Home / विश्व परिदृश्य / यूरोप / यूरोपीय संघ यूरोपीय देशों को लूट रहा है

यूरोपीय संघ यूरोपीय देशों को लूट रहा है

eu-economic-crisis1पिछले महीने आक्सफेम एड एजेन्सी के द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि ”बीमार के इलाज के लिये एक ऐसी दवा की खोज की गयी है, जिसमें मरीज को मार कर बीमारी का इलाज किया जाता है।” यह बात 2008 में लेहमन ब्रदर्स के पतन के बाद यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की नीतियों की तुलना करते हुए कही गयी है। जिसका सीधा और साफ निष्कर्ष निकलता है, कि यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के द्वारा यूरोप की अर्थव्यवस्था को संभालने और मंदी के दौर से निकालने के लिये बनार्इ गयी नीतियां न सिर्फ गलत हैं, बलिक, संकट को बढ़ाने वाली है। इसने उन सिथतियों की रचना कर दी है, जहां सुधार और संभलने की संभावनायें लगातार मर रही हैं। यूरोपीय संघ की पांच में से तीन बड़ी अर्थव्यवस्था दिवालिया होने के कगार पर है और दो की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है।

इसके बाद भी सबसे चौंकाने वाला सच यह सामने आता है, कि लगातार हो रहे जन-प्रदर्शनों के बाद भी, न तो कोर्इ राजनीतिक बदलाव आता है, ना ही सरकारों की वित्तीय नीतियों में परिवर्तन होता है। कटौती और कर वृद्धि की नीतियां बदस्तूर जारी रहती हैं। ऐंजीला मार्केल तीसरी बार जर्मनी की चांसलर चुन ली जाती हैं। जर्मनी यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, और यूरोपी संघ का नेतृत्व भी उसी के हाथ में है।

आक्सफेम ने अपने रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया है, कि कटौती की नीतियों ने पिछले 5 सालों में, किस तरह सम्पतित के पुर्न बंटवारे का काम किया। जहां एक तरफ यूरोप का अभिजात्य वर्ग और वित्त जगत मौजूदा संकट से बेशुमार मुनाफा कमाया है, वहीं दूसरी ओर इस संकट ने करोड़ों लोगों को गरीबी की गर्त में धकेल दिया है। रिपोर्ट में इस बात का अंदाजा लगया गया है कि, लगभग 120 मिलियन से ज्यादा लोग गरीबी की चपेट में हैं और सरकारें यदि अपने कटौती अभियान को जारी रखती है तो 2025 तक और 25 मिलियन लोग इसकी चपेट में आ जायेंगे। रिपोर्ट में यह कहा गया है कि ”आर्थिक असमानता और बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी की वहज से यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में वित्तीय एवं सामाजिक निराशा फैल गयी है। काम करने वाले हर दो में से एक परिवार या तो बेरोजगार है, या काम के घण्टों में कटौती से सीधे तौर पर प्रभावित है।”

”ग्रीस, आयरलैण्ड, इटली, स्पेन, पुर्तगाल और बि्रटेन की सरकारें बड़े ही आक्रामक ढंग से अपने बजट में कटौतियां कर रही है। ये देश जल्द ही दुनिया के सबसे ज्यादा असमानता वाले देशों में शामिल हो जायेंगे।” जहां आर्थिक एवं सामाजिक असमानतायें अपने चरम पर हैं। यूरोपीय संघ के कार्यालय प्रमुख नतालिया अलोंसो ने कहा है कि ”बि्रटेन और स्पेन में अमीर और गरीब के बीच की दूरियां जल्द ही साउथ सूडान या पराग्वे के बराबर पहुंच जायेगा।” जहां अअमेरिकी समर्थक सरकार है।

एक अन्य अध्ययन के अनुसार ”2018 तक वैशिवक वित्त व्यवस्था में दक्षिणी यूरोप की हिस्सेदारी 1980 के 12 प्रतिशत की तुलना में घट कर मात्र 6 प्रतिशत हो जायेगी। इस वित्तीय संकट का सबसे ज्यादा प्रभाव इस क्षेत्र के देशों पर पड़ा है।” जिनके लिये यूरोपीय संघ की नीतियां गलत प्रमाणित हुर्इ हैं। जिनकी सरकारों पर यूरोपीय संघ की नीतियों को मानने का स्थायी दबाव है। जहां की सरकारों के खिलाफ जन-असंतोष बढ़ता जा रहा है।

मुक्त बाजारवाद की सारी विसंगतियां और राजनीतिक विकृतियां यूरोपीय देशों में एक साथ उभर आयी हैं। दो वर्गों के बीच की दूरियां तेजी से बढ़ रही हैं। एक तरफ जहां यूरोपीय बैंकर्स और स्टाक मार्केट का मुनाफा आसमान की ऊंचार्इयां छू रहा है, वहीं दूसरी तरफ कामगर परिवारों के वेतन एवं मजदूरी में कटौती की वजह से उनकी क्रय करने की क्षमता लगातार घटती जा रही है। जिसका सीधा प्रभाव बाजार पर पड़ रहा है। घरेलू उधोग बंद होते जा रहे हैं, और बाहर से आने वाले मालों की खपत घटती जा रही है। यूरोपीय मंदी का प्रभाव निर्यातक देशों की वित्त व्यवस्था पर पड़ने लगा है।

