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दावोस के लोग

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दावोस में ‘वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम‘ का वार्षिक सम्मेलन हुआ। जिसमें आर्थिक मानदण्डों को पूरो करने वाले दुनिया भर के चुने हुए अमीर, वैश्विक वित्तीय इकाईयों एवं बैंकों के प्रमुख, अपने क्षेत्र के विशेष लोग, मीडिया के गिने-चुने लोगों सहित, ज्यादातर देशों के राष्ट्रप्रमुख या उनके प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

यह हर साल होता है।

दावोस के लोग ही तय करते हैं, कि इस साल वो अपने लिये, इस दुनिया से क्या चाहते हैं? और कैसे चाहते हैं?

विश्व अर्थव्यवस्था और दुनिया भर की सरकारों को उन्होंने अपने नियंत्रण में ले लिया है।

इसके बाद भी आप पक्के तौर पर यह तय नहीं कर सकते कि वे कौन हैं? उनकी तादाद कितनी है? वे रहते कहां हैं? और उनकी ताकत कितनी है?

वे ऐसे लोग हैं, जिनकी सूरतें नहीं बनायी जा सकतीं।

वे राज्य, सरकार और बाजार की तरह हैं।

वे मुद्रा और पूंजी की तरह हैं।

वे विश्व को नियंत्रित करने वाली ऐसी व्यवस्था की तरह हैं, जहां अबाध शोषण, दमन और उत्पीड़न है। युद्ध, आतंक और सामाजिक अनिश्चयता है।

वे हमारे हिस्से की उस सम्पदा की तरह हैं, जिसे उन्होंने अपने कब्जे में ले लिया है।

दावोस में इस बात की चिंता व्यक्त की गयी, कि ‘‘विश्व में आर्थिक असमानतायें बढ़ी हैं। दुनिया की आधी सम्पत्ति 62 लोगों के हाथों में है।‘‘

दावोस में बैठे दुनिया भर के सर्वाधिक अमीर लोगों को तो यह मालूम है, कि ऐसा क्यों है? मगर क्या आम लोगों को धोखे में रखने वाली सरकारें यह बता सकती हैं, कि ऐसा क्यों है? जबकि तमाम विकास योजनाओं को, उसके लिये विकसित किये गये, कर्ज की नीति और बनाये गये तमाम वित्तीय इकाईयों का घोषित लक्ष्य आम जनता का विकास है।

क्या वो बताना चाहेंगी, कि नवउदारवादी वैश्वीकरण, अर्थव्यवस्था का निजीकरण, आर्थिक विकास के लिये वित्तीय पूंजी निवेश, मुक्त व्यापार और बाजारवाद की नीतियों से वो क्या कर रही हैं?

क्या वो यह बता सकती हैं, कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, उसकी संरचना, बैंकों से लेकर वित्तीय इकाईयों और रेटिंग एजेन्सियों से लेकर प्रचारतंत्र पर किसका अधिकार है? कौन है जो सरकारों की गिरेबां थाम कर रखती है, और उन्हें अपने तमाम जायज-नाजायज कामों को जायज बनाने के लिये सरकारों का इस्तेमाल करती है?

नहीं! सरकारें यह सब नहीं बतातीं।

यह सब गोपनीय है।

आम जनता से छुपाने की चीजें हैं। और वो इसे राष्ट्रीय हित में छुपा कर रखती है। और यदि यह राष्ट्रीय हित, वित्तीय ताकतों का हित नहीं है, तो फिर राष्ट्रीय हित क्या है? सरकारें यह भी नहीं बतातीं। जो बताती हैं, उन्हें जनसमर्थक सरकार समझा जाता है। उन पर आर्थिक हमले होते हैं, राजनीतिक अस्थिरता से लेकर उन पर सैन्य हस्तक्षेप होते हैं। कनईठी-कनचपड़ा की नीतियां होती हैं। और ये नीतियां अघोषित रूप से वही बनायी जाती है, जहां बैठ कर आर्थिक असमानताओं की फिक्र हो रही है। पर्यावरण की चिंता हो रही है। शांति और स्थिरता की बातें हो रही हैं। आर्थिक विकास को सुस्थिर किया जा रहा है। उस विकास को सुस्थिर किया जा रहा है, जिसका मकसद निजी वित्तीय पूंजी को बढ़ाना है। वर्चस्व को एकाधिकार में बदलना है। दुनिया भर के प्राकृतिक संसाधन और बाजार को अपने नियंत्रण में लेना है।

