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क्या विशिष्ठ लोग ही गणतंत्र की खुशिया मनायेंगे?

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यदि ओबामा और ओलांदे आतंकवाद के खिलाफ खड़ा होने की बात करते हैं, तो यह सवाल अपने आप खड़ा हो जाता है, कि फिर आतंकवादी कौन है?

अल-कायदा और उससे जुड़े तमाम आतंकी संगठन? या

इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया(आईएसआईएस)?

जिनके खिलाफ अमेरिका आतंकवाद विरोधी अभियान चला रहा है। यूरोपीय संघ सहित फ्रांस छुटभैये की तरह काम कर रहा है। सउदी अरब और तुर्की जैसे देश हाथ बंटा रहे हैं।

ओबामा ने ओसामा को मार गिराया। जो उनकी अपनी उपलब्धी है, कि वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले का बदला उन्होंने ले लिया।

मगर ओसामा के बाद अल कायदा का क्या हुआ?

वह बढ़ा, उसे विस्तार मिला, कई सहयोगी आतंकी संगठनों का साथ मिला और सबसे बड़ी बात अमेरिका और यूरोपीय देशों का सहयोग मिलता रहा। और उसने अमेरिकी हितों के लिये काम करना जारी रखा। लीबिया में एक जनसमर्थक सरकार का तख्तापलट किया गया। अमेरिका समर्थक इन्हीं आतंकी संगठनों ने कर्नल गद्दाफी की हत्या कर दी।

विश्व समुदाय बेवकूफों की तरह देखता रहा और लीबिया में आतंकवादियों की सरकार बना दी गयी। टीएनसी की सरकार को यूरोप और अमेरिका का समर्थक मिला। आज वहां अराजकता और आतंक का साम्राज्य है। मिलिसियायी गुटों के बीच का संघर्ष है।

‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध‘ आतंकी गुटो के लिये अमेरिकी सरकार की अच्छी सौगात है।

इराक में भी यही हुआ था। यही हो रहा है।

सीरिया में भी यही किया गया। यही किया जा रहा है।

अल कायदा की जगह अब इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी हैं।

जिस सीरिया के संकट को खड़ा किया है, उसकी योजना भी फ्रांस में ही बनी।

जिस ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ के आतंक को दुनिया भर में बैठाया जा रहा है, उसने सीरिया में बशर-अल-असद को सत्ता से बेदखल करने की लड़ाईयां शुरू की। अलकायदा से जुड़े अल नुसरा फ्रंट को अमेरिका और यूरोप का समर्थन मिला वह सारा सहयोग वास्तव में आईएसआईएस के लिये था। इस्लामिक स्टेट ने ही पहले इराक और फिर सीरिया पर अमेरिका, यूरोप और उसके सहयोगी देशों के हवाई हमले को सुनिश्चित किया। जिसका मकसद इस्लामिक स्टेट के सफाया के नाम पर बशर-अल-असद को सत्त से बेदखल करना था। उन्हें कर्नल गद्दाफी की कतार में खड़ा करना था।

आतंकवाद के खिलाफ ऐसे युद्ध ओबामा बड़ी हसरत से लड़ रहे हैं।

भारत में आज जो आतंकी हमले हो रहे हैं। और आतंकवाद के खिलाफ होने की जैसी धूम मोदी सरकार बना रही है, वह अपने देश और अपने देश के आम लोगों को अपने सिकंजे में लेने की अमेरिकी कारगुजारियों के अलावा और कुछ नहीं। हमें सीसी टीवी कैमरे की निगरानी में जीने की आदत डलवायी जा रही है। हमारे निजी से निजी पलों पर सरकारी हंस्तक्षेप को सहने की आदत डाली जा रही है। बांह पकड़ कर होंट सिले जा रहे हैं। आतंकवाद के खिलाफ देश भर में ऐसी हवा बनायी जा रही है, कि देश की काॅरपोरेट सरकार के विरूद्ध बोलना, उसकी गलत नीतियों के खिलाफ खड़ा होना देश विरोधी होना हो। राष्ट्रद्रोह हो। और फिर आतंकवादियों से बड़ा राष्ट्रद्रोही कोई है ही नहीं। किसी को भी आतंकवादी बनाने की साजिशें रची जा रही हैं। ओबामा और ओलांदे मोदी के साथ हैं।

ओबामा गये साल गणतंत्र दिवस के खास मेहमान बने,

ओलांदे इस साल के खास मेहमान हैं।

इनके आने से पहले पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमला होता है। अफगानिस्तान में भारत के वाणिज्य दूतावास पर हमले होते हैं। हर हमले के तार जिस तरह पाकिस्तान से जुड़ते हैं और जिस तरह ओबामा और ओलांदे की प्रतिक्रियायें आती हैं, वह अलग कहानी है, बस इतना जान लें कि पाकिस्तान को भारत विरोधी बनाने और आतंकवाद का गढ़ बनाने वालों में अमेरिका का हाथ है। उसने ही पाकिस्तान को आतंकी देश बनाया।

पठानकोट एयरबेस पर हुए आतंकी हमले में राष्ट्रीय सुरक्षा की जो खामियां सामने आती हैं, और अब जैसी ‘अभूतपूर्व सुरक्षा‘ खड़ी की जा रही है, देश भर में जैसी निगरानियां बढ़ायी जा रही हैं, और दिल्ली में जैसी चैकसी दिखायी जा रही है, वह सिर्फ गणतंत्र दिवस में ओलांदे का होना नहीं है, बल्कि निगरानी और चैकसी की स्थायी व्यवस्था हो रही है।

निगरानी और चैकसी की ऐसी व्यवस्था से अक्सर आतंकवादी बच निकलते हैं, मगर देश की आम जनता स्थायी रूप से फंस जाती है।

भारतीय गणतंत्र दिवस पिछले साल से अभूतपूर्व सुरक्षा और निगरानी के विस्तार का पर्याय बन गया है। इसके राष्ट्रीय पर्व होने और आम जनता के शरीक होने पर सवाल खड़े हो गये हैं। ऐसा लग रहा है, जैसे गणतंत्र की खुशियों में ओबामा के ओलांदे का शामिल होेना ही विशेष महत्व रखता है, जिसकी अगली कड़ी इस्त्राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू होंगे। जिसके आतंकवाद विरोधी होने का सबसे अच्छा उदाहरण फिलिस्तीन है।

क्या भारतीय गणतंत्र की खुशियां सरकार के आतंक को बोने वाले देश और उनके राष्ट्रप्रमुख ही मनायेंगे? जिनके साथ विश्व काॅरपोरेट का हित जुड़ा है। क्या भारतीय गणतंत्र की खुशियां सुरक्षा घेरे में विशिष्ठ लोगों के लिये ही रह गयी हैं?

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