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गैर बाजारवादी यहां कोई नहीं

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देश को एक खास दिशा की ओर धकेला जा रहा है।

राष्ट्रीय स्वयं सवेक संघ

भारतीय जनता पार्टी

और देश की केंद्र सरकार, और उनके सहयोगी संगठन बड़े ही तरीके से मिल जुल कर, हिंदुत्व वादी मुद्दे को हवा दे कर, इस मुकाम पर ला चुके हैं, कि असहिष्णुता और असुरक्षा की भावना अब प्रतिक्रिया में बदल गयी है। और यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से हिंदूवाद के विरूद्ध गैर हिन्दूत्व के रूप में उग्र होती जा रही है। संघ और सरकार यही चाहती है।

बढ़ती हुई असहिष्णुता के जिस मुद्दे को समाज के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी वर्ग ने उठाया था, अब उसका राजनीतिकरण हो गया है। बुद्धिजीवियों का अता-पता नहीं। वो इतने असंगठित हैं, कि मुद्दे को अब थाम नहीं सकते। उनकी सामाजिक सम्बद्धता का स्वरूप गैर राजनीतिक है। न जाने क्यों उन्होंने मान लिया कि उछाले गये मुद्दों को सही जगह मिल जायेगी। जबकि उन्होंने देखा है, कि मौजूदा दौर में विरोध और प्रतिरोध का भी अपहरण हो जाता है।

यहां भी मुद्दों का अपहरण हो गया है।

बढ़ती हुई असहिष्णुता मुद्दा है, लेकिन इस मुद्दे पर उन लोगों ने अपनी पकड़ बना ली है, जो कहते हैं, कि ‘‘इससे समाज का अल्पसंख्यक समुदाय प्रभावित होता है।‘‘ मतलब खतरा- अल्प संख्यक समुदाय को है। जबकि असहिष्णुता ऐसा सामाजिक मुद्दा है, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय ही नहीं, समाज का बहुसंख्य समुदाय भी प्रभावित होता है। और उसे प्रभावित करने की, उसे अपने पक्ष में लेने की नीति संघ, भाजपा, सरकार और उसके समर्थकों की है। बहुसंख्यक समुदाय यदि वास्तव में समाज के अल्पसंख्यक समुदाय के विरूद्ध लामबद्ध हो जायेगा तो अल्पसंख्य समुदाय की मुश्किलें ला-इलाज हो जायेंगी।

खतरा यहां है।

भाजपा जब जनसंघ थी, तब से वह सत्तारूढ़ राजनीतिक दल कांग्रेस पर यह आरोप लगाती रही है, कि ‘‘कांग्रेस अल्पसंख्यक समुदाय के संतुष्टीकरण की नीति पर चलती है।‘‘ और वह बहुसंख्यक समुदाय -हिंदू- के लिये काम करने वाले राजनीतिक दल का दर्जा हासिल करती रही। भाजपा जनसंघ नहीं है, लेकिन वह जनसंघ से अलग भी नहीं है। जिस तरह जनसंघ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का राजनीतिक मोर्चा था, आज भाजपा उसका राजनीतिक मोर्चा है। अब तो खुलेआम संघ प्रमुख मोहन भागवत, भाजपा को निर्देश देते हैं। और संघ का मुद्दा हिंदुत्व है। हिंदू राष्ट्रवाद है। मोदी और मोदी सरकार के तमाम मंत्री काली टोपी से बाहर नहीं है।

आज दुनिया भर में फाॅसिस्टवाद तेजी से बढ़ रहा है। चारो ओर क्रिया की प्रतिक्रियायें नजर आ रही है।

संयुक्त राज्य अमेरिका 1990 के दशक से ही ‘इस्लाम को खतरा‘ के रूप में तैयार करता रहा है। उसने इस्लामी आतंकवाद को वास्तविक खतरे में बदल दिया। जिसका राजनीतिक लाभ उसने वैश्विक स्तर पर उठाया। आज भी आतंकवाद के खिलाफ युद्ध उसका हंथियार है। और अब आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अमेरिका में मुसलमानों के आने और होने के खिलाफ, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प का बयान है।

यूरोप में शरणार्थी समस्या की वजह से फाॅसिस्टवाद बढ़ रहा है, वहां भी उन देशों के लोग निशाने पर है, जहां यूरोपीय देशों और अमेरिका ने साम्राज्यवादी हमले किये, आतंकवादियों को बढ़ाया और तख्तापलट किये और कई जगह कोशिशें जारी हैं।

इस्लामी देशों में आतंकवाद फाॅसिस्टवाद का चरम रूप है। ‘अलकायदा‘ के बाद ‘इस्लामिक स्टेट‘ का आतंक है। यह आतंक वास्तव में इस्लामिक फाॅसिस्टवाद है और फासिज्म के बाकी रूपों की तरह ही इस्लामिक फासिस्टवाद साम्राज्यवादियों के हितों के लिये काम कर रहा है, जिसका मुखिया अमेरिका है। यूरोपीय और कई अरब देश हैं।

दुनिया भर के आतंकवाद के पीछे साम्राज्यवादी ताकतें हैं। ये ही ताकतें भारत मेें भी फासिस्टवाद को बढ़ा रही है। भारतीय लोकतंत्र के ढांचे में एकाधिकारवाद का निर्माण हो रहा है, ताकि सरकार उनके हितों के लिये काम कर सके।

आज संसद में जो प्रतिरोध देखा जा रहा है, वह वास्तविक नहीं है। वास्तव में वह सामाजिक मुद्दों का राजनीतिकरण और सत्तारूढ़ पक्ष के द्वारा अपने वर्चस्व को बढ़ाने की साजिश है। देश को उस ओर धकेलने की साजिश है, जहां आर्थिक अनिवार्यताओं के लिये निजीकरण और राजनीतिक रूप से एकाधिकारवादी राष्ट्रवाद है।

उग्र राष्ट्रवादी ताकतें ‘अभी नहीं, तो कभी नहीं‘ की नीतियों पर चल रही हैं। यही कारण है कि जिसे देखिये, मौजूदा परिदृश्य में, सभी को जल्दी है।

मोदी सहित मोदी सरकार को उत्पादन के साधन और देश की बाजार व्यवस्था को राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौंपने की जल्दी है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को हिंदू राष्ट्र के निर्माण की जल्दी है।

भारतीय जनता पार्टी को वित्तीय ताकतों को अपने पक्ष में रख कर सत्ता को अपने नाम कराये रखने की जल्दी है।

कांग्रेस को इस बात की जल्दी है कि एक ऐसा विकल्प हो, जो उसके पुर्नवापसी को सुनिश्चित कर सके।

गैर बाजारवादी यहां कोई नहीं है।

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