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राष्ट्र धर्म की कार्य योजना

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साम्प्रदायिकता के खेल में संघ, भाजपा और सरकार एक साथ खेल रहे हैं। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण में

संघ की सूरत बिल्कुल साफ है।

भाजपा की सूरत सुब्रमण्यम स्वामी को मान लें, जिनके लिये काशी और मथुरा भी मुद्दा है।

सरकार की सूरत तो नरेंद्र मोदी हैं, मगर वो बोलते नहीं, बोलवाते हैं। और बोलने वालों की कोई कमी नहीं है।

संत समाज ऐश्वर्य और सत्ता के साथ सांसारिक हो गया है। वह इनके साथ, इनके बीच, इन सब का हंथियार है।

बाकी जो भी है, उनके बारे में कुछ नहीं कहना है। वो मात्र जरिया है। सत्ता, राजनीति और समाज का जरिया।

बढ़ती हुई असहिष्णुता के विरूद्ध सम्मान वापसी को सरकार ने जिस तरह बिहार चुनाव से जोड़ दिया, ठीक उसी तरह अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को उत्तर प्रदेश -2017 के- विधानसभा चुनाव से जोड़ा जा रहा है।

ऐसा नहीं है, यह हम नहीं कहेंगे। भाजपा के लिये मिशन 2017 का विशेष महत्व है। यह मोदी के सम्मोहन को बचाने और भाजपा के राजनीतिक पकड़ को बनाने की लड़ाई है, लेकिन मुद्दा इससे कहीं बड़ा है।

वास्तव में, यह राष्ट्र को धर्म बनाने की कार्य योजना है। राष्ट्र और धर्म को माध्यम बना कर ही फासीवादी उन्माद पैदा किया जाता है। धर्म पर आधारित राष्ट्रवादी ताकतें जब सत्तारूढ़ होती है, उनके लिये राष्ट्रधर्म का उन्माद ही हर समस्या का समाधान होता है। जिसे देख कर अलग से, गलत कुछ भी नजर नहीं आता, क्योंकि संस्कारों के माध्यम से धर्म हमारे घुट्टी में होता है, और अपनी मातृभूमि से प्यार करना स्वाभाविक है। लेकिन मुसीबतें तब खड़ी होती हैं, जब धर्म और राष्ट्र को एक बना दिया जाता है, और धर्म को एक सम्प्रदाय का चोला पहना कर मान लिया जाता है, कि जो हमारे धर्म और सम्प्रदाय का नहीं है, वह अराष्ट्रीय, राष्ट्रद्रोही है। और राष्ट्र धर्म को एकाधिकार के उन्माद में बदल दिया जाता है।

संघ ऐसे ही राष्ट्र धर्म को नमन कराता है।

भाजपा ऐसे ही राष्ट्र धर्म को मानती है।

सरकार के जुबान पर चाहे जितनी सहिष्णुता और मिठास हो, वह ऐसे ही राष्ट्र धर्म की पक्षधर है।

10 जनवरी को नरेंद्र मोदी वीडियो कांफ्रेन्सिंग केे जरिये मुम्बई से आयोजित ‘साहित्य सत्कार समारोह‘ को संबोधित करते हुए बोलते हैं- ‘‘सभी धर्मों से राष्ट्रधर्म ऊपर है।‘‘ उसी दिन भाजपा के नेता और अपने को चिंतक समझने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ट्वीट करते हैं- ‘‘हमें तीन मंदिर दे दो और 39,997 मस्जिदें रख लो।‘‘ उन्होंने मुसलमानों को भगवान कृष्ण के मंदिर निर्माण का आॅफर भी दे दिया। यह भी कह दिया कि ‘‘मुस्लिम नेता दुर्योधन नहीं बनेंगे।‘‘ 5 जनवरी को उन्होंने डीयू में यह भी कहा था, कि ‘‘हम तीन मंदिरों पर समझौता नहीं करेंगे।‘‘ उनके इस कार्यक्रम का विरोध दिल्ली यूनिव्हरसीटी के प्रगतिशली जनवादी विद्यार्थी संगठनों ने भी किया था।

