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लघु कथा के नायक

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1

‘‘अंधा अंधा ही होता है, चाहे वह आंख का अंधा हो, या अक्ल का अंधा हो।‘‘

अंधे को देख कर किसी ने मुझसे कहा।

मैं ‘हां‘ में सिर हिलाने को ही था, कि मुझे अक्ल का अंधा न समझा जाये, कि अंधे ने कहा- ‘‘आप गलत हैं। आपने दुनिया अभी देखी नहीं।‘‘

एक अंधे के द्वारा दुनिया न देखने की बात कहना,

अंधे की ओर हमारी नजरें मुड़ गयीं।

वह बोला- ‘‘आंख के अंधे को दिखता नहीं, फिर भी वह महसूस करता है, लेकिन अक्ल का अंधा न देखता है, न महसूस करता है।‘‘

बात ऐसी थी, कि कुछ कहते नहीं बना। इसमें अंधे को सूरदास कहने जैसी लाग-लपेट नहीं थी।

मेरे सामने देश की सरकार खड़ी हो गयी- न गंजा न बालदार। चश्में की डीबिया में कांच के गोली सी चमकती आंखें लिये। वो लोग खड़े हो गये जिनके पास चार-चार आंखें हैं। दो आंखें ऐसी जो है उसे न देखने के लिये और दो आंखें ऐसी, जो नहीं है, उसे दिखाने के लिये।

मैंने अंधे की ओर हाथ बढ़ाया, जिसने काला चश्मा पहन रखा था।

उसने उन हाथों को महसूस किया, और थाम लिया।

इसे आप मेरा अंधा होना भी समझ सकते हैं, और अंधे का आंखवाला होना भी मान सकते हैं

हम अक्ल के अंधों की बस्ती में हैं।

2

सड़कों पर सुनियोजित सी भीड़ थी।

लोग आ रहे थे।

लोग जा रहे थे।

उनके आने और जाने की रफ्तार ऐसी थी, जैसे वो अपने को, अपने आस-पास को जानते-पहचानते हैं, उन्होंने उसे देखा-परखा है। वो जानते हैं, कि दांये बाजू से चलने के बजाये बांये बाजू से चलने में खतरा कम है।

अच्छा लगा यह देख कर, कि लोग कितने समझदार हैं।

मैं उनकी समझदारी का लोहा मानने को ही था, कि अंधे ने अपना काला चश्मा उतार दिया।

उसकी हरकत ऐसी थी, जैसे नजदीक का देखने के लिये दूर दृष्टि वाले लोग चश्मा उतार देते हैं।

उसकी सूरत बदल गयी।

आंखों की जगह दो काली सुरंगों का बंद मुहाना उभर आया। जिसमें न तो झांका जा सकता है, ना ही जिसे पार किया जा सकता है।

उसकी यह हरकत मुझे अच्छी नहीं लगी। ऐसा लगा जैसे सभ्यता के सड़क पर किसी ने थूक दिया हो।

‘‘आपने ऐसा क्यों किया?‘‘ मैंने सवाल किया।

उसने अपनी सूरत मेरी ओर घुमा ली, जैसे अपनी सूरत पहली बार दिखा रहा हो।

‘‘हम अक्ल के अंधों की बस्ती में हैं भाई! यहां लोग वही देखते हैं, जो उन्हें दिखाया जाता है।‘‘

मेरे लिये, यह बात नयी थी।

उसने रूक कर कहा- ‘‘उन्हें देखना नहीं आता। वो जानते ही नहीं कि अंधों को चश्में की जरूरत ही नहीं है।‘‘

‘‘और हम जो देख रहे हैं?‘‘ पूछना पड़ा।

‘‘क्या देख रहे हैं?‘‘ उसने सवाल के साथ कहा- ‘‘वही देख रहे हैं, जो दिखाया जा रहा है। और जो दिखाया जा रहा है, वह हमारा नहीं, उनका सच है, जो ऊंचाईयों पर खड़े हम पर हंस रहे हैं।‘‘

उसकी सूरत पहले से ज्यादा बेजान हो गयी।

मैंने उसकी बांह थाम ली।

3

कुछ वर्दीधारी लोगों ने हमें घेर लिया।

सभी एक से थे।

लोग ऐसे आ और जा रहे थे, जैसे उन्होंने हमें देखा ही नहीं। हम वहां हैं ही नहीं। उस औद्योगिक शहर में हमारा वजूद ही नहीं है। ऊंची इमारत चैड़ी सड़क और बड़े कारखानों की तरह तो क्या सड़क के किनारे खड़े बिजली के खम्भे, भवनों के कोने में बने डस्टबिन और उस मरियल पेड़ की तरह भी हम नहीं है, जिसके पास छांव नहीं।