विश्व की कुल आबादी 7 बिलियन(खरब) है।

साढ़े तीन बिलियन लोगों के पास जो सम्पत्ति होनी चाहिये थी, उस पर मात्र 62 लोगों ने कब्जा जमा लिया है। यदि इन 62 लोगों की तादाद हम थोड़ी-थोड़ी बढ़ाते जायें तो हमें पता चलेगा कि 10 प्रतिशत लोगों के पास दुनिया की 90 प्रतिशत सम्पत्ति है। ये ऐसे लोग हैं, जो पिछले कई सदी से लगातार अपने से नीचे वालों को चूसते और खाते रहे हैं। इनकी भूख न तो घटती है, ना ही खत्म होती है। ये दूसरों के हिस्से की सम्पत्ति को खाते ही नहीं, उसे अपने पास जमा कर लेते हैं। कह सकते हैं, कि चैबीसों घण्टे, तीसों दिन, बारहों महीने, दशकों और सदियों से खाते और जमा करते लोगों ने एक ऐसी व्यवस्था विकसित कर ली है, जिसे देख कर हैरत होती है। यह सोचते नहीं बनता कि ऐसी व्यवस्था ही यदि मानव समाज के विकास की सर्वोच्च अवस्था है, तो पतन की सर्वोच्च अवस्था हम किसे कहें?

पेश रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी है, कि जिन 62 लोगों के पास दुनिया की आधी सम्पत्ति -लगभग 1.76 ट्रिलियन डाॅलर- है, उनकी सम्पत्ति में 2010 से 2015 के बीच 44 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, और दुनिया की आधी आबादी -लगभग साढ़े तीन बिलियन- लोगों की सम्पत्ति में 41 प्रतिशत की गिरावट आयी है। यह आंकड़ा अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि आधी आबादी की सम्पत्ति किन लोगों के कब्जे में है।

रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है, कि ‘‘विश्व के जिन सर्वाधिक अमीर लोगों के पास 1.76 ट्रिलियन  डाॅलर की सम्पत्ति है, उसे उन्होंने करों से बचत करने वाली व्यवस्था के जरिये हासिल किया है।‘‘ रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख भी है, कि ‘‘यदि इस सम्पत्ति पर उचित कर लगाया जाये तो, सरकारों को प्रतिवर्ष 190 अरब डाॅलर की प्राप्ति होगी।‘‘ यह धनराशि अपने आप में इतनी बड़ी है, कि कुपोषण से मरने वाले 40 लाख बच्चों को बचाया जा सकता है।

सीधे तौर पर यह बात कही जा सकती है, कि वैश्विक वित्तीय ताकतें विश्व की जनविरोधी सरकारों के साथ मिल कर 40 लाख बच्चों को हर साल मारती हैं। मगर दावोस के लोगों को और उनके द्वारा बनायी गयी सरकारों को भुखमरी की चिंता होती है, कुपोषण और गरीबी की चिंता होती है, लोगों के विकास की चिंता होती है, रोजी-रोजगार और पर्यावण की चिंता होती है, और इस सबसे बड़ी चिंता यह होती है, कि इसका फायदा कैसे उठाया जाये? दावोस कें लोगों ने वैश्विक संकट को पैदा करने, उसे सुनियोजित तरीके से बढ़ाने और फिर उससे मुनाफा कमाने का खेल सदियों से खेला है। ये वो लोग हैं, जिन्होंने पूंजी को राज्य की सरकारों के नियंत्रण से मुक्त कर या बड़ी छूटें हासिल कर, अपने को इतना बड़ा बना लिया है, कि अब वो अपने हितों के लिये देश और सरकारें बनाने लगी हैं। बाजार के जरिये दुनिया के हर चीज को बेचने और खरीदने लगी हैं। उन्होंने सामाजिक विकास की हर एक अवस्था को अपने पक्ष में खड़ा कर लिया है।