भाजपा के लिये सिर्फ अयोध्या नहीं, काशी और मथुरा भी मुद्दा है। 39,997 मस्जिद वो मुसलमानों को कहां दे रहे हैं, या इसका क्या मतलब है? वो ही जानें। अपने दिमागी फितूर को वो ही अच्छी तरह समझेंगे। देश की आम जनता न तो मंदिरों की गिनती की, ना ही मस्जिदों का आंकड़ा रखती है। उसकी आस्थाओं को मंदिरों और मस्जिदों से जोड़ा जा रहा है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत मंदिर का निर्माण करने की बात पहले ही कर चुके हैं।

विश्व हिंदू परिषाद के अशोक सिंघल की अंतिम इच्छा भी यही बताई गयी। केंद्रिय मंत्री रविशंकर प्रसाद कहते हैं- ‘‘राम मंदिर हमारी पार्टी के घोषणां पत्र का हिस्सा है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। हमें फैसले का इंतजार करना चाहिये।‘‘ इस मामले पर समाज में आम सहमति की बात उन्होंने कही। सहमति बनाने का सबसे अच्छा तरीका इजाद किया गया कि ‘‘हम तो कहेंगे। आप सहमत हो जायें।‘‘ बेलगाम घोषणायें हो रही हैं। पत्थर तराशे जा रहे हैं। तारीखें भी घोषित हो रही हैं।

संत समाज काठ के कैसे पुतले हैं? यह बताने की जरूरत नहीं। वो क्या हासिल करना चाहते हैं? यह बाबा राम देव से समझा जा सकता है। जो योग सिखाते-सिखाते 1000 करोड़ की पूंजी के साथ अब उद्योगपति बन गये हैं। वैसे, अभी भी वह बाबा ही हैं। योग गुरू ही हैं।

फासीवाद के आधुनिक धर्म गुरू आप हिटलर को ही मानें, जो आज कल व्हाईट हाउस में है। जिनकी नकेल वैश्विक वित्तीय ताकतों के हाथ में है। उन ताकतों के हाथ में है, जो वित्तीय साम्राज्यवाद और नवउदारवादी वैश्वीकरण के जनक हैं। मुक्त व्यापार और बाजारवाद जिनका हथियार है। नरेंद्र मोदी हिटलर तो नहीं हैं, मगर उन्हीं वित्तीय ताकतों के सिपहसालार जरूर हैं, जो भारत में उदारवादी अर्थव्यवस्था को जरिया बना कर अपना साम्राज्य स्थापित कर रहे हैं। जो लोकतंत्र के ढांचे मे फासीवादी राजनीतिक समझ और वित्तीय तानाशाही का निर्माण कर रहे हैं। यही कारण है, कि भारत में उन्होंने चुनाव के जरिये सत्ता का अपहरा किया, और मोदी की काॅरपोरेट सरकार बनी।

यह सच खुलेआम है, कि फासीवाद ने आम जनता को आज तक दुख, तकलीफ, शोषण, दमन, युद्ध और महायुद्ध के अलावा और कुछ नहीं दिया। आज जिस उन्माद को भारत में राष्ट्रधर्म के रूप में पैदा किया जा रहा है, उसका भी अंत यही होना है। लेकिन वह अपने आप नहीं मरता।

स्वामीजी कहते हैं- ‘‘हर साल यहां चुनाव है‘‘, मतलब यह मुद्दा चुनावी नहीं है। मगर, इससे चुनावी वैतरणी भी पार की जाये तो बुरा क्या है? फिर जिन सपनों को बो कर सरकार बनी, उन मुद्दों को भटकाने के लिये धर्म और राष्ट्र से कारगर कोई शय नहीं है। मोदी सरकार के पांच साल का नक्शा बिल्कुल साफ है- वित्तीय ताकतों को खुली छूट, अर्थव्यवस्था का निजीकरण और लोकतंत्र के ढांचे में फासीवाद की स्थापना।

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