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5 पदो के लिये 26 हजार आवेदन

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बाजारवादी सरकारें अपने देश की आम जनता की जिम्मेदारियों से हाथ खींचती जा रही हैं। उनका यह हाथ खींचना ही, लोकतंत्र और आम जनता की सबसे बड़ी परेशानी है। सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, आवास, रोजी-रोजगार और सामाजिक विकास की राहें अवरूद्ध हो गयी हैं।

देश में बेरोजगारी किस कदर पांव पसार रही है, इसका ताजा उदाहरण इसी बात से मिलता है कि राजस्थान में चपरासी के पाँच पदों के लिए 26 हजार आवेदन आए है। और सरकारों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कहा जा रहा है कि इन आवेदनों में 90 फीसदी आवेदन ऐसी महिलाओं के हैं, जो कि ग्रेजुएट हैं! चपरासी की इस नौकरी के लिए 10 हजार महिलाओं ने अप्लाई किया है। इसके अलावा 60 प्रतिशत आवेदक बीएड, बीएसटीसी और एमएड हैं!

सरकार स्किल डेवेलपमेंट की बात करती है, जो लोग पहले से ही स्किल्ड हैं उनका क्या? इस चपरासी पद के लिए सिर्फ आठवीं पास होना जरूरी है। पुरुष केंडिडेट भी 70 प्रतिशत तक ग्रेजुएट या बीएड हैं। इससे पहले भी इसी साल के सितंबर महीने में लखनऊ में चपरासी के 368 पदों के लिए 23 लाख आवेदन आए थे। जिसमें ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट व पीएच॰ डी॰ होल्डर तक थे। बार-बार हो रही इस तरह की घटनाएँ सरकार को यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि केवल 65 प्रतिशत आबादी के युवा होने से कुछ नही होगा बल्कि उनके लिए रोजगार पैदा करना एक बड़ी चुनौती है। सरकारों को ऐसे क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए जहाँ से रोजगार पैदा हो सकें। सरकार को निर्माण सेक्टर पर ध्यान देना चाहिए जहाँ से रोजगार की अपरंपार संभावनाएं हैं। पर सरकारें उन्हीं क्षेत्रों पर ध्यान देती हैं जिसमें कारपोरेट का हित है, जहाँ से उनका घर भर सकता है। हमारे समाज में इतनी भयंकर समस्या कोई मुद्दा ही नहीं है। जिसके लिए लोगों को सरकारों पर दबाव बनाना चाहिए, उसपर लोग चुप रहते हैं। लाखों युवा हर वर्ष आत्महत्या करते हैं, यह बात किसी को प्रभावित नहीं करती है !

यह खबर अपने आप में महत्वपूर्ण इसलिये है, कि आज आर्थिक विकास योजनाओं को निजीकरण के जिस पटरी पर डाल दिया गया है, और पूंजी निवेश के लिये जिस तेजी से राहें आसान की जा रही हैं, उसका तर्क ही यही है, कि ‘‘लोगों को काम मिलेगा। रोजी-रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।’’ लोग जम कर कमायेंगे, और जम कर खर्च करेंगे। जबकि पूरी व्यवस्था उस ओर बढ़ रही है, जिस ओर सरकारें बिचैलियों की हैसियत रखती हैं, और रोजगार उपलब्ध कराना निजी क्षेत्रों की ऐसी जिम्मेदारी होती है, जिनके घोषणा पत्र में सिर्फ एक वाक्य लिखा है- ‘मुनाफा! अधिकतम मुनाफा!‘

इस देश में काम के अवसर बढ़ाने की बातें तो बढ़-चढ़ कर की जा रही हैं, मगर बढ़ती हुई बेरोजगारी के सही आंकड़े कहीं उपलब्ध नहीं हैं। सरकार यह बताने के लायक भी नहीं है, कि काम के अवसर बढ़ाने की उसकी योजना क्या है? और उन योजनाओं पर उसकी अपनी पकड़ कितनी है?

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