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छवि और छद्म मुद्दों का भरम

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भारत की राजनीति छवि और छद्म की राजनीति बन गयी है। विचार और समाज व्यवस्था के मुद्दों को राजनीति से बाहर निकाल दिया गया है। ऐसा जानबूझ कर किया गया है, ताकि बाजारवादी व्यवस्था के विरूद्ध सीधे तौर पर जन असंतोष न पैदा हो। और यदि ऐसा हो तो ‘व्यक्ति‘ को बदल कर सरकार और सरकार को बदल कर बाजारवादी व्यवस्था को बचाया जा सके।

बिहार में महागठबंधन की जीत और भाजपा के पराजय में नरेंद्र मोदी के सर्वमान्य होने की छवि को – जिसका प्रचार बढ़-चढ़ कर किया गया- तोड़ दिया है।

चुनौतियां हैं।

भाजपा कांग्रेस को चुनौती मान कर चल रही थी, लेकिन यह चुनौती उसे नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की ओर से मिली जिसमें कांग्रेस भी शामिल है।

कांग्रेस के अलावा इन दलों का जमीनी दर्जा क्षेत्रीय था। जिसके बारे में भाजपा के नीतिकार यह मान कर चल रहे थे, कि इन्हें साधा जा सकता है। नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय छवि, उन्हें चुटकियों में उड़ा देगी। उसकी नीतियां बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र में अपनी सरकार बनाने की रही है। जिसके माध्यम से वह भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों को हल करने की नीति पर चल रही है और राज्य सभा में अपनी सदस्यता बढ़ा कर जीएसटी जैसे विधेयकों के लिये मजबूत दबाव बना सकती है।

जिसकी जरूरत उसे ‘आर्थिक सुधारों‘ के लिये है। जिसकी वजह से केंद्र में मोदी की सरकार बनी है।

भाजपा नेतृत्व और मोदी सरकार अपनी नीतियों के प्रति आश्वस्त थी। संघ नेतृत्व को भी विश्वास था।

भाजपा और सरकार के लिये- बाजारवाद

संघ और सरसंघ संचालक के लिये- हिंदूवाद।

भाजपा ने मोदी को अपनी सूरत बनाया और मोदी की छवि को लगातार ऊंचाईयां दी, जिसका मकसद राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय ताकतों के विश्वास को बनाये रखना था।

संघ यह मान कर चल रही थी, कि देश के बहुसंख्यक समुदाय का विश्वास उसे हासिल है, बस उसे अपने पक्ष में, अपने सांचे में ढ़ालना है और वह ढ़ल जायेगी।

सच यह है, कि भाजपा, संघ और मोदी सरकार अपने ही द्वारा अपने लिये फैलाये गये झूठ को सच मानने का शिकार हो गयी।

उसने नकारात्मक राजनीति,

नकारात्मक सोच

और नकारात्मक तरीके से अपने को पेश करना शुरू कर दिया।

आर्थिक मुद्दों को बाजारवादी तरीके से इतनी तरजीह दी कि सामाजिक विकास का मुद्दा बकवास बन गया, जहां उसने धर्म, जाति, सम्प्रदाय और राष्ट्रवाद को फैलाने और लोगों को अलग-अलग खेमों में बांट कर देखना शुरू किया।

आर्थिक हितों के लिये मोदी की राजनीतिक आक्रामकता ने न सिर्फ राजनीतिक दलों को, बल्कि आम लोगों को भी आशंकित कर दिया। क्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया।

श्रम कानूनों में संशोधन,

भूमि अधिग्रहण

और वस्तु एवं सेवा कर जैसे मुद्दों के अलावा -जिसका मकसद राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं काॅरपोरेशनों को लाभ पहुंचाना है- बढ़ती हुई असहिष्णुता के खिलाफ बुद्धिजीवी वर्ग की एकजुटता ने बड़ा काम किया।

जिसके विरूद्ध सरकारी मंत्री से लेकर संघ प्रमुख और अनुपम खेर जैसे लोगों के जरिये ‘सम्मान वापसी के खिलाफ‘ हमला बोल दिया गया। जिसकी वजह से समाज का बुद्धिजीवी वर्ग लामबद्ध हुआ, यह प्रक्रिया आज भी जारी है। भाजपा, संघ और सरकार जिन्हें पराजित वामपंथी समझ रही थी, वो उतने पराजित प्रमाणित नहीं हुए। जिस तरह दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को इस वर्ग का समर्थन मिला, बिहार में नीतीश कुमार के लिये भी समर्थन बना। लालू यादव को भी जगह मिल गयी। जिनका अपना जनाधार प्रमाणित हुआ है। अब इन बुद्धिजीवियों को भाजपा के महान चिंतक सुब्रमणियम स्वामी ‘पैसा लेकर असहिष्णुता का मुद्दा उठाने वाला वर्ग‘ करार दे रहे हैं।

स्वामी जी भाजपा सत्तारूढ़ है, और संघ का विस्तार हो रहा है तेजी से, कृपया झुक कर देखिये तो सही किस गटर या नाली का पानी वहां आ रहा है? एक चुनाव में करोड़ों-करोड़ रूपये जो बह रहा है, उसका स्त्रोत क्या है? और उसके एवज में आपकी सरकार किसे क्या दे रही है? जहां से यह गंदा पानी  आ रहा है, वो भाजपा या मोदी को कमजोर बनाना नहीं चाहते। ऐसा बबुआ उन्हें कांग्रेस में भी नहीं मिलेगा जो मोदी की तरह झुका और बिछा हो और दुनिया के तमाम लुटेरों को लूट की दावत देता फिरे। ब-हरहाल, अपनी महानता की सोच अपने तरकस में ही रखें।

भाजपा के उन तमाम बुजुर्गों की हालत बिगाड़ी जा रही है, जिन्होंने मोदी और शाह को पराजय की जिम्मेदारी लेने की सलाह दी। उन्हें पता नहीं कि भाजपा एक-दूसरे के पीछे खड़े चाटुकारों की ऐसी कतार है, जिनकी गर्दन आगे निकलने के लिये लम्बी हाती है, उन्होंने सिर उठा कर जीना बंद कर दिया है। अड़वाणी, जशवंत, मुरलीमनोहर और शांता कुमार को भी डरना चाहिये, मान लेना चाहिये कि भाजपा वित्तीय ताकतों का राजनीतिक फ्रंट है, इसके अलावा और कुछ नहीं। भाजपा में अब कोई ऐसा नहीं जो उनके पीछे खड़ा नजर आये। यह मोदी की होसियारी नहीं वित्तीय ताकतों के कारीगरी है। जिनके लिये सरकार मुनाफे का जरिया है। वो मोदी और मोदी सरकार को और टूटने या बिखरने नहीं देंगे।

इसके बाद भी सच यह है, कि मोदी जी अब निरापद नहीं, उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भी झटके लगने लगेे हैं। जिस समय वो ब्रिटिश स्टेडियम में अपना शो कर रहे थे 8000 से अधिक भारतीयों ने विरोध प्रदर्शन किया। ब्रिटिश मीडिया की जैसी तवज्जो मिली, वह उनकी सोच से परे थी। भारत के किसी भी प्रधानमंत्री को शायद पहली बार ‘हिंदू तालिबान‘ कहा गया। असहिष्णुता के मुद्दे पर भारत में उनकी जुबान खुली नहीं, ब्रिटेन में भी वो सिर्फ हकला सके।

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