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वित्तीय ताकतों ने समाज व्यवस्था की सूरतें बदल दी हैं

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‘‘फाॅसिस्टवाद से हर मोर्चे पर लड़ने की जरूरत है, मगर हम कहीं भी खड़ा हो कर उससे लड़ नहीं सकते।‘‘

यदि आप भारत में हैं, तो यह सोचने की जरूरत भी पड़ेगी कि ‘‘वह मोर्चा कहां है? …है भी, या नहीं है? जहां से हम यह लड़ाई लड़ सकें?‘‘

हमारी सोच फाॅसिस्टवाद के बारे में, काफी कमजोर है।

आम जनता के बीच इसकी समझ ही नहीं है। बड़ी सहजता से मान लिया गया है, कि यह कम्युनिस्टों की सोच है। ये उन्हीं के शब्द हैं। वो ही इससे लड़ें। वो ही समझें कि उन्हें क्या करना है?

जिनकी तादाद बहुत ही कम है।

प्रचारित सच यह भी है, कि ‘‘भारत में दास प्रथा की तरह फाॅसिस्टवाद भी नहीं है।‘‘ लोग यह भी मानते हैं, कि यूरोप की तरह भारत में फाॅसिस्ट तानाशाही की स्थापना नहीं की जा सकती।

ऐतिहासिक रूप से शायद यह सच भी है। गणों की व्यवस्था से लेकर विशाल साम्राज्य की व्यवस्था तक, और ब्रिटिश उपनिवेश से लेकर अब तक यूरोपीय फाॅसिस्टवाद का जन्म यहां नहीं हुआ। औपनिवेेशिक दमन और दासता को, इस दायरे से बाहर रख कर देखा जाता है।

गांधी को मानने का मतलब, भगत सिंह को बाहर का रास्ता दिखाना हो गया है। औपनिवेशिक शोषण और साम्राज्यवादी वित्तीय तानाशाही की पोशाकें यहां बदली हुई हैं। यदि राजसत्ता की वर्दी पर स्वास्तिक का उल्टा निशान नहीं है, तो फाॅसिस्टवाद नहीं है। लोकतंत्र में अर्थव्यवस्था का निजीकरण उदारवादी अर्थव्यवस्था है। मुक्त व्यापार यहां आर्थिक विकास है, और पूंजी की तानाशाही का मतलब यहां शून्य है।

कुल मिला कर समझें तो, भारत में लोकतंत्र है, चुनी हुई सरकार है, फाॅसिस्टवाद यहां नहीं है। उसके होने की बात दिमागी फितूर है।

क्या वास्तव में ऐसा है?

यदि संविधान को पढ़ कर कहा जाये तो, कहना होगा कि भारत एक लोकतांत्रिक समाजवादी देश है।

यदि आम चुनावों के जरिये सरकार बनाने की संवैधानिक प्रक्रिया को हम देखें तो भारत में एक चुनी हुई सरकार है।

संसद है, संसद के दो सदन हैं, मंत्री मण्डल है, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति है। न्यायपालिका भी है।

संविधान में संशोधन के बाद भी, भारत में कभी समाजवाद नहीं रहा। संविधान में भी समाजवादी समाज व्यवस्था के निर्माण का लक्ष्य नहीं है। लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणां को धोखा दिया जा चुका है।

इस तरह, समाजवाद और लोक कल्याणकारी राज्य भारत में नहीं है। यह मान लें, मानने में कोई हर्ज नहीं है, फिर नहीं मानने से, जो नहीं है, वह तो होने से रहा।

होने को भारत में एक ऐसी सरकार है, जिसे देश की आम जनता ने चुना है। यह कितना जायज है, या कितना ना जायज? या कितना वैधानिक है और कितना अवैधानिक? यह बताने की जरूरत नहीं। मूल बात यह है, कि वह समाज के किस वर्ग के हितों से संचालित हो रही है? यह हम जानें।

आर्थिक रूप से वह बाजारवादी अर्थव्यवस्था की पक्षधर है। और राजनीतिक एकाधिकार उसका लक्ष्य है। इसी ‘पक्षधरता‘ और ‘लक्ष्य‘ ने भारतीय लोकतंत्र को संकटग्रस्त कर दिया है।

राजनीतिक वर्चस्व के लिये उसने धर्म, सम्प्रदाय और जाति को आधार बना लिया है। नस्ल की फाॅसिस्ट अवधारणायें भी साथ-साथ बढ़ रही हैं। ‘घर वापसी‘ और ‘भारतीय मुसलमानों का डीएनए एक है‘ जैसी बातों को यदि एक सीध में खड़ा कर ‘सभी धर्मों से बड़ा राष्ट्रधर्म‘ के सांचे में ढ़ाल दें, तो जो निष्कर्ष सामने आयेगा वह ‘मंदिरों के निर्माण‘ कार्यक्रम से कहीं बड़ा और घातक होगा। म्यांमार में राहिग्यांग मुसलमानों के संकट को यहां भी खड़ा किया जा सकता है। जिसने बौद्धों के अहिंसक होने को खूनी बना दिया है। जिसने 12वीं-14वीं सदी में वर्तमान बांग्लादेश और मूल भारत से जा बसे मुसलमानों को गैर-म्यांमारवासी बना दिया है।

भारत में इतिहास के एक बड़े काल खण्ड को खारिज करने की घिनौनी हरकतें रची जा रही हैं। उन्हें अंजाम दिया जा रहा है।

बाजारवादी ताकतों से मिल कर, भारत में फाॅसिस्टवाद की रफ्तार बढ़ गयी है। जिसका एक ही मतलब है, कि एकाधिकार केे करार पर आपसी भागिदारी पक्की हो गयी है। सरकार वित्तीय एकाधिकार के लिये निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों की सहयोगी है, और वित्तीय ताकतें, सकरार के राजनीतिक एकाधिकार के पक्ष में हैं। देश की आम जनता के लिये इन दोनों के बीच जीने की ऐसी स्थितियां हैं, जहां वह श्रम और मुनाफा का स्थायी स्त्रोत है। एकाधिकार भारत में वित्तीय तानाशाही और फाॅसिस्टवाद की नयी सूझ है, जो लोकतंत्र के ढांचे में सुरक्षित है। भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उससे जुड़े उसके सहयोगी संगठन और देश की मोदी सरकार यही कर रही है।

कुछ लोगों के लिये लोकतांत्रिक ढांचे का होना सरकार के गैर-फासिस्ट होने का प्रमाण है।

क्या वास्तव में ऐसा है?