2010 से 2012 के बीच बि्रटेन और पुर्तगाल में मूल वेतन में 3.2 प्रतिशत से ज्यादा की कमी हुर्इ है। बि्रटेन में मूल वेतन को घटा कर 2003 के स्तर पर लाया गया है। इस दौरान इटली, स्पेन और फ्रांस में भी कामगरों के वेतन को घटाया गया है। ग्रीस में यह कमी 10 प्रतिशत से भी ज्यादा है। मूल वेतन में कटौतियों के साथ कामगरों को दी जाने वाली सुविधा और सार्वजनिक कल्याणकारी योजनाओं में भी भारी कटौतियां की गयी हैंं। इन कटौतियों से समाज का बहुसंख्यक वर्ग भयानक वित्तीय संकट से घिर गया है। उस पर राज्य एवं सरकार के अलावा निजी कर्ज का बोझ है। खाध पदार्थ एवं मूलभूत जरूरतों की कीमत में उछाल तथा सरकारी करों की बढ़ोत्तरी को यदि एक साथ जोड़ दिया जाये तो समाज के बहुसंख्यक वर्ग के आय एवं व्यय का अनुपात पूरी तरह बिगड़ गया है। गरीबी दर में तेजी से इजाफा, साथ ही जन्म दर में गिरावट आयी है।

अगस्त के अंत में यूरोपीय संघ के यूरो स्टेट आफिस ने एक रिपोर्ट जारी किया, जिसमें जारी किये गये आंकड़ों से यह प्रमाणित होता है, कि जब से यूरोप में कटौतियों की नीति को लागू किया गया है, तब से पूरे यूरोप के जन्म दर में कमी आयी है। हाल ही में ग्रीस के हेल्थ मिनिस्टर के द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार -2009 से ग्रीस में कर्ज के संकट की शुरूआत हुर्इ है, तब से वहां जन्म दर में 10 प्रतिशत से ज्यादा की कमी आयी है। इस समय वहां 1.3 बच्चे प्रति महिला हैं, जो कि लगातार घट रहा है। जनसंख्या और अर्थव्यवस्था के विकास एवं संतुलन के लिये औसत 2 बच्चों का होना जरूरी है। इस सिथति का घातक प्रभाव सिर्फ आज पर ही नहीं, यूरोप के आने वाले कल पर पड़ना तय है। यूरोपीय समाज और परिवार के बिगड़ते हुए इस असंतुलन ने आत्महत्या, अपराध और हताशा को बढ़ा दिया है। बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी का आलम यह है कि इस साल की एक तिमाही से दूसरी तिमाही के बीच यूरोजोन के सदस्य देशों की बेरोजगारी में एक प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है। यूरोपीय संघ के देशों में यह वृद्धि दर 0.5 प्रतिशत है।

आक्सफेम रिपोर्ट में कहा गया है, कि यूरोपीय संघ के कटौती कार्यक्रम का लक्ष्य वित्तीय संकट झेल रहे देशों के कर्ज को घटाना है, मगर इसका परिणाम घोषित लक्ष्य के विपरीत आया। इन देशों पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता चला गया और उनकी अर्थव्यवस्था विस्फोटक सिथति में पहुंचती गयी। टेक्स रेवेन्यू लगातार घट रही है, जबकि इन्हें यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के द्वारा दिये गये कर्ज पर भारी भरकम ब्याज दर की अदायगी भी करनी है। इन संकटग्रस्त देशों की हालत यह होती जा रही है, बेलआउट पैकेज (कर्ज) की जो दूसरी किश्त मिलती है, उसका बड़ा हिस्सा पहले कर्ज का ब्याज पटाने में ही चला जाता है। मतलब, उनकी अर्थव्यवस्था पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है, और उनके संभलने की संभावनायें मरती जा रही हैं। यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के द्वारा इन देशों की अर्थव्यवस्था पर अधिकार जमाया जा चुका है।

एक अनुमान के अनुसार इस साल के अंत तक ग्रीस का कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद का 180 प्रतिशत हो जायेगा और इटली, पुर्तगाल का लगभग 120 प्रतिशत हो जायेगा।

यह सिथति किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिये सबसे बुरी होती है, कि उसका घरेलू उत्पादन लगातार घटता चला जाये और उस पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता रहे। निर्यात से ज्यादा उसे आयात करना पड़े। आज यूरोपीय संघ के वित्तीय संकट झेल रहे देशों की हालत यही है। यही कारण है, कि इन देशों में अपने देश की सरकारों के खिलाफ ही नहीं यूरोपीय संध और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के खिलाफ भी जनप्रदर्शन हो रहे हैं। जिस जनतंत्र की वकालत यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की सरकारें करती हैं, वो खुद न सिर्फ जनविरोधी हो गयी हैं, बलिक वित्तीय तानाशाही की नर्इ इबारतें लिख रही हैं। जनतंत्र को उन्होंने जनविरोधी बना दिया है। अपने ही देश की आम जनता के खिलाफ कारपोरेट जगत और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों का साथ देती है।

