Home / विश्व परिदृश्य / सीरिया के संकट का विस्तार

सीरिया के संकट का विस्तार

url

सीरिया में रूस के सैन्य हस्तक्षेप ने न सिर्फ सीरिया बल्कि विश्व परिदृश्य को बदल दिया है। इस संकट के चार साल बाद, इस बात की संभावना नजर आने लगी है, कि इस संकट का समाधान संभव है। कि अमेरिकी मनमानी और नाटो देशों के साथ मिल कर सीरिया को लीबिया बनाने की साजिशों को रोका जा सकता है।

कहा जा सकता है, कि ‘‘बस, अब और नहीं।‘‘

आम जनता के पक्ष में खड़ी सरकारों का तख्तापलट और लोकतंत्र के नाम पर आतंकियों को सत्ता सौंपने का खेल बहुत हुआ।

असद को सद्दाम और गद्दाफी के अंजाम तक पहुंचाने की साजिशें अब और नहीं।

कि किसी भी देश की आम जनता को ही अपने देश की सरकार बनाने का अधिकार है, सरकारों का निर्यात हमें मंजूर नहीं।

‘सीरिया का संकट‘ यूरोपीय देश और अमेरिका सहित कई अरब देशों के द्वारा पैदा किया गया संकट है, जिसे उनके समर्थक पेशेवर विद्रोही और आतंकी गुटों ने अंजाम दिया। उन्होंने ही राजनीतिक अस्थिरता पैदा की, और सीरिया की असद सरकार के खिलाफ विद्रोह खड़ा किया। जिन्हें आज तक जन समर्थन प्राप्त नहीं हुआ। सीरिया की आम जनता और सीरिया की सेना आज भी राष्ट्रपति बशर-अल्-असद के पक्ष में है। और अब रूस के हस्तक्षेप के बाद स्थितियां भी बदलने लगी हैं। कल तक जिन सीरिया विद्रोही और आतंकियों का पलड़ा भारी हो रहा था, आज उनके सामने सीरिया में अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है।

‘इस्लामिक स्टेट‘ और ‘माॅड्रेड मिलिटेन्स‘ के बीच विभाजन की रेखा खींचने की अमेरिकी रणनीति, अब कारगर नहीं रह गयी है। यह प्रचार अब काम नहीं आ रहा है, कि सीरियायी विद्रोही इस्लामिक स्टेट के आतंकियों से लड़ रहे हैं। अच्छे आतंकी और बुरे आतंकी का विभाजन सिर्फ अमेरिकी सरकार और पश्चिमी ताकतों के लिये रह गया है। रूस सीरिया की सेना के साथ मिल कर सीरिया में आतंकवाद को वास्तव में खत्म करने की लड़ाई लड़ रही है।

रूस के लिये सीरिया का संकट सिर्फ सीरिया का संकट नहीं है, बल्कि यह मध्य एशिया और उस पूरे क्षेत्र का संकट है, जहां राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिये, आतंकवाद को नयी जमीनें दी जा रही हैं, उन्हें आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन दिया जा रहा है। जहां खुले तौर पर साम्राज्यवादी ताकतें सहयोग दे रही है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन के लिये यह साम्राज्यवादी हमला है, जिसे आतंकवाद के लिये, आतंकवादियों के खिलाफ सैन्य अभियान बताया जा रहा है।

सीरिया में रूस के सैन्य हस्तक्षेप के बाद से अमेरिका यह आरोप लगाता रहा है, कि ‘‘रूस बशर-अल्-असद विरोधी सीरियायी विद्रोहियों को अपना निशाना बना रहा है।‘‘ इन विद्रोहियों के बारे में अमेरिकी धारणां है, कि वो बशर-अल्-असद की सेना और इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों से सीरिया में लड़ रहे हैं।

पेंटागन के अनुसार- ‘‘अमेरिका सीरियायी विद्रोहियों को सैन्य सहयोग देना जारी रखेगा।‘‘ आॅपरेशन इनहेरेंट रिजाॅल्व के प्रवक्ता स्टीव वारनर ने कहा कि ‘‘सीरिया के उत्तरी क्षेत्र के लिये संयुक्त राज्य ने इस्लामिक स्टेट से लड़ने के लिये 500 मिलियन डालर आबंटित किया है, जिसमें से 300 मिलियन डाॅलर खर्च किया जा चुका है।‘‘ उन्होंने 13 अक्टूबर को बताया कि वह 50 टन हथियार एवं युद्ध सामग्री एयरड्राॅप करेगा।‘‘ यह आपूर्ति हो चुकी है।

