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आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता का सवाल!

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आतंकवाद के खिलाफ विश्व स्तर पर राजनीतिक सक्रियता बढ़ी है। जी-20 सम्मेलन हो या आसियान देशों का सम्मेलन आार्थिक मुद्दों के अलावा आतंकवाद का मुद्दा अहम् रहा है। आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता और संयुुक्त कार्यवाही पर जोर दिया गया, घोषित तौर पर यह कहा गया कि विश्व आतंकवाद के विरूद्ध है।

पेरिस पर हुए आतंकी हमले ने न सिर्फ यूरोप और अमेरिका को उत्तेजित कर दिया है, बल्कि विश्व स्तर पर यह उत्तेजना फैल गयी है। इसे फैलाया गया है। यह प्रमाणित किया जा रहा है, कि आतंकवाद दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है। आतंकवाद की पैठ बढ़ी है। इस्लामी आतंकवाद का धु्रवीकरण भी हुआ है। पेरिस हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट यदि लेता है, तो माली पर हुए हमले की जिम्मेदारी अल्कायदा ने लिया है। बोको हरम की आतंकी गतिविधियां भी तेज हुई हैं।

अब आतंकवादी संगठन अपने अधिकृत क्षेत्रों में राज्य की सरकारों की तरह काम कर रही है। अवैध ही सही, लेकिन उनके पास सेना और संसाधन है। आतंकवादियों की यह सोच अमेरिकी साम्राज्यवाद, यूरोपीय देश और उनके सहयोगी देशों की देन है। उन्होंने ही लीबिया में कर्नल गद्दाफी के जन समर्थक सरकार का तख्तापलट किया और पेशेवर विद्रोहियों के रूप में संगठित टीएनसी आतंकियों की सरकार का गठन किया। लोकतंत्र के नाम सैन्य सरकार की तरह आतंकियों की सरकार को अपना समर्थन दिया। अमेरिकी नेतृत्व में नाटो देशों की सेनाओं ने आतंकियों को आर्थिक सहायता, कूटनीतिक समर्थन दिया। उन्होंने ही उन्हें सेना के रूप में हथियारबद्ध किया और उन्हें प्रशिक्षित किया। लीबिया जहां आज आतंक के अलावा किसी की सरकार नहीं है।

सीरिया में लीबिया को दोहराने की कोशिशें आज भी हो रही है, और वहां के आतंकी गुटों का अमेरिका आज भी मददगार है और वहां की चुनी हुई बशर-अल्-असद सरकार का तख्तापलट करने की कोशिशों के तहत ही अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ सीरिया पर हवाई हमले कर रहा है।

इराक में उसने ही आतंकवाद को बढ़ाया। सद्दाम हुसैन का तख्तापलट किया गया। ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ -आईएसआईएस- अमेरिकी हितों का ही प्रतिनिधित्व कर रहा है, जिसके खिलाफ अमेरिका इराक के बाद अब सीरिया पर हवाई हमले कर रहा है। अब तक के उसके हवाई हमलों का हासिल यही है, कि इस्लामिक स्टेट का विस्तार होता रहा। वह इराक में ईरान की सीमा तक पहुंच गया और सीरिया में इस्त्राइल और तुर्की की सीमा तक फैल गया। जहां से सीरिया में आतंकियों की घुसपैठ बड़े पैमाने पर कराई जाती रही है।

सीरिया के संकट और इस्लामिक स्टेट के उदय के पीछे अमेरिका, पश्चिमी ताकतें और उनके सहयोगी देश हैं। सीरिया में रूस के सैन्य हंस्तक्षेप ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के सामने, उनके हितों के लिये संकट पैदा कर दिया है। सीरिया की सेना के साथ मिल कर जारी उसकी कार्यवाहियों ने सीरिया से आतंकवाद के तम्बू-कनातों को उखाड़ना शुरू कर दिया है।

रूस और चीन आतंकवाद के खिलाफ विश्व समुदाय और संयुक्त राष्ट्रसंघ की सक्रियता के पक्ष में है। उन्होंने हर किस्म के आतंकवाद के खिलाफ मुहीम की पक्षधरता व्यक्त की है। जबकि अमेरिका के लिये आतंकवाद के खिलाफ कार्यवाही का मतलब ‘इस्लामिक स्टेट‘ के खिलाफ संयुक्त सैन्य अभियान है। बराक ओबामा इसे आईएस के दायरे में रखना चाहते हैं। उन्होंने कुआलालंपुर में 22 नवम्बर को कहा- ‘‘हम आईएस को खत्म कर देंगे। उनके कब्जे वाले इलाकों को मुक्त करेंगे। उनके नेताओं को मार देंगे। उनके नेटवर्क और आपूर्ति लाइन को नष्ट कर देंगे।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘यह लड़ाई वास्तविक है।‘‘

‘‘तो क्या इराक और सीरिया में आईएस के खिलाफ अमेरिकी कार्यवाही अब तक छद्म थी?‘‘ मानी हुई बात है, कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी सेना अब तक नकली लड़ाई ही लड़ती रही है। आज इस्लामिक स्टेट के द्वारा किये जा रहे हमलों में अमेरिकी एवं पश्चिमी देशों के हथियार ही काम आ रहे हैं, उन्हीं के प्रशिक्षणों को पेरिस में भी आजमाया गया। अमेरिकी सेना ने इराक में और सीरिया में ‘गलत ठिकानों‘ पर हथियारों को गिराया। आईएस के जिन ठिकानों को नष्ट किया वहां आतंकी नहीं थे। अमेरिकी हमलों का भरपूर लाभ उन्हें मिला। आज भी अमेरिका ‘माॅड्रेड मिलिटेन्स‘ का सहयोगी है।

अब इस्लामिक स्टेट के खिलाफ उसकी कार्यवाही में बेचैनी क्यों है?

सीरिया में अमेरिकी हितों के सामने रूस का खतरा पैदा हो गया है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन सीरिया की बशर-अल्-असद सरकार के पक्ष में हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता को इस्लामिक स्टेट के खिलाफ सैन्य कार्यवाही तक सीमित कर, उसे इराक और सीरिया के संकट तक सीमित रखना चाहते हैं। अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ अभियान की कमान अपने हाथों में चाहता है, ताकि इराक पर पकड़ और सीरिया में राष्ट्रपति असद को सत्ता से बेदखल करने वाले आतंकियों एवं पेशेवर विद्रोहियों को सुरक्षित रख सके जिसमें अल् कायदा से जुड़े अल् नुसरा फ्रंट जैसे आतंकी संगठन भी हैं। वह इस्लामिक स्टेट का सफाया अल् कायदा की तरह ही चाहता है। सीरिया में उसका मकसद आईएस का सफाया नहीं, बल्कि राष्ट्रपति बशर-अल्-असद को सत्ता से बेदखल करना है। इस मामले में नाटो देश अमेरिका के पक्ष में हैं, जिन्हें रूस का हंस्तक्षेप पसंद नहीं।

इसलिये, आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता गंभीर सवाल है। अमेरिका और नाटो देशों के लक्ष्य में ही चोरी है। आशंका इस बात की है, कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध एक बड़े युद्ध को जन्म दे सकता है। जिसकी पृष्ठभूमि सीरिया-तुर्की की सीमा में रूसी लड़ाकू विमान को, तुर्की के मार गिराने से बन चुकी है।

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