यह सिथति वास्तव में भयानक है कि जिस समय यूरोप की आम जनता सरकारों की मुक्त बाजारवादी नीतियों के खिलाफ सड़कों पर है, यूरोपीय संघ बैंकों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के मुनाफे को बढ़ाने की जुगाड़ में लगी है।

12 सितम्बर को आक्सफेम के द्वारा रिपोर्ट जारी किया गया, और 13 सितम्बर को यूरोपीय देशों के वित्त मंत्रियों की दो दिवसीय बैठक हुर्इ, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और बैंक इकार्इयों के मुनाफा को बढ़ाने के नये उपायों पर चर्चायें की गयीं। इन विदेश मंत्रियों के लिये बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी और समाज के कामगर तथा सबसे बड़े वर्ग की बढ़ती हुर्इ गरीबी और गिरता जीवन स्तर कोर्इ मुददा नहीं था। यूरोप में एक ऐसी जनविरोधी व्यवस्था विकसित हो गयी है, जिसमें जन समस्याओं का कोर्इ समाधान नहीं है। वहां की सरकारों को वित्तीय शकितयां चला रही है। जिनका लक्ष्य मुनाफा है। तीसरी दुनिया के देशों को लूटने वाली वित्तीय शकितयां अब खुद को भी लूटने लगी हैं।

यूरोपीय संघ, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक -ट्रोइका- कर्ज के बदले सिर्फ व्याज और मुनाफा नहीं कमा रही हैं, बलिक उन देशों की वित्त व्यवस्था और सरकारों पर निजीकरण के माध्यम से अपने अधिपत्य को भी कायम करती जा रही है। 18 महीने पहले ही ग्रीस को दूसरा कर्ज देने से पहले जिन शर्तों को तय माना गया है, उसके तहत इस साल के अंत तक 9.2 बिलियन यूरो के राज्य की सम्पतित का निजीकरण ग्रीस की सरकार को करना होगा। और 2015 के अंत तक 19 बिलियन यूरो के सरकारी सम्पतित के निजीकरण का अनुमान है। जुलार्इ में जारी एक नये अनुमान के अनुसार -इस साल के अंत तक 3.2 बिलियन यूरो और 2015 के अंत तक 8.7 बिलियन यूरो के राज्य सम्पतित का निजीकरण होना है।

इस तरह लगभग 80,000 सरकारी भवन, पर्यटन स्थल और सरकारी जमीन को बेचा जायेगा। ”यूरोपीय स्टेबिलिटी मैकनिज्म की रिपोर्ट ने अनुमान लगाया है, कि इस तरह के राज्य सम्पतित की वास्तविक कीमत लगभग 20 बिलियन यूरो से ज्यादा होगी।” मतलब कर्ज दे कर राज्य को दिवालिया होने से बचाने के नाम पर लूट की यह योजना अदभूत है। वास्तव में ‘ट्रोइका’ वित्तीय संकट झेल रहे देशों को ऐसे मुकाम तक पहुंचा दिया है, जहां उनका दिवालिया होना कर्ज लेने से अच्छा है।

‘ग्रीक रिपोर्टर वेबसार्इट’ ने 3 सितम्बर को इस बात की जानकारी दी कि ‘ट्रोइका’ तीन राज्यकृत कम्पनियों -एल ए आर के ओ- स्टेट मार्इनिंग कम्पनी -र्इ एल बी ओ- बस और मिलिट्री वीहिकल प्रोडयूसर और इ0ए0सी0 -ग्रीक डिफेन्स सिस्टम प्रोडयूसर में सुधार के लिये सरकार के द्वारा उठाये गये किसी भी कदम को स्वीकार नहीं करेगा।’ इस आलेख के अनुसार 2 सितम्बर को ‘ट्रोइका’ ने ग्रीस की सरकार को एक र्इ-मेल भेजा है, जिसमें उधोगों के तरली करण (निजीकरण) पर जोर दिया गया है, और वहां के कामगरों को बिना किसी मुआवजे के काम से निकालने के लिये कहा गया है।

यदि ग्रीस को हम यूरोप के आनेवाले कल के रूप में देखें तो कहा जा सकता है कि यूरोप में जनतंत्र की हत्या तो की जा चुकी है, अब, राज्यों का दम भी घोंटा जा रहा है। यूरोपीय संघ महाद्वीप की एकमात्र सरकार बनने की ओर बढ़ रही है, जिसके साथ निजी कम्पनियां, कारपोरेशन और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां हैं। आम जनता के हाथ से उनकी सरकारें ही नहीं, उनका अपना देश भी निकलता जा रहा है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top