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संघ के साथ वित्तीय साम्राज्यवाद

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केंद्र में मोदी सरकार के गठन के साथ ही भारत में काॅरपोरेट और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ताकत बढ़ गयी है।

काॅरपोरेट जगत वित्तीय तानाशाही के लिये, और

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ राजनीतिक तानाशाही की राहें, लोकतंत्र के ढांचे में, बनाने की शुरूआत कर दी हैं।

मोदी सरकार इन दोनों के लिये ‘एकाधिकारवादी लोकतंत्र‘ की ऐसी सूरत है, जिसका लक्ष्य दोनों का हित है।

एक समय था, जब इन दोनों की सूरत में समझौते की कोई राह नहीं थी, आज दोनों के समझौतों से मोदी की सूरत बनी है।

2006-07 की विश्वव्यापी मंदी ने यूरोप और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये तीसरी दुनिया के अबाध शोषण एवं दोहन को अनिवार्य बना दिया, वहीं इन देशों के गैर-पूंजीवादी समाजवादी एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था को तोड़ कर, छद्म लोकतंत्र के तहत फासीवाद की स्थापना को उन्होंने अपनी नीतियां बना ली। उन्होंने अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण को माध्यम बना कर फासीवादी ताकतों को बढ़ावा दिया। भारत में कांग्रेस की जगह भाजपा उनके सांचे में ज्यादा ढ़ली। जिसके पास घोर हिंदूवादी संगठन -संघ- का समर्थन था। जो आज भी राष्ट्रीयता के नाम पर उछल-कूद तो करते हैं, मगर वित्तीय पूंजी और राजनीतिक एकाधिकार के पक्ष में साथ-साथ होते हैं। इसलिये भाजपा के साथ संघ को बढ़ाना सोची-समझी नीति है।

जिस तरह भाजपा वित्तीय साम्राज्यवाद का प्रतिनिधित्व कर रहा है, संघ सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का भारतीय संस्करण है।

वर्तमान में संघ 45 से अधिक देशों में काम कर रहा है। इंदौर में आयोजित पांच दिवसीय ‘विश्व संघ शिविर‘ में 45 देशों के 750 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। जानकारी यह दी गयी कि हर पांच साल में संघ का अंतर्राष्ट्रीय विभाग ऐसे शिविर का आयोजन करता है। इस शिविर में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज यह जानने के लिये गयीं कि विदेश से आये प्रतिनिधियों को कोई कठिनाई तो नहीं हुई? यदि कठिनाईयां हैं, तो सरकार उनका समाधान करेगी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी हाजिर हुए। उन्होंने बंद कमरे में संघ सर संचालक मोहन भागवत और सरकार्यवाह सुरेश जोशी से लम्बी वार्ता की।

शिविर में भारतीय संस्कृति को हिंदू संस्कृति के रूप में रेखांकित किया गया। हिंदू आबादी का मुद्दा भी था। 2 जनवरी 2016 को समापन की पूर्व संध्या में मोहन भागवत ने कहा- ‘‘विश्व में भारत के संस्कार और संस्कृति को बढ़ाने की आवश्यकता है। संघ अपने स्वयं सेवकों के माध्यम से इस काम को बढ़ाने का काम करेगा।‘‘ वो मानते हैं, कि ‘‘विश्व को भारत के संस्कार एवं संस्कृति से ही सही दिशा मिल सकती है।‘‘ उन्होंने सुबह की शाखाओं के बढ़ने की जानकारी के साथ अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बारे में कहा- ‘‘मंदिर का निर्माण अवश्य होगा।‘‘

कुछ लोगों का अनुमान है, कि ‘‘मंदिर निर्माण का यह काम चंद महीनों में ही शुरू हो जायेगा।‘‘ वैसे भी यह भाजपा का खेला-खाया हुआ एजेण्डा है। संभव है, कि ‘‘मिशन 2017‘‘ -उत्तर प्रदेश का चुनाव- भाजपा इसी उन्माद को बढ़ा कर लड़े। यह ऐसा मुद्दा है, जिसे विस्फोटक बनाना बहुत ही आसान है। संघ भाजपा के चुनावी चुनौती का समाधान इस रूप में निकाल सकती है। राम मंदिर का निर्माण मोदी के सम्मोहन को बनाये रखने का जरिया बन सकता है।

संघ उदारवादी हिंदू और बुद्धिजीवियों के बीच भी अपनी सक्रियता बढ़ा रही है। 7 से 10 जनवरी 2016 को चार दिवसीय ‘अखिल भारतीय घोष शिविर‘ का आयोजन बंगलुरू में हो रहा है। जिसमें 2 हजार से ज्यादा स्वयं सेवक भाग लेंगे, जिसके समापन समारोह में इसरो के पूर्व प्रमुख डाॅ0 के0 राधाकृष्णन को भाग लेना है। 9-10 जनवरी को मोहन भागवत वहां उपस्थित रहेंगे।

3 जनवरी को पुणे के हिंजवड़ी में संघ का एक दिवसीय शिविर आयोजित हुआ। जिसमें अतिविशष्ठ 6 हजार लोगों को आमंत्रित किया गया था। जिसमें अन्ना हजारे जैसे लोगे भी थे।

संघ की सक्रियता का घोषित लक्ष्य हिंदू राष्ट्र का निर्माण है। दुनिया भर में ऐसी राष्ट्रीयता का विस्तार हुआ है। बाजारवादी वैश्वीकरण की यह अपनी विशेषता बन गयी है। यूरोप में ग्रीस के ‘गोल्डन डाॅन‘ जैसी फाॅसिस्ट इकाईयां बढ़ रही हैं, जो गैर यूरोपीय लोगों और शरणार्थियों पर हिंसक हमले कर रही हैं।अमेरिका में काले लोगों पर लगातार हमले हो रहे हैं। एशिया और अफ्रीका में ऐसी ही ताकतों को बढ़ाया जा रहा है। शिया और सुन्नी के अलावा इस्लाम को आतंकवाद का पर्याय बना दिया गया है। अल कायदा हो, आईएस हो या इनसे जुड़े अल नुसरा फ्रंट और बोको हरम जैसे संगठन सभी का मकसद ‘इस्लामिक स्टेट‘ की स्थापना है।

ऐसे फासीवादी संगठनों के अलग-अलग रूप और अलग-अलग राष्ट्रीय हित हैं, लेकिन उनकेे पीछे बाजारवादी वित्तीय ताकतें, और यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद है। यही कारण है, कि उनकी सोच एक हैं वो बाजारवादी अर्थव्यस्था और राजनीतिक एकाधिकारवाद के पक्ष में हैं। जहां उस देश की सरकारें उनके पक्ष में हैं, वहां उनका विस्तार तेजी से हो रहा है, और जहां उनके पक्ष की सरकारें नहीं हैं, वहां वो राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिये हिंसक वारदातें कर रहे हैं।

उग्र राष्ट्रवाद और आतंकवाद के बीच की विभाजन रेखायें मिट रही हैं।

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