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दिल्ली, मास्को, काबुल और लाहौर

Modi-Sharif-PTI

23 दिसम्बर को मास्को

24 दिसम्बर को भी मास्को

25 दिसम्बर को काबुल और 25 दिसम्बर को ही नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री की हैसियत से लाहौर में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के घर पर। पाकिस्तान की उनकी यह यात्रा अप्रत्याशित थी।

नवाज शरीफ ने उनकी अगवानी की और लाहौर हवाई अड्डे तक उन्हें छोड़ने भी आये।

यह बहस चल रही है, कि नरेंद्र मोदी ने ऐसा क्यों किया?

जो भी बातें सामने आ रही हैं, वह खास नहीं।

नवाज शरीफ का जन्मदिन था। बकवास!

नरेंद्र मोदी ‘‘भारत के किसी भी प्रधानमंत्री ने ऐसा पहली बार किया‘‘ का रिकार्ड बनाने वालों की तरह काम कर रहे हैं।

पाकिस्तान की उनकी इस यात्रा के पृष्टभूमि के बारे में तो हम बातें कर सकते हैं, जो इसी महीने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में ‘आपसी मुलाकात‘ और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की पाकिस्तान यात्रा से बनी, लेकिन वो इसकी निर्णायक वजह नहीं हो सकती। यह किसी आपात यात्रा की तरह है।

क्या मास्को में ऐसी कोई बात हुई?

या काबुल में ऐसा कुछ हुआ कि पाकिस्तान जाने की अनिवार्यता बनी?

या महज यह रिकार्ड बनाने और अपने को कुछ ज्यादा ही प्रमाणित करने की भाग-दौड़ है?

मोदी जी रिकार्ड बनाने में तो लगे रहते हैं, लेकिन यह सिर्फ रिकार्ड बनाने वाली हरकत नहीं हो सकती। उनकी जो कार्यशैली बन गयी है, यदि उस पर हम नजरें टिकायें तो लगेगा- ‘‘यह बड़े मुद्दे को छुपाने के लिये, लोगों को चैंकाने और मुद्दों को बरगलाने वाली हरकत है।‘‘ और ऐसा प्रधानमंत्री करते रहे हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के पांव के नीचे की जमीन खिसक रही है, और नरेंद्र मोदी की शाख गिरी है। राजनीतिक संकट है। अरूण जेटली का मुद्दा है।

विदेशी पूंजी निवेश से देश की अर्थव्यवस्था को संभालने की संभावना और ‘मेक इन इण्डिया‘ की बाजारवादी उड़ान को जो पंख नरेंद्र मोदी लगाना चाहते हैं, वह नहीं हुआ है।

पड़ोसी देशों से सम्बंध सुधारने का आधार भी कमजोर है। नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान और चीन के लिये तय की गयी नीतियां या तो आहत हुई है, या रूकी हुई है। अमेरिका समर्थक भारतीय मीडिया चीन को समझने में नाकाम रही है। जबकि चीन वैश्विक स्तर पर निर्णायक भूमिका निभा सकता है, वह किश्तों में सीमा विवाद का समाधान भी चाहता है। ‘‘भारत ब्रिक्स देश है‘ इस बात को मोदी सरकार को समझने की जरूरत है। जिसकी वैश्विक भूमिका बढ़ गयी है। वैश्विक स्तर पर जो काम गुट निर्पेक्ष देशों का संगठन करता था, आज ‘ब्रिक्स देश‘ कर रहे हैं। जिससे अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय देशों को परहेज है।

नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान की बेतुकी यात्रा की और संघ से लेकर भाजपा तक वाहवाही दिखा रहे हैं, बल्कि संघ तो भारत, पाक, बांग्लादेश के एक होने के सपने भी देश रहा है। इस सपने के बारे में उनकी अपनी सोच है- अखण्ड आर्यव्रत। राजनाथ सिंह इसे इनोवेटिव डिप्लोमेसी कह रहे हैं, तो अडवाणी के लिये यह ‘क्लाइमेट चेंज‘ है।

न्यूयार्क टाइम्स के लिये यह ‘डिप्लोमेटिक डांस‘ है। जिसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। यदि कोई नाचेगा तो लोग देखेंगे ही।

वैसे मोदी के इस ‘अचानक डांस‘ के पीछे वह नहीं है, जो दिखाया जा रहा है, बल्कि आर्थिक एवं कूटनीतिक अनिवार्यता है। मास्को महत्वपूर्ण है। मास्को में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से वार्ता हुई। 16 महत्वपूर्ण रक्षा एवं परमाणु समझौते हुए। भारत को एस400 डिफेन्स सिस्टम मिलेगा या नहीं? खबर नहीं है, जिसे भारत चाहता है, लेकिन इतना तय है, कि रक्षा के क्षेत्र में आपसी सहयोग में विस्तार हुआ है। दोनों देशों के रिश्तों में चीन है।

