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पूंजी जरूरत से ज्यादा शातीर है

150827331हमारे एक मित्र हैं- आदर्शों से भरे। जो मानते हैं, कि ‘‘यदि हम भले हैं, तो हमारा बुरा नहीं होगा।‘‘

वो भले की सोचते हैं और भले को जीते हैं। भलमनसाहत उनके भीतर कूट-कूट कर भरी है।

आज कल वो सदमे में हैं, और सदमा भी ऐसा कि जो हाथ हमेशा काम ढूंढ़ा करता था, वह उनके अपने ही गाल पर आराम कर रहा है। वो सोच रहे हैं। उन्हें झटका लगा है।

अपने गांव के विकास का जो खाका उन्होंने खींचा था, उस खाके को गहरी चोट लगी है।

वो उत्तर प्रदेश में हुए पंचायती चुनाव में सिर्फ इसलिये पड़े कि यदि गांव का प्रधान कोई भला आदमी बन गया, तो गांव का भी भला हो जायेगा।

उन्होंने बड़ी अच्छी बातें की। बड़ी दौड़-धूप की। दिन को दिन और रात को रात नहीं समझा। अपनी समझ को लोगों को समझाते रहे। गांव पहले से अपना था, उसे उन्होंने और भी अपना समझा। मगर समझ हमेशा समझदार नहीं होती। समझदारी दिखाने का जब समय आता है, तो समझ राह भटक जाती है।

कुछ ऐसा ही हुआ।

अपनों से भरे गांव में चंद लोग ही अपने हुए।

चुनाव में जातीय समिकरण का जादू-टोना-टोटका चला। भोज-भात, रूपये पैसे ने भी अपनी भूमिका निभायी। और भी न जाने क्या-क्या हुआ।

अंत में जो हुआ, वह उनकी आशा के विपरीत हुआ। मान-सम्मान को बट्टा लगा। जो हाथ काम से लगे रहते थे, वह गाल से जा सटे।

अब वो सोच रहे हैं। अपनी समझ को टटोल रहे हैं।

नाराजगी भी है।

मगर, भला होने का खयाल जहां था, वहीं है।

उनकी आदतें जैसी है, और जितना मैं उन्हें जानता हूं, वो अपने पांव के नीचे जमीन ढूंढ ही लेंगे।

आप को लग रहा होगा कि ‘‘मैं आपको कहानी सुनाना चाहता हूं या कहानी लिखने बैठा हूं।‘‘ लेकिन ऐसा नहीं है। कुछ तथ्य हैं- जिन्हें मैं साझा करना चाहता हूं, और यह भी कहना चाहता हूं कि आज समाज के लिये जीना आसान नहीं है। उसके लिये कुछ अच्छा करना आसान नहीं है। ऐसे लोगों को अपना और अपनों का विरोध सहना पड़ता है। हमारी सामाजिक संरचना ही ऐसी हो गयी है, कि कुछ भी अच्छा होने की संभावनायें रोज मरती हैं।

किसी भी अच्छे काम को, समाज के लिये अच्छे काम को पूंजी और हितों के तिकड़म से खराब किया जा सकता है।

जिस अच्छे काम के लिये हम अपनी जिंदगी खपाते हैं, और कह सकते हैं कि सफल रहे, उसे पूंजी से असफल बनाया जा सकता है। चुनाव कुछ लोगों के लिये राजनीतिक विकेंद्रीयकरण को जरिया बना कर, उसे पूंजी के द्वारा नियंत्रण में लिया जा सकता है। समाज में पूंजी की ताकत इतनी बढ़ा दी गयी है, कि उससे बड़ा निर्णायक अब कोई नहीं है।

लेकिन इसके खिलाफ लड़ा जा सकता है। इससे लोहा लिया जा सकता है। विचार एवं श्रम की पूर्नस्थापना, संभव है। लेकिन इससे पहले हम पूंजी से समाज को, विकास को, राजनीति और चुनाव को नियंत्रण में लेने की नजीर पेश करते हैं।

घटना केरल के पंचायत चुनाव की है।

‘किटेक्स समूह‘ ने एनौकुलम से 28 किलोमीटर दूर के गांव किजाक्कमबलम में दो साल में 28 करोड़ रूपये निवेश करके जनमत को अपने पक्ष में कर लिया। यह वही गांव है, जहां की पूर्व पंचायत ने उस औद्योगिक समूह को गांव की जमीन का अधिग्रहण करने नहीं दिया था।

इस औद्योगिक समूह ने उस गांव में पंचायत चुनाव में एक पैनल बनाया और चुनाव लड़ा। 19 में 17 सीटें वह जीता। भारत के इतिहास में पंचायत चुनाव में यह पहला काॅरपोरेट पैनल था। और अब यह पहला ग्राम पंचायत है, जिस पर काॅरपोरेट जगत का पूर्ण अधिकार है।

अब क्या होगा? इन पांच सालों में यह पंचायत क्या करेगी? अंदाजा लगाया जा सकता है। जो काम राष्ट्रीय स्तर पर मोदी की काॅरपोरेट सरकार बना कर किया जा रहा है, अब वही काम काॅरपोरेट पंचायत बना कर किया जायेगा।

