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आतंकवाद के खिलाफ होना साम्राज्यवादी बाजारवाद के खिलाफ होना है।

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14 नवम्बर को फ्रांस पर आतंकी हमला हुआ

और यह सवाल जेहन में कौंध गया, कि इस हमले का मकसद क्या है?

  • क्या यूरोप अमेरिका के साथ मिल कर अपने ही द्वारा पैदा किये गये शरणार्थी संकट से भाग रहा है?
  • क्या अमेरिका सीरिया में नये हमले की वजह बना रहा है?
  • क्या फाॅसिस्ट ताकतें नस्लवादी सोच को आक्रामक बनाने में लगी हैं?
  • क्या इस्लामिक स्टेट के आतंकी सीरिया में रूस के हमले और सीरियायी सेना से इस सीमा तक पिट चुके हैं, कि पांव जमाने के लिये उसे नये यूरो-अमेरिकी हमले की जरूरत है?
  • या सारे सवाल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं?

इतना तो तय है, कि जो नजर आ रहा है, सच सिर्फ वह नहीं है। अमेरिका और यूरोपीय देशों की सरकारें जनविरोधी ही नहीं हैं, जरूरत से ज्यादा खुंख्वार हो गयी हैं। अपने आर्थिक एवं राजनीतिक हितों के लिये, अपने ही देश के लोगों को मारने में हिचक नहीं करतीं। यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवादी ताकतों ने ही आतंकवाद को जन्म दिया और आज दुनिया के सामने आतंकवाद का जो संकट है, उसे विस्तार दिया। दुनिया भर में चर्चित ऐसा एक भी आतंकी संगठन नहीं है, जिसे अमेरिका, यूरोपीय देश और उसके मित्र देशों का सहयोग एवं समर्थन न हासिल हो। तालिबान हो, अल-कायदा हो या इस्लामिक स्टेट वो इन्हीं साम्राज्यवादी देशों के हथियारों से लड़ते हैं, इन्हीं से आर्थिक सहयोग पाते हैं, और इन्हीं से आतंकियों को कूटनीतिक समर्थन मिलता है। इनका निर्माण ही साम्राज्यवादी हितों को पूरा करने के लिये हुआ है। इन आतंकियों को प्रशिक्षित करने का काम भी अमेरिकी सेना के अधिकारी, सीआईए और यूरोपीय देशों के सैन्य अधिकारियों ने किया है। आतंकवादियों के खुफिया जानकारी का स्त्रोत भी इन्हीं देशों की सरकारें रही हैं।

जिन आतंकवादियों ने पेरिस पर आत्मघाती हमला किया उन्होंने इराक और सीरिया पर हो रहे हवाई हमलों के खिलाफ इस हमले को जवाबी कार्यवाही बताया। ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ -आईएसआईएस- ने हमले की जिम्मेदारी ली और एक वीडियो जारी किया, जिसका एक ही मकसद है- दहशत। जिसके दायरे में यूरोपीय देशों की सरकारें ही नहीं यूरोप में शरणार्थी के तौर पर रह रहे एशियायी मूल के इराकी और सीरियायी भी हैं। जिनके खिलाफ नस्लवादी हमलों के नये दौर की शुरूआत हो जायेगी। जिसका लाभ साम्राज्यावादी अमेरिका और यूरोपीय देश की सरकारों को मिलेगा।

अमेरिका अपनी दोहरी नीति के तहत आतंकी हमलों को जायज करार देगा, और आतंकियों को सहयोग जारी रखेगा, लगे हाथ विश्व समुदाय को अपने पक्ष में खड़ा करना चाहेगा। वहीं यूरोपीय देश न सिर्फ अमेरिका के साथ होंगे, वो शरणार्थियों को अपने देश से निकाल बाहर करने का आधार पा लेंगे। यूरोप की आम जनता दहशत के खिलाफ शरणार्थियों के विरूद्ध सरकारों के साथ होगी। यह मुद्दा ही दब जायेगा कि आतंकवाद अमेरिका और यूरोपीय देशों की कारस्तानी है।

जिस समय शरणार्थियों पर हमले होंगे, उस समय इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया जायेगा कि जिस इराक और सीरिया पर साम्राज्यवादी युद्ध थोपा गया और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिये पेशेवर विद्रोहियों और आतंकियों को पैदा किया गया, उस समय से उस देश की आम जनता ही मारी जा रही है। युद्ध और आतंक से बचने के लिये ही शरणार्थी अपना देश और अपनी जमीन से बे-दखल लोग हैं। जिनके खिलाफ अमेरिका और पश्चिमी देशों की सरकारें हमेशा से बेरहम रही हैं। लाखों शरणार्थी, लाखों-लाख मारे गये एशियायी और अफ्रीकी मूल के लोगों की तकलीफों के सामने यूरोप और अमेरिका पर हुए आतंकी हमलों का दर्द कुछ भी नहीं है। जिसमें खुद उनका ही हाथ है।

आज जो इस्लामी जुनून और इस्लामी आतंकवाद नजर आ रह है, और बड़े ही सुनियोजित ढंग से जिसे विश्व का सबसे बड़ा संकट प्रमाणित किया जा रहा है, वह दूसरे दिन ही ढह जाये यदि तीसरी दुनिया के देशों के लिये तय की गये अमेरिकी नीतियां और यूरोपीय संघ के सहयोग और उनके सहयोगी देश वास्तव में आतंकवादियों का आर्थिक, कूटनीतिक और हथियारों से समर्थन करना बंद कर दें। लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि ऐसा करते ही विश्व पर अमेरिकी वर्चस्व का अंत हो जायेगा और युद्ध और आतंक की जुगलबंदी भी खत्म हो जायेगी।

जिन मुद्दों से जनविरोधी सरकारें अपने देश और दुनिया की आम जनत को बरगलाती रही हैं, उनमें से आधे से अधिक मुद्दों का ही अंत हो जायेगा। नवउदारवाद के तहत वैश्विक वित्तीय ताकतों के लिये बनायी गयी जगह के खिलाफ आम जनता होगी। और ऐसा हुआ तो साम्राज्यवाद ही नहीं तमाम किस्म के जनविरोधी सरकारों का भी अंत हो जायेगा। आतंकवाद तो इन मुद्दों को गलत दिशा देने के लिये रचा गया मुद्दा है।

जी-20 सम्मेलन में (15 नवम्बर) यह बात बिल्कुल साफ नजर आयी कि बराक ओबामा (अमेरिका) ऐंजिला मार्केल (जर्मनी) और डोनाल्ड टस्क (यूरोपीय संघ) इस्लामिक स्टेट के खिलाफ हमलावर होने की बात करते हैं, जबकि व्लादिमीर पुतिन (रूस) और शी-जिन-पिंग (चीन) हर किस्म के आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहमति, सहयोग एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ के समर्थन से कार्यवाही के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं। ब्रिक्स देशो ने भी संयुक्त रूप से यही कहा है।

यह कड़वी सच्चाई है, कि आतंकवाद के खिलाफ होने का मतलब यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद और बाजारवाद के खिलाफ होना है। जिसने आतंकवाद को इस आयाम तक पहुंचा दिया है।

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