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भारत- आतंकी हमलों में आयी तेजी का सबब

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आतंकवाद के खिलाफ एक लम्बी लड़ाई लड़ी जा रही है, जिसमें सरकारें आम जनता से अक्सर झूठ बोलती हैं। भारत की सरकार भी यही कर रही है। वह अपने राजनीतिक हितों के लिये ऐसी हरकत कर रही है, कि जो सही है, वह भी गलत होता जा रहा है।

पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमला हुआ।

और दूसरे दिन ही अफगानिस्तान में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर आतंकी कार्यवाही हुई।

महत्वपूर्ण बात यह है, कि भारत के खिलाफ आतंकी हमलों को विस्तार दिया गया।

यह विस्तार क्यों?

क्या इसकी वजह यह है, कि भारत ने आतंकवाद के खिलाफ तमाम संधि एवं समझौतों को अपना समर्थन दिया?

या इसकी वजह यह है, कि आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भारत अपनी दखल बढ़ा रहा है?

या भारत के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के बीच की अनौपचारिक वार्ता? जिसका प्रचार केंद्र की मोदी सरकार और भाजपा कर रही है। यह कह रही है, कि नरेंद्र मोदी ने चमत्कार कर दिया?

या भारत में साम्प्रदायिक तनाव एवं हिंसा को बढ़ाने के लिये यह साम्राज्यवादी साजिशें हैं?

यह देश केे अंदरूनी हालात को सख्त बनाने के लिये हिंदूवादी उग्र संगठनों के हाथों में तर्क सौंपना है? जिन्हें मोदी सरकार का खुला समर्थन प्राप्त है।

इन आतंकवादी हमलों से भारत की सुरक्षा का मामला तो जुड़ा ही है, लेकिन जिस खतरे की ओर हमारी नजरें नहीं जा रही हैं, वह खतरा छोटा नहीं है।

और यह खतरा है। इस खतरे के पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

जो बहस हो रही है-

वह है सुरक्षा में चूक! के आतंकवादी पठानकोट एयरबेस के भीतर कैसे पहुंच गये?

वह है सरकार के द्वारा लगातार बोला जाने वाला झूठ। कि ‘‘आॅपरेशन समाप्त हुआ‘‘ (गृहमंत्री) लेकिन आॅपरेशन जारी था। कि ‘‘हम आतंकवादियों को जिंदा पकड़ना चाहते थे‘‘ (वित्तमंत्री)। ऐसी ही ढेरों बातें। कई बे-बुनियाद बयान।

बहस बाहरी खतरों पर हो रही है।

जबकि देश की काॅरपोरेट सरकार फाॅसिस्ट ताकतों को पांव पसारने कि खुली छूट दे रही है।

संसद मजाक बन गया है।

सत्तारूढ़ राजनीतिक दल और विपक्ष गुनाह पर गुनाह किये जा रहे हैं। किसी को इस बात की फिक्र ही नहीं है, कि लोकतंत्र को तोड़ने में कोई किसी से कम नहीं है।

यदि बाहरी खतरों की बात करें तो आतंकवाद वह खतरा नहीं है, जो इस देश की सुरक्षा को तोड़ सके और मोदी सरकार के लिये खतरा बने। बाहरी खतरों को तो सरकार रेड़ काॅरपेट बिछा कर बुलावा पर बुलावा भेज रही है। विदेशी पूंजी निवेश के लिये अपने देश की अर्थव्यवस्था को सौंपने का पैगाम भेज रही है। इसलिये ऐसी सरकार के लिये आतंकवाद कोई खतरा नहीं है। इसके बाद भी आतंकी हमले हो रहे हैं।

यदि सरकार सुरक्षित है, और देश की सुरक्षा के लिये आतंकवादी निर्णायक खतरा नहीं बन सकते, तो इन हमलों में आयी तेजी और विस्तार की वजह क्या है? किसके फायदे के लिये यह हो रहे हैं?

यह तो नहीं कहा जा सकता, कि हमले बेवजह हो रहे हैं। पाकिस्तान सिर्फ रार लगा रहा है।

चीन का विदेश मंत्रालय और वहां की मीडिया यही कह रही है, कि भारत-पाक सम्बंधों में हो रहे सुधारों को, यह रोकने की कोशिश है। अमेरिकी एवं यूरोपीय मीडिया इन हमलों की निंदा कर रही है। भारतीय मीडिया जैसी बहस कर सकती थी, वैसी ही कर रही है। उग्रवादी सोच रखने वाले ‘‘घुस कर मारने‘‘ की अमेरिकी कार्यनीतियों की वकालत कर रहे हैं। मोदी सरकार अपने जीत का तमगा लगाने के लिये मोदी जी का सीना और चैड़ा कर रही है। नाकामी को कामयाबी बताने में लगी है। राजनीतिक बहस और बयान दो कौड़ी के हैं।

बुरी बात यह है, कि भारत पर हुए आतंकी हमलों के तार पाक से जुड़ जाते हैं। पाक के साथ मुसलमानों को जोड़ दिया जाता है। देश के भीतर उस तनाव को बढ़ाया जाता है, जिसे देश की आम जनता स्वीकार नहीं करती। धर्म और जाति पर आधारित संगठनों को मौका मिल जाता है। एकाधिकारवाद की राष्ट्रवादी जमीन तैयार हो जाती है। अपने देश के नागरिकों को उग्रवादी संगठन और सरकार फिरकों में बांटने लगती है। संघ से संचालित भाजपा और काॅरपोरेट से संचालित नरेंद्र मोदी हमारे सामने हैं।

यदि बाहरी खतरे और देश के भीतर की स्थितियों को आतंकी हमलों से जोड़ कर देखें तो दो बातें साफ नजर आने लगेंगी कि भारत को आतंकवाद विरोधी साम्राज्यवादी हमलों में शामिल होने की ओर धकेला जा रहा है, और बाजारवादी ताकतें अपने हितो के लिये, राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय तानाशाही की परिस्थितियां बना रही हैं। वैश्विक स्तर पर जिसका विस्तार रोज हो रहा है। आतंकी हमले फासिस्ट ताकतों को बढ़ाने की साजिशों में शामिल हैं।

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