Home / साहित्य / कविता / बाज भी अब झुण्ड में है

बाज भी अब झुण्ड में है

url

कबूतरों के
पास भी कुछ है
प्रतिरोध
और प्रतिरक्षा के लिये
हमलावरों से
जान बचाने की तरकीबें हैं।

जिन्हें
रक्त, मांस की जरूरत नहीं,
ऊंची उड़ान और
घात लगा कर बैठी निगाहों से
नहीं जोड़ा उन्होंने अपना नाता,
उन्होंने अपने पंजों को पैने नहीं किये,
नहीं साधा
उन्होंने अपने डैनों को
बाजों पर झपटने के लिये।
वे उड़े एकसाथ झुण्ड में,
बहेलिया के बिछे जाल को मात दी,
बाज होना,
या बाजों की तरह जीना
उन्होंने कभी पसंद नहीं किया।

बाजों के बारे में
उनकी एकजुटता के किस्से नहीं,
उन्होंने, इस सच को छुपा कर रखा है।
नहीं देखा हमने
उन्हें एकसाथ उड़ते
हंसते, खेलते नहीं देखा।
मान लिया हमने कि ‘बाजों के लिये
कहीं कोई दूसरा बाज नहीं‘
वे सवा लाख पर अकेले ही भारी हैं।
वे ऊंची उड़ान भरते हैं,
खूनी खेल खेलते हैं,
कबूतरों के जान बचा कर निकलने की
तरकीबों पर हंसते हैं।
कहने को
कबूतरों के पास
प्रतिरोध और प्रतिरक्षा की तरकीबें हैं।

प्रतिरोध
और प्रतिरक्षा के लिये
हमलावर होने की जरूरत है
सोच कर देखें
कबूतरों के खिलाफ
बाज भी अब झुण्ड में हैं।

-आलोकवर्द्धन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top