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दोस्त का नाम दोस्त ही था – निवेदिता भावसार

निवेदिता भावसार  फोटोएक कोई शहर था ,बड़ा ही खूबसूरत सा याद शहर नाम का। मेरे ख्वाबों के शहर से बहुत दूर था वो। वहां तक जाने में पूरी एक नींद लग जाती थी । जहाँ आँख खुलती वही वो शहर होता। याद शहर।

वहां मैं कई साल तक यादे बुनने का काम करती रही। सुबह से शाम तक। सूरज के आने से चाँद के आने तक। चाँद खूबसूरत सा चाँद। वहाँ रोज़ आता था । पूरा का पूरा।

जहां मैं यादे बुनती थी ना , वहीँ से कुछ दूर मेरा एक दोस्त रहा करता था।

दोस्त का नाम दोस्त ही था । उसने मुझे यही बताया था। उसके घर से ना चाँद का घर दिखाई देता था। मुझे और उसे चाँद की नज़्मे बहुत प्यारी लगती थी। हम दोनों बस उसे ही पढ़ा करते , सुना करते पूरी रात भर। एक दिन मैंने उसे कहा दोस्त अपन ना किसी दिन चाँद के घर चलेगे। चाँद बहुत बुड्ढा हो गया है। अगर किसी दिन मर गया तो। दोस्त हंस दिया। उसने उनींदी आँखों से हामी भर दी। एक दिन बातों बातों में दोस्त ने बताया उसने कई दफा इस आकाश को भी रंगा है। मेरे अन्दर का चित्रकार (जिसे लकीर भी खींचनी नहीं आती) अचानक मचल उठा। मैंने जिद की आकाश को रंगने की।

उसने मुझे सीढ़ियाँ दिखा दी। बोला खुद जाओ अकेले और रंग लो। मैं नहीं गयी। मुझे यादें बुननी थी । और फिर नींद भी तो नहीं खुली थी। उस रात एक बुनी हुई याद में दोस्त साथ था बड़ी देर तक। जब जागी तब तक सूरज निकल चुका था। वैसे मैंने दोस्त को बताया था के मुझे ये सूरज बहुत अच्छा लगता है। मैं उसमें डूबना चाहती हूँ। दोस्त हंस दिया था। उसे पता था वो सूरज सोने से बना है। और मैं मिटटी से।

मेरे देर तक जागने पर दोस्त बहुत गुस्सा करता था। दोस्त को मेरी बीमार आँखों की चिंता थी। और मुझे उसके माथे की सलवटों की।

याद शहर में कई सारी बुरी यादें भी रहा करती थी। जब भी मैं यादें बुनती वो अक्सर आढ़े आ जाती थी । तब दोस्त ही था जो उन्हें उधेड़कर अलग किया करता था मेरे दिल से।

मगर एक बुरी याद ऐसी जुड़ी के……

एक दिन दोस्त ने मेरी आँखों का एक बहुत ही बूढ़ा ख्वाब देख लिया। मैंने उसे बताया ये मेरे बचपन का ख्वाब है। दोस्त ने घबरा के पहली बार गौर से मेरी आँखें देखी , उनके नीचे के गहराते गड्ढे देखे, और उन गड्ढों में भंवर सी फिरती झुर्रियां।

दोस्त ने डर के आँखें भींच ली।

जब उसने आँखे खोली तो उसकी नज़र बदल चुकी थी। ऐसा लगा जैसे उसकी आँखें काली से मंझ्ररी हो गयी है। उसने मेरी सारी यादें टटोली। कहा फेंको इन्हें ये यादें आदतें बनती जा रही हैं। वो पुरानी यादें फेंक रहा था, मैं नयी यादें बुन रही थी।

नयी यादों में भी वो ही था, बस उनमे उसका नाम दोस्त नहीं।

-निवेदिता भावसार

परिचय :

जावरा पॉलिटेक्निक से इलेक्ट्रिकल विषय में डिप्लोमा व , साहित्य में रूचि होने के कारण हिंदी साहित्य में पार्ट टाइम एम.ए. भी किया है। फ़िलहाल कंस्ट्रक्शन कंपनी में कार्यरत । पढ़ने –लिखने में रूचि| ग़ज़लें पढ़ने का शौक । बशीर साब और दुष्यंतकुमार पसंदीदा शायर हैं।

संपर्क : निवेदिता भावसार
D/O श्री रमेश चन्द्र भावसार
C-१२/३८ L.I.G. ऋषिनगर उज्जैन (मध्यप्रदेश)

प्रस्तुति : नित्यानंद गायेन

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4 comments

  1. अवनींद्र

    वाह ,,निवेदिता जी ,,बहुत खूब ।

  2. आसलि दोस्रत वहि होत है जो समय पर कम आवे. एक जेीवन्त और भवस्तमक प्रस्तुति. तुलसि दस ने लिख है देीरज धरम् मित्र अरु नारि अपत कल परखिये ये चरि. एक सुन्दर क्रिति के लिय प्नह बधयि – अजय कुमर मिश्र

  3. KAHANI PRATEEKO KE MADHYAM SE BEHAD UMDA THI……………!

  4. इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
    नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है|

    एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों
    इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है|

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