पुतिन दुनिया को नयी दिशा देने में लगे हैं, और कह सकते हैं, कि वो मौजूदा दौर में निर्णायक होते जा रहे हैं। चीन उनके साथ है। भारत परम्परागत मित्र देश से कुछ ज्यादा है, जिसे चीन के विरूद्ध वाशिंगटन उपयोग करना चाहता है। काबुल अमेरिकी सैन्य हंस्तक्षेप के बाद सैनिक अड्डा है, आतंकवादी भी बनाये जाते हैं। पाकिस्तान के साथ भी कुछ ऐसा ही है। दोनों अमेरिकी मोहरे हैं। और पाकिस्तान अमेरिकी गिरफ्त से बाहर होने में लगा है। यहीं कोई पेंच है। कूटनीतिक पेंच।

पाकिस्तान में चीन की मौजूदगी लगातार बढ़ती जा रही है, वह पाकिस्तान का आर्थिक मददगार और सामरिक साझेदार बनता जा रहा है। यदि रूस, चीन और भारत की नीतियां -ब्रिक्स देशों की वार्ता के अलावा- वार्ता की एक ही मेज पर हो, और पाकिस्तान को अमेरिकी आतंकवाद के खिलाफ जोड़ा जा सके, तो एशिया में अमेरिकी मौजूदगी का स्वरूप बदल जायेगा। कई देशों की क्षेत्रीय अखण्डता सुनिश्चित हो जायेगी, वो अपने आपसी विवादों का हल निकाल लेंगे। भारत को इस बात को स्वीकार करना होगा कि रूस और चीन के बिना भारत महासंघ की स्थापना अभी संभव नहीं है।

इस यात्रा के बारे में चीन की प्रतिक्रिया बड़ी सकारात्मक है। उसके विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लू कांग ने कहा कि ‘‘चीन ने इस मुलाकात संबंधी खबरों पर गौर किया है और वह भारत-पाकिस्तान के संबंधों में हाल में हुई प्रगति का स्वागत करता है। भारत और पाकिस्तान का साझा पड़ोसी और दोस्त होने के नाते चीन यह देख कर खुश है। चीन हमेशा की तरह इसका समर्थन करेगा कि दोनों देश लगातार बातचीत के जरिये आपसी विश्वास बढ़ायें और साझा विकास को हासिल करें।’’

मोदी को ‘मेक इन इण्डिया‘ की जल्दी है। जिसमें रूस और चीन का निवेश हो तो बात बन सकती है। रूस तुर्की से बिगड़े अपने सम्बंधों की दिशा बदल चुका है। रूस के बाजार में तुर्की की जो स्थिति है, उसे देने का प्रस्ताव भारत के सामने है। दिल्ली यात्रा के दौरान रूस के उप-प्रधानमंत्री ने यह प्रस्ताव रखा था। विवादहीन रूप से मास्को में कुछ ऐसा हुआ है। जो क्षेत्रीय समिकरण बदल सकता है।

अफगानिस्तान में अमेरिका का विरोध है।

पाकिस्तान अमेरिकी चंगुल से बाहर निकलना चाहता है।

भारत में इसे भारत-पाक के रिश्ते से देखा जा रहा है, और बहस जारी है, कि मोदी ने ऐसा क्यों किया? पाकिस्तान यात्रा की जरूरत क्या थी?

पाकिस्तान की नीतियां भारत के विरोध पर टिकी हैं, जिसका हासिल उसके लिये कुछ भी नहीं है। उसकी अर्थव्यवस्था से लेकर क्षेत्रीय अखण्डता तक टूट गयी। वह अमेरिकी खेमे का आतंकी गुर्गा बन गया। यदि चीन के सहयोग और रूस की मौजूदगी से उसे संभलना है, तो भारत से रिश्तों का बेहतर होना जरूरी है।

अमेरिका इस क्षेत्र में सामरिक तनाव को जिस तरह बढ़ाना चाहता है, और चीन से उसके विवाद जिस ओर बढ़ रहे हैं, उससे भारत की तटस्थता का टूटना तय है। मोदी की नीतियां अमेरिकी खेमें की हैं, मगर भारत की अनिवार्यता रूस-चीन के साथ होने की है। पाकिस्तान का मसला जरूरी है। उसे हल होना ही है, ठीक उसी तरह जैसे औपनिवेशिक काल से लम्बित चीन के मसले को हल होना है।

यह हमारी सकारात्मक समझ का अनुमान है, जिसमें भारत का हित है, मोदी इसके विपरीत अमेरिकी नीति से भी संचालित हो सकते हैं।

बहरहाल उन्हें यह समझना ही होगा कि यह उनकी निजी यात्रा नहीं है, उन्हें देश और संसद को विश्वास में लेना ही होगा।

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