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विकास के जरिये समाजवाद और एक कहानी

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वेनेजुएला में ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ की अवधारणा को, 6 दिसम्बर 2015 को, एक गहरा झटका लगा है। नेशनल असेम्बली का चुनाव वहां के समाजवादी हार गये हैं।

वैसे, मुझे नहीं लगता कि जिन दक्षिण पंथी ताकतों को सफलता मिली है, वो आम जनता के साथ जीत की खुशियां लम्बे समय तक मना पायेंगे।

ब-हरहाल, स्थितियां जटिल हैं, और कई सवालों से हम घिरे हैं।

एक छोटी सी कहानी से अपनी बात कहने की जरूरत महसूस हो रही है।

कहानी-

एक ऐसे आदमी से मेरी मुलाकात हुई, जो अपनी सफलता पर रोने की तैयारी कर रहा था।

वह डरा हुआ था।

अपनी सफलता से डरा हुआ था।

वह इस बात से डरा हुआ था, कि यदि शाॅवेज से उसकी मुलाकात हो गयी तो, वह उनसे नजरें कैसे मिलायेगा?

वह इस बात से भी डरा हुआ था, कि यदि सरकार आम लोगों की पकड़ से बाहर निकल गयी, तो उसे फिर से सिर के बल खड़ा कर दिया जायेगा।

उसकी हालत देख कर मैंने पूछा- ‘‘तुमने ऐसी सफलता हासिल ही क्यों की?‘‘

‘‘मैं गुस्से में था।‘‘ उसने कहा।

‘‘किससे…?‘‘

‘‘अपने देश की सरकार से, और शायद अपने आप से।‘‘

मेरे लिये यह जवाब हैरान करने वाला था, कि कोई अपने देश की उस सरकार से कैसे नाराज हो सकता है, जो हर हाल में अपने देश की आम जनता के साथ खड़ी रही है। जिसने जीत की लम्बी लड़ाई लड़ी है।

‘‘क्यों…?‘‘

उससे, कुछ कहते नहीं बना, फिर भी उसने कहा- ‘‘क्योंकि, हमारी मुश्किलें बढ़ रही थीं, और धीरे-धीरे सरकार असफल हो रही थी।‘‘

सरकार के असफल होने की अपनी बात से वह खुद भी सहमत नहीं था, इसलिये नजरें चुराता हुआ बोला- ‘‘सरकार, विरोधियों से लड़ने में ही रह गयी।‘‘

‘‘यह लड़ाई शुरू किसने की थी, सरकार ने?‘‘ मैंने सवाल किया।

‘‘नहीं…!‘‘

‘‘फिर…?‘‘

वह चुप रहा।

मुझे लगा- ‘‘वह रोने की तैयारी कर रहा है।‘‘

वैसे हो यह भी सकता है, कि वह फिर से लडने की तैयारी करे। विकास के जरिये समाजवादी अवधारणा में हम ऐसी ‘संभावनाओं‘ को अस्वीकार नहीं कर सकते। इस बता की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि राष्ट्रपति निकोलस मदुरो को सत्ता से बेदखल करने के लिये नेशनल असेम्बली उनके ‘जनाधार खोने‘ के आरोपों के तहत वैधानिक कार्यवाही की पहल करे। उनके अधिकारों को सीमित करने और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के अपने कार्यक्रमों को जारी रखे। उसकी कोशिश वेनेजुएला में दक्षिण पंथी ताकतों को आपस में जोड़ने की होगी। वह साम्राज्यवादी हंस्तक्षेप को सुनिश्चित करने के लिये राजनीतिक दमन का सहारा ले सकती है।

हमारे खयाल से 6 दिसम्बर 2015 को वेनेजुएला में वैधानिक तख्तापलट की पहली किश्त पूरी हो गयी है। अर्जेन्टीना के बाद लातिनी अमेरिकी देशों में, अमेरिका की यह दूसरी बड़ी सफलता है। यह सफलता उन्हें वहा मिली है, जहां उन्हें नहीं मिलनी चाहिये थी, क्योंकि वैश्विक स्तर पर वेनेजुएला ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ का प्रारूप बन गया है।

यदि वेनेजुएला में वहां के समाजवादी ताकतों को सत्ता से पूरी तरह बेदखल होना पड़ता है, तो वेनेजुएला में ही नहीं, लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों में भी ‘बोलिवर क्रांति‘ को और वैश्विक स्तर पर ‘21वीं सदी के समाजवाद‘ को गहरा झटका लगेगा। नव उदारवादी वैश्वीकरण के विरूद्ध समाजवादी संभावनाओं को भी चोट लगेगी। सोच एवं समाज व्यवस्था के स्तर पर दुनिया को विकल्पहीन बनाने की साजिशें, सोवियत संघ के पतन के बाद से ही सक्रिय हैं। अमेरिकी साम्राज्य पूंजीवादी बाजार व्यवस्था से असहमत अर्थव्यवस्था और पूंजीवादी लोकतंत्र के विपरीत किसी भी राजनीतिक व्यवस्था के विरूद्ध अपने एकाधिकार की लड़ाई लड़ रहा है।

लातिनी अमेरिकी देशों में क्यूब के अलावा, वेनेजुएला, बोलेविया, उरूग्वे, निकारागुआ, पराग्वे और अर्जेन्टीना जैसे समाजवादी एवं गैर-पूंजीवादी देश अमेरिकी साम्राज्यवाद के निशाने पर रहे हैं। पराग्वे में वैधानिक तख्तापलट की पहली कार्यवाही की गयी। अर्जेन्टीना के बाद अब वेनेजुएला में मिली सफलता अमेरिका के लिये इसलिये भी विशेष है, कि वेनेजुएला लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों की एकजुटता का अधार बन गया है। यदि यह आधार टूटता है, तो शेष समाजवादी और गैर-अमेरिकी पूंजीवादी देशों के सामने भी आर्थिक एवम् राजनीतिक संकट होगा। और यह संकट स्वयं साम्राज्यवादी एवं दक्षिणपंथी ताकतों के लिये भी होगा।

समाज व्यवस्था के रूप में समाजवाद की राहें अवरूद्ध हो सकती हैं। लेकिन अवरूद्ध राहों और बढ़ती हई जनसमस्याओं का समाधान पूंजीवादी लोकतंत्र के पास नहीं है, वैश्विक स्तर पर वह स्वयं आर्थिक एवं राजनीतिक संकट झेल रही है। उसका संकटग्रस्त होना, उसकी राजनीतिक उपलब्धियों की राह में बड़ी बाधा होगी। जिससे उबरने के लिये वह उन्हीं फाॅसिस्ट नुस्खों को आजमायेगा, जिसके खिलाफ बोलिवेरियन क्रांति का जन्म हुआ। वेनेजुएला में ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ के सामने सोच की अपनी शराफत और अपनी अवधारणाओं की भी चुनौती है। इस सच को स्वीकार करने की जरूरत है, कि दक्षिणपंथी और साम्राज्यवादी ताकतें समाज के स्वाभाविक विकास के विरूद्ध हैं, जबकि विकास के जरिये समाजवाद सामाजिक विकास की स्वाभाविक दिशा है।

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