रिपोर्ट में कहा गया है, कि ‘‘बहुराष्ट्रीय कम्पनियां सरकारों के नियम और कानूनों में परिवर्तन करा कर मुनाफा कमाती हैं। दुनिया की 201 दैत्याकार कम्पनियों में से 188 कम्पनियां उन देशों से जुड़ी हैं, जहां कर सम्बंधि भारी छूट है, या इन कम्पनियों ने ऐसी छूटें हासिल कर ली हैं।‘‘

दावोस के लोगों ने माक्र्सवादी सोच और समाजवादी विश्व के खिलाफ ही साजिशें नहीं रची, बल्कि गैर-पूंजीवादी समाज व्यवस्था और अपने ही पूंजीवादी लोकतंत्र को असंदर्भित बना दिया है। आज दुनिया में ज्यादातर ऐसी सरकारें हैं, जिसे चुनती और बनाती तो उस देश की आम जनता है, लेकिन वो सरकारें वैश्विक वित्तीय ताकतों, निजी कम्पनियों एवं काॅरपोरेशनों के लिये काम करती हैं। साम्राज्यवादी सेना पर भी इन्होंने अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। दावोस के लोग दुनिया भर में बिखरे हैं।

सर्वाधिक अमीर लोगों में 31 अमीर संयुक्त राज्य अमेरिका में, 17 यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में, 14 चीन, ब्राजील, मेक्सिको, जापान और सउदी अरब में हैं।  इस बीच तीसरी दुनिया के देशों में भी बिलेनियर एवं मिलेनियरों की तादाद बढ़ी है।

इन वित्तीय ताकतों ने विश्व अर्थव्यस्था पर अपनी पकड़ बना ली है। दुनिया भर में जितने भी वैध एवं अवैध कारोबार हैं, यह इनके नियंत्रण में है। जिनती भी वित्तीय इकाईयां -राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक- हैं, वो इनके कब्जे में हैं। वाॅल स्ट्रीट से जुड़े बैंक, फेडरल, रिजर्व और तमाम सेण्ट्रल बैंकों पर इनका अधिकार है। दुनिया भर के मुद्रा में इनकी हिस्सेदारी है। मुद्रा बाजार पर इनका आधिपत्य है।

आज पूंजीवादी-साम्राज्यवाद के जिनती भी बनावटी संस्करण हैं, चाहे वह नवउदारवादी वैश्वीकरण हो, या मुक्त व्यापार सहित बाजारवाद इन्हीं की देन है।

शोषण, दमन, उत्पीड़न, युद्ध, आतंक और आर्थिक विकास के नाम पर वित्तीय साम्राज्य को इन्होंने ही खड़ा किया है। आज विश्व परिदृश्य के केंद्र में वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम है।

‘‘हम इतने बड़े हैं, कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता‘‘, यह इनकी सोच है। जो दिखती तो बे-सिर पैर की है, लेकिन गलत नहीं है। कम से कम आज की तारीख में तो गलत नहीं है। इन्होंने अपने वित्तीय संसाधन को घातक एवं विध्वंसक हथियारों में बदल लिया है।

इसके बाद भी सच यह है, कि विश्व की मौजूदा व्यवस्था संकटग्रस्त है। दावोस के लोग सामाजिक विकास और वैश्विक संरचना में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक ‘ब्लैक होल‘ में बदल गये हैं, जिसमें विस्फोट प्रकृति और इतिहास का नियम नियंत्रित सिद्धांत है।

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