एक वर्दीधारी ने मुझे डांट लगायी और अंधे को डंपट कर कहा- ‘‘अपना चश्मा पहनो।‘‘

अंधे ने चुपचाप अपना चश्मा पहन लिया।

‘‘यह देख नहीं सकता।‘‘ मैंने उन लोगों से कहा।

‘‘मगर हम देख सकते हैं।‘‘

‘‘जो देख सकते हैं, उनके लिये अंधे का चश्मा?‘‘ यह सोचते नहीं बना। उसकी आवाज में सख्ती थी। नजरों में चेतावनी थी, या डर था? तय नहीं कर सका। ‘‘शायद डर ही था।‘‘ दो लोगों के एकसाथ होने का डर।

उन्होंने हमें हिरासत में ले लिया।

ऐसी जगह बंद कर दिया जहां की हवायें भी सहमी हुई थी।

कुछ बुरा होने का डर लगातार बढ़ रहा था।

ऐसा लग रहा था जैसे काली परछाईयां दीवारों से नीचे उतर रही हैं। वो हमारी ओर रेंग रही हैं।

किसी सख्त जबड़े में फंसे होने का एहसास हो रहा था।

हमें शायद निगला जा चुका था।

हम उस व्यवस्था की पेट में थे, जिसकी ऊंचाईयों पर बैठी एक आदमी की सूरत हंस रही थी। चैड़ा माथा, पकी दाढ़ी, शीशे की डीबिया में कांच के गोली सी चमकती आंखें।

4

मैंने अंधे की ओर देखा।

वह मुझे ही देख रहा था।

‘‘डर लग रहा है?‘‘

उसकी काली सी सूरत सपाट थी। आवाज में कहीं कुछ ऐसा नहीं कि मैं उसके डरे होने का अंदाजा भी लगा सकूं।

वह दीवार पर गड़े कील, जमीन पर उभरे ढूह की तरह था, जिसे दीवार की मजबूती की थाह थी, और जिसकी जड़ें जमीन में धंसी थीं। वह उन लोगों की तरह नजर आ रहा था, जो जानते हैं कि अब क्या होग?

‘‘हां!‘‘ मैंने उससे और खुद से भी कहा।

‘‘डरो नहीं! हम उन अक्लमंदों के बीच हैं, जिनकी चार-चार आंखें हैं।‘‘

‘‘दो जो है, उसे न देखने के लिये, और दो जो नहीं है, उसे दिखाने के लिये।‘‘ मैंने उसकी ही बातों को उससे कहा।

‘‘हां! ये ऐसे ही लोग हैं।‘‘

हम वर्दीधारी लोगों के घेरे में थे। सीसी टीवी कैमरे का फुटेज चलाया गया।

हम बांयी ओर से चल रहे थे, एक-दूसरे की बांह थामे। आते-जाते लोगों को देखते, उन्हें महसूस करते, आपस में बातें करते।

आपस में की गयी हमारी बातें वहां ऐसे गूंजने लगी जैसे हम माइक पर बोल रहे हों। साइरन से चीख रहे हों।

फुटेज में ‘काला चश्मा उतारने और फिर काला चश्मा पहनते‘ अंधा साफ-साफ दिख रहा था।

गलत कुछ भी नहीं था।

न बांयी ओर से चलना,

न लोगों को देखना,

न चश्मा उतारना,

और फिर चश्मा पहनना।

फिर भी हम पर आरोप था। हम आरोपी थे। कानून और व्यवस्था के लिये खतरा थे।

हम दोषी थे कि ‘‘अंधा देखने और दिखाने का सपना देख रहा है, और मैं अंधे के साथ था।

5

गलत कुछ भी नहीं था

फिर भी हम आरोपी बने

आरोप सिद्ध हुआ

हमें देश निकाला मिला।

एक दूसरे से अलग रहने की सजा मिली।

किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा। कहीं कोई खबर नहीं छपी।

अब, अंधा मेरे भीतर रहता है, और अंधे के भीतर में दो आंखें हैं।

किसी ने सवाल नहीं किया कि ऊंचाईयों पर टंगा आदमी बेवकूफों की तरह मुस्कुरा क्यों रहा है?

आपसे एक सवाल- ‘‘आपके पास कितनी आंखें हैं?‘‘

आलोकवर्द्धन

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