रूस के विदेश मंत्री लोवारोव के अनुसार- ‘‘अमेरिका के तथाकथित उदार सीरियायी विपक्ष (विद्रोही) को दिये जाने वाले हथियार और युद्ध सामग्री अंततः आतंकवादियों के हाथों में चला जाता है।‘‘ जिसका उपयोग आतंकवादी सीरिया की सेना से लड़ने और आम सीरियायी लोगों को मारने तथा आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वालों के विरूद्ध करते हैं।

रूस के एनटीवी को दिये अपने इंटरव्यू में सर्गेई लोवारोव ने स्पष्ट रूप से कहा, कि ‘‘ पश्चिमी देश और उसके सहयोगी देशों को -जो कि इस्लामिक स्टेट के खिलाफ गठबंधन में शामिल हैं- यह जरूर तय करना चाहिये कि उनका लक्ष्य इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों को खत्म करना है, या उग्रवादी विपक्ष का उपयोग कर अपने राजनीतिक लक्ष्य को पाना है?‘‘ जिसका मकसद सीरिया में असद सरकार का तख्तापलट करना है। उन्होंने कहा- ‘‘हम नहीं चाहते कि कुछ देश ना सिर्फ आतंकवादियों के साथ सहयोग करें, बल्कि उन पर भरोसा भी करें।‘‘ उन्होंने खुले रूप में फ्रांस का उल्लेख किया, जो अंतर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करने की बातें कर रहे हैं, और सीरियायी लड़ाकों को हथियारबद्ध भी कर रहे हैं।

रूस के विदेश मंत्री ने कहा- ‘‘लीबिया में लीबिया के पूर्व नेता मुअम्मर गद्दाफी विरोधियों को हथियारों की आपूर्ति करना राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद के उस प्रस्ताव का खुला उल्लंघन था, जिसमें लीबिया के किसी भी पक्ष को हथियारों की आपूर्ति प्रतिबंधित है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘वो ही हथियार कुछ दिनों बाद माली में फ्रांस के खिलाफ उपयोग किया गया।‘‘ पेरिस हमले में भी पश्चिमी देशों के हथियार एवं तकनीक का उपयोग किया गया। जिसकी जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली और माली पर भी ऐसे ही आत्मघाती आतंकी हमले अल् कायदा के द्वारा किया गया। सीरिया के जिस अल् नुसरा फ्रंट और फ्री सीरियन आर्मी ने अमेरिका और पश्चिमी देश ‘माॅड्रेड मिलिटेन्स‘ ढूंढ़ रहे हैं, और जिन्हें प्रशिक्षित कर हथियारबद्ध कर रहे हैं, उनके तार इन्हीं आतंकी गुटों से जुड़े हुए हैं, जो सीरिया में सत्ता परिवर्तन चाहते हैं। यही अमेरिका और पश्चिमी देशों सहित उनके सहयोगियों का मकसद है। ऐसे में सीरिया में इन देशों के हवाई हमलों का क्या मकसद हो सकता है? आसानी से समझा जा सकता है।

यह भी समझा जा सकता है, कि आतंकवाद के खिलाफ इन ताकतों की लड़ाई कितनी कारगर हो सकती है?

लोवारोव ने कहा- ‘‘जो अकाट्य तथ्य हमारे सामने हैं, उससे यही प्रमाणित होता है कि सीरिया में अमेरिकी अभियान का कारण असाधारण है। उनके पास इस बात का स्पष्टीकरण नहीं है, कि वो सीरिया में क्या कर रहे हैं? जबकि काफी संख्या में हवाई हमले हो चुके हैं, और उन हमलों का परिणाम ना के बराबर है।‘‘

उन्होंने कहा- ‘‘जहां तक मुझे पता है, कि 25,000 से अधिक हवाई हमलों से सीरिया को छोटे-छोटे टुकड़ों में बदला जा सकता है, मगर इस्लामिक स्टेट के खिलाफ हो रहे इन हमलों से इस्लामिक स्टेट और अल् कायदा से जुड़े अलनुसरा फ्रंट का क्षेत्र विस्तार ही हुआ है। जहां के लोगों को वो ‘खिलाफत‘ (खलीफा के द्वारा संचालित इस्लामिक राज्य) के आधार पर संगठित कर रहे हैं।‘‘

इन ताकतों के द्वारा अमेरिकी सहयोग से यदि सीरिया में तख्तापलट किया जाता है, तो अनुमान लगाया जा सकता है, कि सीरिया में कैसे ‘लोकतंत्र‘ की स्थापना होगी?

