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वैश्विक अराजकता के बीच

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एकध्रुवी विश्व की अमेरिकी अवधारणा और उसकी नीतियां चकनाचूर हो गयी हैं। जिस नव उदारवादी वैश्वीकरण से वह पूरे विश्व को एक खेमे मे बदलना चाहता था, उसी नवउदारवादी वैश्वीकरण ने विश्व को दो खेमों में बांट दिया है। अब उसे इस बात की फिक्र हो रही है, कि ‘‘रूस पूर्व सोवियत संघ को वापस ला रहा है।‘‘ राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की विदेश नीति और वैश्विक स्तर पर रूस के बढ़ते महत्व ने अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों को आशंकित कर दिया है।

क्या पुतिन वास्तव में सोवियत संघ की पुर्नस्थापना कर सकते हैं?

उसे वापस लाना चाहते हैं?

क्या उसे वापस ला सकते हैं?

रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने ‘रसिया-1‘ चैनल से प्रसारित डाॅक्यूमेंट्री ‘वर्ल्ड आर्डर‘ में जो कहा, उस पर बातें करने से पहले यह बता देना जरूरी है, कि ‘‘यह संभव नहीं है।‘‘ ‘‘सोवियत संघ की पुर्नस्थापना संभव नहीं है।‘‘

न तो वैश्विक परिस्थितियां ऐसी हैं, ना ही उनकी सोच समाजवादी है।

मार्क्सवाद-लेनिनवाद से उनका वास्ता कभी रहा होगा, अब नहीं है।

मौजूदा रूस समाजवादी समाज व्यवस्था और समाजवादी विश्व का पक्षधर नहीं। वह गैर-अमेरिकी मुक्त व्यापार के नये क्षेत्र की रचना करने वाला ऐसा देश है, जो मुक्त बाजारवाद का पक्षधर और वैश्विक स्तर पर बहुध्रुवी विश्व की अवधारणा से संचालित हो रहा है। वह राजनीतिक रूप से अमेरिकी लोकतंत्र और आर्थिक रूप से अमेरिकी वर्चस्व और उसके साम्राज्यवादी सैन्य हंस्तक्षेप के विरूद्ध है। जिसमें चीन उसका प्रमुख साझेदार है, तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों का समर्थन उसे हासिल है। संभवतः अमेरिका और यूरोपीय देशों के लिये यही पूर्व सोवियत संघ की वापसी है, जिसके रहते विश्व का शक्ति संतुलन बना रहा और साम्राज्यवादी मनमानी के मुंह में लगाम कसी रही।

सोवियत संघ के पतन के साथ ही आधुनिक विश्व के पतन की शुरूआत हुई। उसके रहते ना तो इराक का पतन संभव था, ना ही लीबिया का ध्वंस। ना ही सीरिया पर सैन्य हंस्तक्षपे ना ही लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों में ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ को रोकने के लिये वेनेजुएला जैसी स्थितियां पैदा की जा सकतीं। सैनिक तख्तापलट और वैधानिक तख्तापलट की कोशिशों पर अंकुश लगा रहता। विश्व का बंटवारा, वैश्वीकरण की सोच नहीं होती।

आज विश्व बाजारवादी युद्ध के जिस मुहाने पर खड़ा है, वह नहीं होता। लेकिन यह सब हो चुका है, और इतिहास को बदला नहीं जा सकता। उसे दोहराने की कोशिश साम्राज्यवादी ताकतें सीरिया में कर रही हैं। जहां उन्हें रूस के सैन्य हस्तक्षेप की वजह से, लीबिया जैसी सफलता नहीं मिल सकी है। राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर तख्तापलट की कोशिश नाकाम हो चुकी है। वैसे, सीरिया पर अमेरिकी एवं उसके मित्र देशों के हमले जारी हैं, लेकिन सीरिया के संकट का समाधान वार्ताओं की ओर बढ़ चुका है। उसे इराक और लीबिया बनाने की उनकी नाकामियां इस बात का प्रमाण है, कि रूस के राष्ट्रपति पुतिन की नीतियां कारगर रही हैं। लेकिन क्षेत्रीय एवं विश्व युद्ध का खतरा बढ़ गया है।

