की

लड़कियाँ कटती हैं
खेत में खड़ी फसलों की तरह,
खटती हैं
मशीनों के कलपुर्जो की तरह,
कच्चे सूत-सी
काती जाती हैं चरखों पर,
कच्ची हांडी-सी
चढ़ाई जातीं हैं आँच पर,
शाख से बिखरकर
दफ़न हो जाती हैं मिट्टी में,
मालगाड़ी सी दौड़ती हैं
एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बीच,
हाथ पोंछे नैपकिन की तरह
फेंक दी ज़ाती हैं डस्टबिन में,…..
और इस तरह लड़कियाँ
भुगतती हैं दण्ड
अपने लड़की होने के
अघोषित अपराध का …

 

4. भीड़

भीड़ उतर आई है सड़कों पर
भीड़ चिल्लाती है,
नारे लगाती है,
तालियाँ बजाती है,
भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता,
कोई विचार नहीं होता
भीड़ ब्राह्मण,बनिया, पटेल
या भंगी-चमार नहीं होती,
भीड़ एक आक्रोश है…
भीड़ एक जूनून है…
भीड़ एक सैलाब है
जो सब बहा ले जाता है।

भीड़ तोड़-फोड़ करेगी,
भीड़ आग लगायेगी,
बस जलायेगी,
पेड़ गिरायेगी,
चक्का जाम करेगी,
रेल की पटरियां उखाड़ फेंकेगी,
भीड़ जान लेगी,
भीड़ जान देगी…

तमाशाई देखेंगे तमाशा चुपचाप,
भीड़ के तपते अलाव पर सिकेंगी रोटियाँ
जब मंद होगी आँच
तब डाली जाएँगी
धर्म और जाति की आहुतियाँ,
भीड़ फिर भड़केगी
भड़ भड़ भड़…
चिंगारियाँ उठेंगी
शोले भड़केंगे
कोई काँपते हाथों से इकट्ठा करेगा
अपने जले हुए घर की अस्थियाँ
तो कोई सीने से लगा लेगा
अपनी उजड़ी हुई दूकान की चिन्दियाँ,
कोई पागल-सा ज्ञान पिपासु
अपनी राख हुई किताबो के ढेर में ढूंढेगा
“सत्य के प्रयोग”
“सरस्वतीचंद्र”
“पाटण की प्रभुता”
“गुजरात के नाथ
और फिर हक्का-बक्का-सा
तालियाँ बजा- बजाकर आवाज देगा
मिल्टन ,डार्विन ,रिल्के और नीत्शे को

भीड़ ठहाके लगायेगी
भीड़ हँसेगी
भीड़ हँसेगी …तब तक
जब तक कि ….
उसकी हँसी आँसुओ में नहीं बदल जाती…

-मालिनी गौतम

 

परिचय:

मालिनी गौतम

जन्म – 20 फरवरी (झाबुआ, म. प्र.)

शिक्षा – एम.ए., पी-एच. डी. (अंग्रेजी)

कृतियाँ –

1. बूँद-बूँद अहसास (कविता- संग्रह)

2. दर्द का कारवाँ ( ग़ज़ल-संग्रह)

3. गीत अष्टक तृतीय ( साझा गीत संकलन)

अन्य प्रकाशन –

देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित

संप्रति –

एसोसिएट प्रोफेसर (अंग्रेजी), कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय,

संतरामपुर (गुजरात)

संपर्क –

574, मंगल-ज्योत सोसाइटी

संतरामपुर – 389260

जिला- महीसागर

गुजरात

ईमेल – malini.gautam@yahoo.in

प्रस्तुति:- नित्यानंद गायेन

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