सीरिया में जिन ताकतों को अमेरिका और पश्चिमी देश वहां की चुनी हुई सरकार का तख्तापलट का हथियार बना रहे हैं, उसे अस्वीकार्य एवं खतरनाक करार देते हुए लोवारोव ने कहा- ‘‘आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले हमारे सहयोगी (अमेरिका और पश्चिमी देश) हमें इस बात के लिये सहमत करने की कोशिश कर रहे हैं, कि इस्लामिक स्टेट इसलिये पैदा हुआ कि सीरिया का संकट काफी लम्बा खिंच गया और अब इस्लामिक स्टेट सभी को चुम्बक की तरह सभी सुन्नी मुसलमानों को अपनी ओर खींच रहा है, क्योंकि अलावि लोग सुन्नियों के खिलाफ अपनी ताकत का उपयोग कर रहे हैं, और वो सत्ता सौंपने को तैयार नहीं हैं।‘‘

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि रूस के हस्तक्षेप के बाद अब अमेरिका अपनी नीतियों में परिवर्तन कर हथियारों को हवाई मार्ग से गिराने का काम कर रहा है। और हवाई हमले कर रहा है।

जिसकी तुलना अब रूस की सफलता से की जाने लगी है। जिसने थोड़े समय में ही बड़ी सफलतायें हासिल की हैं। सीरिया पर आतंकवाद के खिलाफ अपने अभियान को शुरू करने से पहले ही रूस ने बगदाद में एक ‘इन्फाॅरमेशन सेंटर‘ विकसित किया, ताकि इराक, सीरिया और ईरान के साथ गुप्त सूचनाओं को भी साझा किया जा सके। मास्को ने वाशिंगटन को भी सहयोग का प्रस्ताव दिया है, जिस पर प्रतिक्रिया नहीं मिली। अब स्थिति यह है, कि इराक रूस की ओर झुकता जा रहा है। उसने रूस को इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ाई में अपना सबसे बड़ा साझेदार मानने की पेशकश की है। कई यूरोपीय देशों ने भी सीरिया में रूस के सैन्य अभियान का समर्थन किया है। जिनके सामने एशियायी शरणार्थियों की समस्या है।

21 अक्टूबर को रूस के मंत्रालय ने बताया कि उनकी खुफिया जानकारी के अनुसार इस्लामिक स्टेट के कमाण्डर अल् नुसरा फ्रंट से एक संयुक्त मोर्चा बना कर सीरियायी सेना से लड़ने के लिये वार्ता कर रहे हैं।‘‘ रूसी सुरक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता मेजर जनरल आईगोर कोनाशिनकोव ने बताया कि आईएस विद्रोही अन्य आतंकी गुटों से मिल कर संयुक्त मोर्चा बनाने की जानकारी ‘इंटरसेपटेड कम्यूनिकेशन‘ से मिली है।‘‘

जिसका सीधा सा मतलब है, कि सीरिया में आतंकी गुटों के बीच -खास कर अल् कायदा और इस्लामिक स्टेट के बीच संयुक्त कार्यवाही के लिये एकजुटता बढ़ी है। जो अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि वहां अमेरिकी ‘माॅड्रेड अपोजिशन‘ जैसी कोई चीज नहीं है। जिसका समर्थन एवं सहयोग यूरो-अमरिकी नीति है। बेरूत और पेरिस से लेकर माली तथा दुनिया भर में हो रहे आतंकी हमलों का सच भी यही है।

सीरियायी राष्ट्रपति बशर-अल्-असद की अघोषित मास्को यात्रा के बाद से स्थितियां तेजी से बदली हैं। अमेरिका अपने लिये सीरिया में जगह बनाने और रूस के प्रभाव को घटाने की नीति पर चल रहा है। वह उस विवाद को बढ़ाने में लगा है, जिससे आतंकवाद विरोधी वैश्विक एकजुटता की दिशा बदल जाये। रूस के खिलाफ तुर्की के पक्ष में नाटो देशों को खड़ा करने के पीछे उसकी यही नीति है। बराक ओबामा विवाद को एक बड़े युद्ध में बदलना चाहते हैं। यह रूस के राष्ट्रपति पुतिन की कूटनीतिक सफलता है, कि सीरिया में अपने अभियान को जारी रखते हुए, वो एक बड़े युद्ध को अब तक टालने में सफल रहे हैं। जबकि साम्राज्यवादी ताकतें उकसावे की कोशिशें से बाज नहीं आ रही हैं, तुर्की के द्वारा रूस के लड़ाकू विमान को मार गिराने की ऐसी हरकत की गयी है, जिसका सीरिया के संकट पर निर्णायक प्रभाव का पड़ना तय है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top