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पंकज कुमार साह की पांच कविताएं

IMG_20151203_1943421. गुलाम खून

कल चौराहे पर
खून देखा
पता नहीं किसका था
ना तो नाम लिखा था
और ना ही जात
मैं चुपचाप चलता बना
अपने गंतव्य को
गाहे बगाहे
कौन उलझे इस खून से
वर्षों पहले
सुभाष जी उलझ पड़े थे
मांगे फिर रहे थे लोगों से खून
लेकिन खुद का खून
कहां बिखरा
किसी को पता नहीं
अब तक
बुद्धिजिवियों के शोध का विषय है
निष्कर्ष
हम आजाद हो गए
हिंद हिन्दुस्तान भारत हो गया
फौज
आज सीमाओं पर खड़े होकर
सर कटा रही है
सब कुछ ठीक हुआ बस
हमारा खून गुलाम हो गया
जब जिसने चाहा चूसा
मन भर जाने पर
हमारे मुंह पर थूका…

 

2. लकीरें

मैं
कविताएं नहीं लिखता
सिर्फ
लकीरें खींचता हूं,,
जो समानांतर होती हैं
सामाजिक उत्थान के
सिर्फ लकीरें,
जो बेरोजगार और बेरोजगारी के माथे पर
खींची होती है
उनके चेहरे पर उभरी सिकन को भी मैं
सिर्फ लकीरें ही बताता हूं
याद दिला दूं
ये वो लकीरें नही
जो किसी साँप के गुजरने के बाद बनी हो
किसी टाटा बिड़ला के हाथों पर बनी हो
किसी सहोदर के आंगन बीच खींची हो
ये लकीरें
सरहद पर डटे जवानों के हाथों का है
अंतड़ी में पेट सटाए मजदुरी करते हाथों का है
नित्य नए आयाम रचते हाथों का है…

 

3. चलो एक बार फिर

आज फिर
गंगा निढाल हो पड़ी है
चलो एक बार फिर
रौंद आएं उसे

चलो एक बार फिर
अपने साफ सुथरे तन को
धो आएं गंगा में
उस गंगा में
जिसके किनारे अभी अभी
एक जिन्दा लाश जलायी गई है
मल मूत्र
थूक खखार
बहायी गयी है

चलो अपने मन को
थोड़ा साफ कर आएं
निर्मल कर आएं
और
गंगा को थोडा़ और
दुषित कर आएं
और जाते जाते अंत में
गंगा मइया की जय
बोल आएं…

 

4. न्याय

बिना
किसी ठोस सबूत
और बिना
किसी गवाह के आधार पर
मुलजिम को
बाइज्जत बरी किया जाता है
इन पर लगाए गए
सभी आरोप बेबुनियाद हैं
दोषी थे वो
जो सो रहे थे फुटपाथ पर
पूरी गलती है उनकी
फुटपाथ पे भी कोई सोता है कहीं
सबूतों के आधार पर
साबित होता है कि अभियुक्त
नशा करना तो दूर
नशा शब्द तक से अनभिज्ञ हैं
दूर दूर तक कहीं कोई रिश्ता नहीं है
इनका नशा से
फुटपाथ पर सिर्फ कारें चला करती है
लोग सोया नहीं करते

 

5. कवि विद्रोही जी के लिए

आप चले गए तो क्या
किस माइ के लाल में
दम है जो आपके जैसा लिख ले

आपके कलम थमाने क्या होता है
किसकी विसात है जो
आपके विरासत को संभाल सके
अपने कंधों पर

आपके सिवा ना तो कोई धान उगा सकता है आसमान में
और न ही सो सकता है खेतों की मेड़ पर
आपके न होने पर भी
तमाचे जड़ते रहेंगे आपके शब्द
पान ठूंसे हुए गालों पर
आप सबके विद्रोही थे और रहेंगे
जब तक रहेगी
कविता
आप समाहित होते रहेंगे शब्द बनकर
नदी में आपके शब्द
अनवरत बहते रहेंगे
कलकल की आवाज के साथ

-पंकज कुमार साह

कवि परिचय :

नाम- पंकज कुमार साह
जन्म तिथि– 5 अक्टूबर 1987
शिक्षा– एम.ए. बी.एड
संप्रति– अध्यापन
पत्राचार-
रसिकपुर नागडीह
दुमका -814101
( झारखंड)

प्रस्तुति : नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. पंकज कुमार साह की सचाई बयां करती बहुत सुंदर कवितायेँ

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