कह सकते हैं कि चुनाव अब आम जनता के द्वारा निचले स्तर तक काॅरपोरेट की सरकार बनाने का जरिया बन गया है। भाजपा शिक्षा को आधार बना कर अपने शासित राज्यों में पंचायती राज अधिनियम में संशोधन कर रही है। हरियाणा में पंचायत राज (संशोधन) अधिनियम 2015 पारित हो चुका है। राजस्थान पहले से इस ओर बढ़ रहा है।

हमारे मित्र ने गांव मे ईंट भट्ठा लगाने का विरोध किया। गांव के सहयोग से विरोध सफल भी हुआ। दलाल से लेकर दगाबाजों को नाराजगी हुई। जिसने जमीन देने का सौदा किया था, खुश वह भी नहीं हुआ। जिसे ईंट का भट्ठा लगाना था, नाराजगी उसकी भी मिली। तमाम पैसे वालों और प्रभावशाली लोगों को बुरा लगा। ये वो लोग हैं, जो माहौल बनाते हैं।

वैसे वाहवाही भी मिली।

उन्होंने आंखों की जांच और चश्मे का निःशुल्क वितरण कराया।

बिजली-बत्ती का खयाल किया।

कम्प्यूटर शिक्षा का कार्यक्रम चलाया।

और भी कई काम किये।

गांव के साफ सफाई की पहल को मोदी जी का स्वच्छता अभियान ले उड़ा।

पंचायत चुनाव में मोदी और भाजपा विरोधी हवा थी। यह हवा ऐसी थी कि जिस जयापुर गांव को मोदी ने गोद लिया है, वहां भी भाजपा समर्थक उम्मीदवार हार गया।

हमारे मित्र भाजपा विरोधी हैं। मोदी जी सिर से लेकर पावं तक अस्वीकार्य हैं, मगर ग्रामीण समिकरण ऐसा बना कि वो पढ़े-लिखे, अपने को कुछ ज्यादा समझने वाला सामंती बना दिये गये। और जो होना नहीं था, वह हो गया। उनके समर्थित प्रत्याशी की हार सुनिश्चित होती चली गयी। चुनाव के नहर में पैसा बहा। उनकी जमीन पैसे के नहर से दूर थी। मौसम समझदारी शून्य हुई और जिसे रोकना था, उसे हराने के लिये किसी तीसरे को समर्थन दे दिया गया। जीत तो नहीं मिली मगर जीत वह भी नहीं सका जिसे हराना था, तीसरा जीत गया। राजनीति का ऊंट वहां जाकर बैठ गया जहां पहाड़ है।

अब ऊंट पहाड़ के नीचे हैं।

पूंजी की भूमिका बड़ी है।

इस समिकरण को बदलने का बस एक ही तरीका है, कि सामाजिक विकास योजनाओं को संगठित तरीके से लागू किया जाये। गांव के हर आदमी को संगठन से जोड़ा जाये। वर्गगत सामूहिक चेतना के साथ आर्थिक हितों के बीच तालमेल और निर्भरता हो। राजनीति की गंदी चाल को गैर राजनीतिक तरीके से मारने की राजनीति हो।

आज स्थितियां ऐसी बन गयी हैं, कि आप समाज में आते हैं तो राजनीति आपको करनी होगी, या कहिये राजनीति की दखल बर्दास्त करनी होगी, और राजनीति पर काॅरपोरेट की पकड़ बढ़ती जा रही है। जो आगे चल कर पूरी तरह उसके खेमे में होगी। यह होगा ही होगा। यदि समाज बाजार बनेगा, तो मानी हुई बात है, कि बाजार में खरीदी-बिक्री होगी। अवैध में कोई किसी का श्रम नहीं खरीदता, रोकड़ा चलता है।

आज आप किसी से भी पूछ लें- राजनीति हो या समाज सेवा, उनके लिये कारोबार है।

जब सब कुछ कारोबार है, तो आदर्शों पर कोई यकीन क्यों करेगा? और कैसे करेगा?

यह सोच ही गलत है, कि हम अपने को भला मानते हैं, तो लोग भी हमें भला ही मानेंगे।

अपने अनुभवों के साथ देश की काॅरपोरेट सरकार, उसके प्रचारतंत्र और केरल के पंचायत पर काॅरपोरेट के कब्जे को समझ कर पूंजी से टकराने का तरीका इजाद करे, तब बात बनेगी।

सामाजिक आदर्श को भीतर की जेब में रख कर उसे जिंदा रखें। दिल और दिमाग के करीब रखें। उसे हंथेली पर ले कर घूमने वालों को लोग अच्छा कह सकते हैं, मगर वो ऐसे लोगों का साथ कम देते हैं, जो अपनी ऊंचाई से दूसरों को बौना बनाते हैं।

मुद्दे की बात सिर्फ इतनी है, कि बाजार में कारोबार को देखें और समझें। पूंजी जरूरत से ज्यादा शातीर है।

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