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बनारस के भईया जी

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‘‘हां तो भईया जी, अब आप क्या करेंगे?‘‘

मैंने उनके सुगठित शरीर, पुष्ट जंघा और फड़कती हुई बाहों को देख कर पूछा।

भईया जी मोदी जी के परम भक्त हैं।

पहले ‘जय राम जी‘ बोलते थे,

फिर ‘जय हिंद‘ बोलने लगे,

फिर ‘नमस्कार‘ से काम चलाया

अब वो हाथ जोड़ कर अभिवादन के लिये ‘नमो-नमो‘ बोलते हैं। गले में रूद्राक्ष के साथ मोदी लाॅकेट है। बदन पर आधे आस्तीन का कुर्ता है। सुबह-शाम दाढ़ी को सफेदी देते हैं।

उन्होंने मन से मोदी जी को धारण किया और तन से समर्पित होने के लिये उसे खूब साधा, ताना, मुसदण्डों का साथ किया, लाठी-डण्डा-गोजी जो भी मिला उसे भांजा, उसे मजबूत बनाया कहीं भी भिड़ जाने के लायक बनाया।

मगर जब से मोदी जी ने ‘विकलांग‘ को ‘दिव्यांग‘ कहा है, वो खाट पर पड़े अपने अंगों को सुखाने में लगे हैं।

जिस शारीरिक सौष्ठव को दिखा कर भईया जी इतराते थे, अब उसे देख कर उनकी आंखें नम होने लगती हैं।

सोचते हैं- किसी सांड़ से भिड़ जायें। किसी कुवें में कूद जायें। किसी मशीन में हाथ डाल दें। क्या करें कि उनके अंग दिव्यांग हो जायें?

वो मोदी जी को ‘गीनीज बुक आॅफ वल्र्ड रिकार्ड‘ में शामिल होने वाला पीएम बनाना चाहते हैं। अपनी सक्रिय हिंस्सेदारी चाहते हैं। चाहते हैं, कि जैसे अब तक इतने बड़े-बड़े कारनामें किये, एक कारनामा और हो जाये।

उन्हें दिव्यांग बनने का सुर सवार है। अब तक सैंकड़ों अंग-भंग लोगों से मिल चुके। अपने भाग्य को कोस चुके।

उनकी समझ में नहीं आ रहा है, कि ‘गुरू यह क्या बोल गये?‘‘ जो है नहीं, या है तो सूखे कंगाल सा शरीर से लटक रहा है, भला वह दिव्यांग कैसे हुआ?

भईया जी परेशान हैं।

और शायद ऐसा पहली बार हुआ कि मोदी जी बनारस में अवतरित हुए, मगर भईया जी खाट पर पड़े रहे। अंगों को सुखाते रहे।

हमने पूछा- ‘‘भईया जी अब आप क्या करेंगे?‘‘

उनकी कातर आंखें जलने लगीं, अंग फड़कने लगे।

‘‘नमो-नमो, गुरू नमो-नमों।‘‘ वो रटने लगे।

गुरू दिल जीतने और रिकार्ड रचने में लगे हैं।

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