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भारतीय संसद की टपकती छत

Indian-parliament

बेमरम्मत घरों की छतें टपकने लगती हैं।

भारतीय संसद की छत टपक रही है।

यह टपकना कोई नयी बात नहीं है। पहले छत को टपकाने का आरोप भाजपा पर था, अब भाजपा कांग्रेस पर आरोप लगा रही है। तमाम लिक्खाड यही लिख रहे हैं, कि ‘‘विपक्ष -कांग्रेस- संसद को चलने नहीं दे रही है।‘‘ ज्यादातर विश्लेषक भी यही मानते हैं, कि ‘‘संसद को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है, लेकिन सरकार और विपक्ष के बीच सही तालमेल नहीं है।‘‘

सरकार अपने ‘बहुमत‘ के ताव में है, और विपक्ष संसद में अपने होने का महत्व दिखाने में लगी है। सरकार ने ही अध्यादेशों के जरिये खुद को थोपने की पहल की। उसने यह प्रमाणित करने की पहल की कि विपक्ष के सहयोग के बिना भी सरकार अपनी नीतियां लागू कर सकती है। इस नजरिये से देखें तो प्रधानमंत्री मोदी अपनी मनमानी पर उतारू नजर आयेंगे। उन्होंने विवादित मुद्दों पर तब तक विपक्ष से बात करना भी स्वीकार नहीं किया, जब तक पानी सिर के ऊपर नहीं चला गया। राजनाथ और अरूण जेटली ही उनकी तरफ से बोलते रहे।

हंसने और खांसने पर ‘ट्वीट‘ करने वाले नरेंद्र मोदी ने तमाम लम्बित मुद्दों की घोर उपेक्षा दिखाई और यह प्रमाणित किया कि लोग इस लायक नहीं हैं, कि बात की जाये। असहिष्णुता को उन्होंने मुद्दा ही नहीं माना।

और जब यह बात उनकी समझ में आयी कि ‘राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने का यह तरीका नहीं चलेगा‘ तो उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की। वस्तु एवं सेवा कर के मामले में आम सहमति बनाने की बातें की।

भूमि अधिग्रहण,

श्रम कानूनों में संशोधन

और वस्तु एवं सेवा कर सहित

पूंजी निवेश -देशी एवं विदशी पूंजी निवेश- जैसे मुद्दे, जिन्हें नरेंद्र मोदी ‘मेक इन इण्डिया‘ के जरिये ‘अपना‘ करार दे रहे हैं, और मानते हैं, कि ‘‘इससे देश का आर्थिक विकास होगा, वह आर्थिक महाशक्ति बन जायेगा‘‘, वास्तव में मनमोहन सिंह के उदारीकरण की ही दिशा है। इसलिये इन मुद्दों पर आम सहमति कायम करना, कूटनीतिक रूप से काम करने वाले किसी भी प्रधानमंत्री और सरकार के लिये उतना कठिन नहीं था, जितना कठिन मोदी सरकार ने अपने लिये बना दिया।

सच यह है, कि सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष में बैठी कांग्रेस की मूलभूत नीतियों में कोई अंतर नहीं है। जिस वर्ग के हित में कांग्रेस काम कर रही थी, भाजपा उसी वर्ग के लिये, उससे बढ़-चढ़ कर काम कर रही है। मनमोहन सिंह के उदारीकरण में सार्वजनिक क्षेत्रों को धीरे-धीरे मारने की साजिशें थीं, मगर मोदी में वह धैर्य नहीं है, क्योंकि राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत की अर्थव्यवस्था पर वर्चस्व बनाने की जल्दबाजी है। इस देश में सरकार का अपहरण भी इसी वजह से हुआ है। मनमोहन सिंह के जाने और नरेंद्र मोदी के आने की वजह भी यही है।

एक बात यहां पर बिल्कुल साफ तौर पर कहने और समझने की जरूरत है, कि बाजारवादी ताकतों केे लिये सरकारें उनके आर्थिक हितों को साधने का जरिया है। कल तक सरकारों के सहयोग से राष्ट्रीय एवं वैश्विक वित्तीय ताकतों ने विकास किया, आज इन ताकतों के सहयोग से सरकारें चल रही हैं। इस ‘विकास‘ और इस ‘सहयोग‘ ने राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है। लोकतंत्र और उसकी वैधानिक इकाई को जन विरोधी बना दिया है। अब ज्यादातर देशों की सरकारों पर इन ताकतों का आधिपत्य हो गया है। जिसे बदलने का ‘वैधानिक विकल्प‘ आम जनता के पास नहीं है। संसद और संसद के बाहर राजनीतिक रूप से आज जो भी हो रहा है, वह नूरा कुश्ती है।

आईये, एक सवाल हम खुद से करें,

क्या देश के संसद में जारी गतिरोध से बाजार परक अर्थव्यवस्था के निर्माण में कोई बाधा पड़ी?

मीडिया और सरकार समर्थक लोग यही कहते हैं। वो लिक्खाड़ भी यही लिख रहे हैं, कि ‘‘आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ गयी है‘‘ मगर भ्रष्टाचार के तमाम आरोपो-प्रत्यारोपों और संसद में जारी गतिरोध के बाद भी, मनमोहन सरकार जिस तरह से अर्थव्यवस्था के उदारीकरण को लागू करती रही, मोदी सरकार भी राहें निकाल कर उसे लागू करती जा रही है। मतलब, संसद का चलना या न चलना, अब तक किसी भी राजनीतिक संकट का कारण नहीं बना है। जबकि, लोकतंत्र के लिये यह राजनीतिक संकट है, और होना चाहिये।

जिन मुद्दों को लेकर संसद में हंगामा खड़ा होता है, वो मुद्दे या तो किसी राजनीतिक दल के आर्थिक एवं वैधानिक भ्रष्टाचार के मुद्दे होते हैं, या आम जनता के हितों से जुड़े ऐसे मुद्दे होते हैं, जिन्हें कभी पूरा नहीं होना है। मोदी सरकार ऐसे हर मुद्दे को आर्थिक विकास की राह में बाधा के रूप में पेश करती है। संसद में आम लोगों के हितों से जुड़े मुद्दों पर बहस ही नहीं होती। हां, आम जनता के हितों की बातें उछलती रहती हैं। संविधान एवं संविधान निर्माताओं की जय-जयकार करने वालों के लिये यह मुद्दा ही नहीं है, कि संविधान में ‘लोक कल्याणकारी राज्य‘ का आदर्श है और उसके निर्माता एक ऐसी सरकार की अपेक्षा रखते हैं, जो इस घोषित आदर्शों के तहत काम करे।

जहां तक हमारी समझ है, बाजारवादी अर्थव्यवस्था और उसकी राजनीतिक बुनावट में ‘लोक कल्याण‘ कहीं नहीं है। सरकारें जन विरोधी हैं। संसद को एक छलावा में बदल दिया गया है।

भारतीय लोकतंत्र बे-मरम्मत ऐसे मकान में बदल गयी है, जिसके संसद की टपकती हुई छत तो दिख रही है, मगर जो नहीं दिख रहा है, वह यह है, कि उसकी बुनियाद हिल गयी है।

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