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शिक्षा को बाजार के हवाले करने की साजिश

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बाजार के लिये

भारत के प्राकृतिक संसाधन पर अधिकार जमाने के लिये- भूमि अधिग्रहण कानून

भारत के मानव श्रमशक्ति को सस्ते में बेचने के लिये- श्रम कानूनों में संशोधन

और अब

भारत के बौद्धिक सम्पदा को विश्व व्यापार संगठन के निर्देशानुसार संचालित एवं नियंत्रित करने की नयी पहल

केंद्र के मोदी सरकार की यह बड़ी और जनविरोधी उपलब्धि होगी। जिससे किसान, मजदूर और समाज का मध्यम वर्गी बुद्धिजीवी निश्चित तौर पर प्रभावित होगा। सरकार अपने को सवा सौ करोड़ लोगों का मालिक करार देने में लगी है। वह खुले तौर पर यह प्रमाणित करने पर तुली हई है, कि चुनी हुई सरकर कुछ भी कर सकती है। वह चाहे तो अपने देश और आम लोगों को गिरवी रख सकती है, बेच सकती है।

देश की प्राकृतिक सम्पदा को बाजार को सौंपने और लोगों के बौद्धिक एंव श्रमशक्ति को बाजार में बेचने का आधार एनडीए की मोदी सरकार को यूपीए की मनमोहन सरकार से बना बनाया मिला है। जिस पर नरेंद्र मोदी अपने नाम से इमारतें खड़ी करने की जल्दबाजी दिखा रहे हैं।

अनुमान है, कि भारत सरकार ने 2014 के शिक्षा बजट में 8 प्रतिशत की जो कटौती की है, वह निश्चित रूप से ‘विश्व व्यापार संगठन‘ के आदेशानुसार किया गया है।

अब देश भर के केंद्रिय विश्व विद्यालयों में एम.फिल और पीएचडी करने वाले ऐसे लाखों छात्र, जिन्होंने ‘नेट‘ जैसी परीक्षाओं को पास नहीं किया है, को सरकार की कटौतियों का सामना करना पड़ेगा। एम-फिल करने वाले छात्रों को 5000 और पीएचडी करने वाले छात्रों को 8000 रूपये प्रतिमाह की कटौती का निर्णय सरकार ले चुकी है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले ऐसे ज्यादातर छात्र सरकार के द्वारा दिये जाने वाले वजीफे पर निर्भर करते हैं। ऐसी कटौती का सीधा प्रभाव उन छात्रों पर नकारात्मक रूप से पड़ेगा। उच्च शिक्षा मध्यम वर्ग की पकड़ से बाहर हो जायेगी। उच्च शिक्षा उच्च वर्ग के लिये सुरक्षित की जा रही है।

शिक्षा का श्रेणीबद्ध या वर्गगत विभाजन समाज को स्थायी रूप से बांटने की साजिश है। माना यही जाना चाहिये कि इस मामले में भारत की सरकार -चाहे वह यूपीए की सरकार हो या एनडीए की सरकार हो- उन बाजारवादी नीतियों को लागू करने में लग गयी हैं, जिसका मकसद शिक्षा को बाजारपरक बनाना है, ताकि उसे विश्व बाजार में बेचा जा सके और शिक्षा पर निजी कम्पनियों का अधिकार हो।

भारत सरकार देश के उच्च शिक्षा को विश्व बाजार में बेचने के लिये कदम उठा चुकी है। वह चाहती है, कि शिक्षा को बौद्धिक सम्पदा में बदल कर उसे विश्व बाजार में बेचा जा सके जो ‘जनरल एग्रीमेण्ट आॅफ ट्रेड इन सर्विस‘ से नियंत्रित है और जिसका निर्माण भी उसी ने किया है। यह दुनिया के बौद्धिक सम्पदा को अपने नियंत्रण में लेने की नीति है।

15 से 18 दिसम्बर 2015 को केन्या की राजधानी नरोबी में वल्र्ड ट्रेड आॅर्गनाइजेशन -जनरल एग्रीमेण्ट आॅफ ट्रेड इन सर्विस- का दसवां मंत्री स्तरीय बैठक होना तय है। यह ‘दोहा सम्मेलन‘ की दसवीं बैठक है। 160 देशों के इस काॅरपोरेशन को भारत सरकार, भारत में मुनाफा कमाने के लिये खुली छूट देने के लिये, पूरी तरह तैयार है।

आर्थिक विकास के लिये निजीकरण को राष्ट्रीय नीति बना चुकी देश की मौजूदा मोदी सरकार पर जब बहुराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय काॅरपोरेट घरानों के निवेशकों के हितों को सुरक्षित करने का दबाव आयेगा, तो सरकार स्वाभाविक रूप से आम लोगों के शिक्षा के अधिकार को पूरी तरह से समाप्त कर देगी। इन निवेशकों के मुनाफे को सुनिश्चित करने के लिये सरकार, सार्वजनिक विश्व विद्यालयों (सरकारी) को दिये जाने वाले आर्थिक सहायता एवं सहयोग को बंद कर देगी। जो खुले तौर पर निजी कम्पनियों और शिक्षा काॅरपोरेशन से किये गये वायदों को पूरा करने के लिये आम लोगों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। जिसकी शुरूआत सरकार कर चुकी है।