सच यह है, कि फाॅसिस्टवाद ऐतिहासिक अनुभवों से सबक लेना सीख चुका है। वैश्विक वित्तीय ताकतों ने जान लिया है, कि लोकतंत्र का ढांचा उनके लिये सबसे सुरक्षित और कामगर खोल है। यही कारण है, कि वह इस सुरक्षा घेरे और खोल को तोड़ना नहीं चाहता। अभी वह उसे बनाये रखने का पक्षधर है। भारत में तो निश्चय ही। उसने सरकार बनाने के लिये आम चुनाव का उपयोग किया और एक ऐसे घोर दक्षिणपंथी राजनीतिक दल (और उससे जुड़े संगठनों) के हाथों में सत्ता सौंप दी जो उसके हितों के अनुकूल घोर राष्ट्रवादी है। धर्म और सम्प्रदाय पर आधारित राष्ट्रवाद का वह पक्षधर है।

फाॅसिस्टवाद को यदि आप उसकेे राजनीतिक ढांचे से समझना चाहेंगे, तो आप भी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय उन्हीं विश्लेषकों की कतार में अपने को पायेंगे, जो मानते हैं, कि ‘‘भारत में मोदी सरकार का सत्तारूढ़ होना और भगवा मुहीम का बढ़ना फासीवाद नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी दक्षिणपंथी सरकार है, जिसमें फासीवादी तत्व भी है।‘‘

कुछ ऐसे विश्लेषक भी है, जिनके लिये मौजूदा सरकार नवउदारवादी साम्राज्यवाद, उसके बाजारवादी वैश्वीकरण की पक्षधर है। नरेंद्र मोदी उन्हीं ताकतों की सूरत है।

ऐसे विश्लेषक वित्तीय तानाशाही के खतरे को सूंघ तो लेते हैं, मगर उन्हें फाॅसिस्टवाद की बू नहीं आती। और आती भी है, तो हल्की। वो 20वीं सदी के फाॅसिस्टवाद से मोदी सरकार की सूरत बना नहीं पाते और मान लेते हैं, कि यह एक ऐसी घोर दक्षिणपंथी सरकार है, जिसकी दिशा नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार है।

हम ऐसे विश्लेषकों से सिर्फ एक सवाल करना चाहते हैं, कि ‘‘यदि बाजारवादी ताकतों का हित दुनिया के किसी भी देश की सरकार की वजह से प्रभावित होता है, तो वो क्या करती हैं? वो उस देश की सरकार के साथ क्या करती हैं?‘‘

कोई भी जवाब देने से पहले आप तीसरी दुनिया के देशों पर एक नजर जरूर डाल लें। आप इराक-अफगानिस्तान को देख लें, लीबिया को देख लें, सीरिया को देख लें। अभी-अभी जो परिवर्तन वेनेजुएला में हुआ है, उसे देख लें। यह भी देख लें कि उन्होंने अमेरिकी लोकतंत्र को कैसे अपना पट्ठा बनाया? यूरोपीय संघ के माध्यम से पूरे महाद्वीप को अपने कब्जे में ले लिया।

सच तो यह है, कि परिभाषित सांचे में ढ़ली सूरतों से मिला कर के, अब किसी समाज व्यवस्था की पहचान नहीं की जा सकती है।

21वीं सदी में जिस तरह समाजवाद समाजवाद नहीं रह गया है, पूंजीवाद पूंजीवाद नहीं रह गया है, ठीक उसी तरह उसका सबसे खुंख्वार चेहरा फाॅसिस्टवाद भी अब फाॅसिस्टवाद नहीं रह गया है। वैश्विक वित्तीय ताकतों ने सभी समाज व्यवस्था, उसकी आंतरिक एवं बाह्य संरचना की सूरतें बदल दी है।

वैश्विक वित्तीय ताकतों ने इतनी निर्णायक बढ़त हासिल कर ली है, कि विश्व अर्थव्यवस्था पर ही नहीं, दुनिया भर की सरकारों पर भी उसकी पकड़ बढ़ गयी है।

सोच के स्तर पर आज भी मार्क्सवाद और उसकी समाजवादी अवधारणायें उसके निशाने पर हैं, लेकिन इन वित्तीय ताकतों ने पूंजीवादी लोकतंत्र को भी अपने निशाने पर ले लिया है। उसके लिये लोकतंत्र जन विरोधी सरकारों का मुखौटा बन गया है। जिसे अपनी सुविधा के अनुसार बनाने-बिगाड़ने का खेल चल रहा है।

भारत में यह खेल मोदी सरकार की सूरत है, जिसके पीछे वित्तीय पूंजी की तानाशाही और फाॅसिस्ट सूरत सुरक्षित है। जिससे कहीं भी खड़ा हो कर आप नहीं लड़ सकते। और यदि हम फाॅसिस्ट विरोधी मोर्चे की बात करें तो वह नहीं है। यहां-वहां टुकड़ों में बन और बिगड़ रही है।

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