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यह तमाशा कब तक चलेगा?

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दूसरों के आंख में अंगुली डाल कर दिखाना आसान है, लेकिन भाजपा और मोदी सरकार अपने लिये ऐसा बिल्कुल नहीं करती। उसके लिये ‘घपले-घोटाले‘ और भ्रष्टाचार की नदी सिर्फ कांग्रेस और विपक्षी दलों में ही बहती है। भाजपा और मोदी सरकार में जितने भी गड्ढ़े हैं, वो स्वच्छ पानी के ताल और तलैया हैं। एक बार डुबकी लगाईये, पांच बार नमो जाप कीजिये, आप कीचड़ में कमल हैं।

यह समझने की भूल मत कीजियेगा कि संघ, भाजपा, उनके सहयोगी संगठन और मोदी सरकार की आलोचना करने वाले कांग्रेसी हैं। आम आदमी पार्टी है। या कांख दबाये वामपंथी हैं। नहीं, ये मोदी सरकार विरोधी नहीं, अपने समर्थक हैं।

कांग्रेस आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी रही है।

आम आदमी पार्टी इस व्यवस्था को बचाने केे लिये सेफ्टी वाॅल्ब है।

वामपंथियों के बारे में बस इतना ही कहना है- अपनी औकात घटा कर रखने वाले, वो बेचारे है।

बहरहाल मुद्दा ‘नेशनल हेराॅल्ड‘ के बाद मोदी सरकार के वित्त मंत्री अरूण जेटली पर लगा आरोप है। आरोप में दम है। भले ही कहने वाले कह रहे हैं, कि कीर्ती आजाद का धमाका- फुस्स है। यह तो पहले से उछलता हुआ मामला है। आम आदमी पार्टी के केजरीवाल के सचिव पर पड़े सीबीआई के छापे का पलटवार है।

अरूण जेटली मानहानि के दावों के साथ अब अदालत में होंगे। अदालतें मुद्दों को ठण्डे बस्ते में डालने का जरिया हैं। मोदी जी कितने पाक-साफ हैं? यह गुजरात में है। और अब यह भी सच्चाई है, कि वो देश के प्रधानमंत्री हैं। और 20 महीने के शासन का में काॅरपोरेट के वारे-न्यारे हुए हैं, अदानी की सम्पत्ति में 48 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जो उनके खास हैं। खासमखास है। चलिये हम मान लें कि मनमोहन सिंह की तरह ही अपनी सरकार और आरोपो से घिरे और उन्हें नकारने वालों के वो मुखिया हैं।

मनमोहन सिंह के बारे में हमने कहा था- ‘‘चोरों का मुखिया संत नहीं हो सकता।‘‘ मोदी जी के लिये भी यह कहा जा सकता है।

अरूण जेटली उबले हुए गर्म आलू हैं। छिलके उधड़ रहे हैं। मुद्दा नया नहीं है। भाजपा और सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी नये नहीं हैं- व्यापम से लेकर ललित गेट काण्ड है। सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे, पंकज मुंडे, शिवराज सिंह चैहान, तावडे, रमन सिंह हैं। यह फेहरिश्त इससे बड़ी है। जिसे भी आप खंगालेंगे कचड़ा तो मिलेगा ही। कारोबारी माफिया भाजपा की जान हैं।

सवाल यह है- यह लड़ाई कहां पहुंचेगी?

संसद का दो सत्र आप खा गये।

यह तो तमाशा ही हुआ न, कि संसद की कार्यवाही चलती है, तो जनविरोधी अधिनियमों की बरसात होगी, और संसद की कार्यवाही में गतिरोध होता है, तो लोकतंत्र की खिल्लियां उड़ती हैं। सरकार अपने को बनाने वालों से कहती हैं- ‘‘हम क्या करें, हमें काम करने नहीं दिया जाता।‘‘ वह भूल जाती है, कि उसने भी मनमोहन सरकार को इन्हीं मुद्दों के तहत ऐसे ही तंग किया था। मतलब, लोकतंत्र बेकार है। संसद लाचार है। लाचारी हमारी भी है, कि एक भ्रष्ट सराकर के बाद दूसरी भ्रष्ट सरकार है।

एक जनविरोधी सरकार के बाद, दूसरी जनविरोधी सरकार है।

एक के बाद दूसरा, और दूसरे के बाद फिर पहला। यह तमाशा कब तक चलेगा?

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