साल 2015 के शिक्षा बजट में 17 प्रतिशत की कटौती की गयी है। स्कूली शिक्षा के लिये आबंटित किये गये धनराशि में 80,000 करोड़ की कटौती की गयी है। 4000 करोड़ की कटौती उच्च शिक्षा में की गयी है।

भारत की यूपीए सरकार ने 2005 में ही वल्र्ड ट्रेड आॅर्गनाइजेशन -जनरल एग्रीमेण्ट आॅफ ट्रेड इन सर्विस‘ के सामने देश की उच्च शिक्षा क्षेत्र को निजी कम्पनियों के लिये खोलने का प्रस्ताव रख चुकी है। जिस पर अंतिम वार्ता दिसम्बर 2015 के दूसरे सप्ताह में ‘दोहा सम्मेलन‘ में होना है। यदि भारत की मोदी सरकार अपने प्रस्ताव पर टिकी रहती है तो भारत में उच्च शिक्षा नीति हमेशा के लिये बदल जायेगी। भारत सरकार का नियंत्रण समाप्त हो जायेगा।

विश्व व्यापार संगठन के नियमों के तहत भारत के शिक्षा नीति को ‘ट्रेड पाॅलिसी रीव्यू मैकनिज्म‘ के द्वारा विश्लेषित किया जायेगा, जिसे यह अधिकार होगा कि वह भारत सरकार की शिक्षा नीति में आवश्यक बदलाव की सलाह दे सकता है।

ऐसे बदलाव का प्रस्ताव एक ऐसी सरकार के सामने यदि रखा जाता है, जिसने निजीकरण को राष्ट्रीय नीति में बदल दिया है, और जो आर्थिक विकास के लिये निजीकरण की नीतियों पर चल रही है और जो देश की प्राकृतिक एवं श्रम तथा बौद्धिक सम्पदा को खुले बाजार में बेचना चाहती है, तो अनुमान लगाया जा सकता है, कि वह क्या करेगी? जिसके प्रधानमंत्री दुनिया भर के निवेशकों को लुभाने के लिये निवेशकों के निर्देशानुसार राष्ट्रीय नीतियों में परिवर्तन कर रहे हैं। देश की चुनी हुई सरकार के प्रधानमंत्री अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड निवेशकों, निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों के सामने पेश करते हैं।

यूपीए सरकार को छात्रों एवं शिक्षकों के संगठनों का विरोध झेलना पड़ा। यह विरोध इनता प्रभावी नहीं रहा कि सरकार अपनी नीतियों को बदलने के लिये विवश हो जाये। शिक्षा को बाजार के हवाले करने की नीतियां आज भी जारी हैं। एनडीए की मोदी सरकार, जो मनमोहन सिंह के उदारीकरण को नया आयाम दे रही है, शिक्षा को बाजार के हवाले करने में पीछे नहीं रहेगी। भारत में शिक्षा को उद्योग में बदलने की वैश्विक साजिशों को वह बढ़-चढ़ कर अंजाम देगी। मोदी सरकार के लिये शिक्षा हिंदू राष्ट्रवाद और निजी कम्पनियों के लिये ऐसा उद्योग है जिससे मुनाफा ही नहीं, अन्य उद्योगों के लिये बौद्धिक उपकरण भी पैदा किया जाता है। वह शिक्षा को बाजार की वस्तु बनाने की पक्षधर है। जो उसकी फाॅसिस्ट सोच और बाजारपरक अर्थव्यवस्था के लिये उपयोगी हो।

1995 में स्थापित ‘विश्व व्यापार संगठन‘ में भारत को मिला कर कुल 161 सदस्य देश हैं। यह संगठन सदस्य देशों के बीच विश्व व्यापार के नियम एवं विधि को तय करती है। व्यापारिक समझौतों को तैयार करने और उन्हें कार्यरूप में बदलने की जिम्मेदारी से संचालित इस इकाई में वैसे तो सभी सदस्य देशों के पास समान अधिकार है, किंतु व्यावहारिक रूप में यह बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों के लिये जिम्मेदार अमीर देशों के हितों के लिये काम करती है। उन ताकतों के लिये काम करती है, जिन्होंने विश्व अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर लिया है। विश्व व्यापार संगठन शिक्षा को भी अपने नियंत्रण में लेना चाहता है। जिसका मकसद शिक्षा के चरित्र और शिक्षा के उद्देश्यों को बदलना है।

यदि भारत इसमें शामिल होता है, तो शिक्षा आम लोगों की पहुंच से बाहर हो जायेगी। यूरोपीय संघ और अफ्रीकी संघ ने शिक्षा को पूरी तरह से व्यापार बनाने को अस्वीकार कर दिया है। भारत में ‘शिक्षा का व्यापार‘ बहुत बड़ा है, जिस पर राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और काॅरपोरेशनों की नजरें हैं। इसलिये इस बात की आशंका है, कि निजीकरण की नीतियों से संचालित मोदी सरकार भारत को इस गठबंधन में शामिल कर सकती है।

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