वैश्विक वित्तीय ताकतें पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गयी हैं। जो अब विश्व की अर्थव्यवस्था को ही नहीं, उसकी राजनीतिक संरचना को भी अपने नियंत्रण में ले चुकी है। सच यह है, कि यदि आज रूस समाजवाद की ओर बढ़ना भी चाहे तो, चाह कर भी वह ऐसा नहीं कर सकेगा। आर्थिक नाकेबंदी और कूटनीतिक घेराबंदी का हथियार इन वित्तीय ताकतों के हाथ में है।

इसलिये शीतयुद्ध की तो वापसी हो गयी है, लेकिन सोवियत संघ की वापसी के सवाल का जवाब उन्होंने दिया- ‘‘हमारी ऐसी कोई कार्य योजना नहीं है।‘‘ लेकिन यूक्रेन के संकट के संदर्भ में पुतिन ने कहा- ‘‘मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूं कि हमारे पश्चिमी साथी यूक्रेन और पूर्व सोवियत संघ के अन्य क्षेत्रों के हितों में काम नहीं कर रहे हैं। वे सोवियत संघ को फिर से अस्तित्व में आने देना नहीं चाहते। वो उसे रोकने में लगे हैं।‘‘ उन्होंने मध्य-पूर्व एशिया और उत्तरी अफ्रीका में अमेरिका और पश्चिमी देशों के हस्तक्षेप को गलत करार देते हुए कहा- ‘‘अलग धर्म और अलग संस्कृति वाले लोगों पर पश्चिमी ताकतें अपनी तरह का लोकतंत्र थोपना चाहती हैं, यह गलत है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘वो सोचती हैं, कि वो गलती नहीं कर सकतीं, लेकिन गल्तियां होती हैं, और जब उसकी जिम्मेदारी लेने का समय आता है, वो गायब हो जाती हैं।‘‘

खुलेतौर पर रूस के राष्ट्रपति ने अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीतियों को गलत करार दिया। जिसकी वजह से क्षेत्री शांति एवं स्थिरता हमेशा खतरे में पड़ जाती है। आज विश्व इन्हीं खतरों से घिरा है।

सोच और समाज व्यवस्था के स्तर पर विश्व अराजकता के दौर से गुजर रहा है। हम वैश्विक अराजकता के बीच हैं।

पूंजीवाद, पूंजीवाद नहीं रह गया है।

समाजवाद के बारे में भी हम यही कहेंगे।

शीतयुद्ध की वापसी हो गयी है। समाजवाद का कोई खेमा नहीं है और संकटग्रस्त पूंजीवादी बाजारवाद अपनी समस्याओं का समाधान करने की स्थिति में नहीं है। इसके बाद भी वो समाजवादी विकल्प ही नहीं, गैर-अमेरिकी बाजारवाद के विकल्पों के भी खिलाफ है। दुनिया को एक बड़े युद्ध में झोंकने की तैयारी हो चुकी है। हम बच जायें तो, यह बड़ी बात होगी।

अघोषित रूप से राज्य और उनकी सरकारों का अंत हो गया है। वो मुक्त व्यापार के रचे बाजार के ऐसे कारिंदा हैं, जिनके हाथों में हथियार और वैधानिक अधिकार है, मगर वो अपने देश और दुनिया की आम जनता के हितों के विरूद्ध निजी कम्पनियों, काॅरपोरेशनों और उन वित्तीय इकाईयों के लिये काम कर रहे हैं, जिनके हाथों में वैश्विक अर्थव्यवस्था है। वो इतने बड़े हैं, कि उन्हें मात देना आसान नहीं। आने वाला कल इन्हीं के समर्थन और विरोध से तय होना है। आने वाले कल को तय करने का अधिकार उन ताकतों ने हासिल कर लिया है, जिनका आम जनता के हितों से कोई सरोकार नहीं है।

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