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यूथ फॉर राइट टू एम्प्लॉयमेंट

youth-for-right-to-employmentबेरोज़गारी को लगभग प्रकृतिक और स्वाभाविक मान लिया गया है। इसे इस तरह प्रचारित किया जाता है मानो इससे कोई बड़ी दिक़्क़त न हो रही हो। कहने के लिए कह दिया जाता है कि बेरोज़गारी भारत की समस्या है। पर है तो क्या किया जा सकता है। यह दुहरा कर हम मुक्त हो जाते हैं। सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि यह क्यों है, क्यों अबतक समाज ने इससे लड़ने के लिए राजनीति पर कोई दबाव नहीं बनाया, क्यों अबतक सरकारों ने कोई प्रभावी क़दम नहीं उठाया? आत्महत्या दर इस देश में दुनिया में सबसे ऊपर है और आत्महत्या करने वाले सबसे ज़्यादा युवा हैं! पर कभी यह सवाल नहीं पूछा गया कि आख़िर युवाओं में यह क्यों है? क्यों इतनी बड़ी संख्या में युवा अपनी जिंदगी हार जाते हैं? सारे रिपोर्ट बताते हैं कि यह बेरोज़गारी के कारण है पर मीडिया और पुलिस प्रेमप्रपंच दर्ज़ करती है! युवाओं पर रोज़गार और जीवन की सुरक्षा का दबाव इतना ज़्यादा होता है कि उनके सारे संबंध उस असुरक्षा से दूषित हो जाते हैं। बेरोज़गारी सामाजिक समस्या होने के साथ व्यक्तिगत समस्या भी है। यह व्यक्ति को तोड़ देती है, उसे एकदम आत्महीन बना देती है और वह जीवन से हारता चला जाता है।

अमानवीयता की हद यह है कि सरकार के पास ठीक-ठीक आँकड़े तक नहीं हैं! सरकार और राजनीतिक दल कितने गैर जिम्मेदार हैं, इस बात का अंदाजा इससे लगा सकते हैं, कि हमारे देश में रोज़गारसुदा और बेरोज़गारों का ठीक-ठीक डेटा तक उपलब्ध नहीं है! नीतियाँ बनाने और उसपर सोचना तो बहुत दूर है। 2008 से पहले बेरोज़गारी दर जैसी चीज़ थी ही नहीं और आज भी जो है वह सेंपल से तैयार किया जाता है। वह किसी जिले से सौ-पचास लोगों से पूछ कर तैयार किया जाता है। यह कितना बड़ा झूठ होता है, इसे बताने की ज़रूरत नहीं है।

12308263_907080666042097_4059176316721542014_nआप एकबार सोचिए कि हर जिले में रोज़गार कार्यालय है और उसमें क्या काम होता है? उसका कोई उपयोग नहीं है। हर नागरिक के पास वोटर आईडी है, उसका नंबर है। एक ऑनलाइन व्यवस्था कर देने में कितना खर्च आएगा? कोई व्यक्ति जब किसी काम पर लगे, चाहे किसी दुकान पर गेट कीपर ही बने तो ऑनलाइन डेटा`बेस में उसका नंबर जुड़ जाए और जब उसका काम छूट जाए तो इसे भी फीड करना जरूरी हो। इससे हर दिन कितने लोग बेरोजगार हुए और कितने लोगों को किस क्षेत्र में रोज़गार मिला पता- चलता रहेगा। दुनिया के तमाम देशों में यही सिस्टम है। वहाँ हर दिन रोज़गार और बेरोज़गारों की संख्या का पता चलता रहता है। पर इससे सरकार पर दबाव पड़ेगा, लोगों के सामने वास्तविकता खुल जाएगी।

हमारा देश कारपोरेट और कंपनियों को इतने हज़ार करोड़ रुपए बिना ब्याज़ के देता है, इतनी सुविधाएँ देता है! उनपर क़ानून बनाया जा सकता है कि हर वर्ष वे कितना रोज़गार सृजित करेंगे। इस तरह इसका भी निश्चित डेटा रखा जा सकेगा। यह क्यों नहीं किया गया क्या इस देश को चलाने वालों के पास कोई जवाब है या इसे आपराधिक गैर ज़िम्मेदारी मानी जानी चाहिए।

राजनीतिक दल घोषणा करते हैं कि वे बेरोज़गारी दूर करेंगे और जनता मान लेती है। हम कभी पूछते हैं कि कितने लोगों को रोज़गार मिला और वह आँकड़ा कहाँ है? इतने पद रिक्त हैं, क्या हम सरकारों पर दबाव बना सकते हैं? नहीं बना सकते, इसका हमारे पास अधिकार नहीं है। अगर यह अधिकार हमारे पास हो तो हम जवाब माँग सकते हैं। हमें यही अधिकार चाहिए। बिना इसके हम ऐसे ही मुलायम चारा हैं। जिसे हर कोई चर जाता है। हम मज़बूत हों और अपना अधिकार माँगें। ये युवा यही अधिकार माँग रहे हैं। ‘यूथ फॉर राइट टू एम्प्लॉयमेंट’ के नाम से इकट्ठा होकर लोग जो माँग उठा रहे हैं, यह नई नहीं है। इसे तीन बार- 1989, 1990 और 1996 में संसद में रखा गया है। पर पास नहीं होने दिया गया। संविधान की उद्देशिका, अनुच्छेद-21 , 39 और अनुच्छेद-41 में इसका प्रावधान है पर इसे और स्पष्ट करने और मज़बूत बनाने की ज़रूरत है। अनुच्छेद 21 की व्याख्या करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार सरकार को निर्देश दिया है कि नागरिक को रोज़गार प्रदान करना राज्य की ज़िम्मेदारी है। पर सरकारों ने इसकी उपेक्षा की। अब हमें यह माँग उठानी चाहिए। यह जीने का हक़ है। एक गरिमापूर्ण जीवन का हक़ है।

सरकार से पहली माँग तो यह होनी चाहिए कि एक निष्पक्ष आयोग नियुक्त किया जाए जो केंद्र और राज्य के सारे रिक्त पदों की समीक्षा करे, दूसरे रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाए ।

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