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दलाल भी एक अच्छा लेखक हो सकता है?

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किसी को सिर के बल खड़ा करना, या उसे अपने पक्ष में, फिर से पांव के बल खड़ा करना, यदि लेखन है, तो हमें यह मान लेना चाहिये कि लेखन और दलाली में कोई खास फर्क नहीं है।

मैं तो कहूंगा- दलाल भी एक अच्छा लेखक हो सकता है।

मान-सम्मान भी उन्हें मिलता है, और उन्हें ही सिर पर चढ़ाया भी जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है, कि जो प्रतिष्ठित हैं, जिनके पास लेखक का मान-सम्मान है, वह दलाल हैं। सच बतायें तो यह तेजाबी, आम जनता ही करती है। कोई दलाल है या नहीं?

यह हमारी सोच और हमारी हरकतें ही बताती हैं।

यदि हम बार-बार पल्टी मारने वाले लोग हैं, तो मान लें कि हम दलाल हैं। दलाल नफा और नुक्सान देख कर चलता है।

बाजार में उसकी शाख होती है।

दिल और दिमाग में वारन बफे होता है।

वह अपने को बिलगेट दिखाता है, एक हाथ दे, दूसरे हाथ से ले। देने का प्रचार करें, और लेने पर चुप्पी साथ लें, या उसके लिये तर्क गांठ लें। ऐसा तर्क जिसे कुछ लोग मान लें, कुछ लोग न मानें। मान लेने वालों के साथ हों और जो न मानें, यह तो उनका नजरिया है। हमें जो सही लगा, उसे हमने किया। यह तो हमारी अपनी आजादी है।

लेखक को तो आजाद होना ही चाहिये।

यह भी तर्क है, कि गुलाम के पास आजादी की सोच होती है।

लेकिन गुलामी के खिलाफ खड़ा होने वाला आजाद होता है। उसे ही सामाजिक विसंगतियां नजर आती हैं। वही राजसत्ता के खिलाफ हंथियार उठाता है। और सोच से बड़ा कोई हथियार नहीं होता।

आप कैसे गुलाम हैं? यह आप ही तय करें।

सोच को मारने की लड़ाई चल रही है।

और इस लड़ाई में बाजारवादी ताकतों के साथ जन विरोधी सरकारें भी हमारे खिलाफ हैं।

वो लेखक को बाजार के लिये, दलाल बनाने में लगी हैं।

सुनते हैं, दलालों के पास, अपना कुछ नहीं होता।

जिसे वो बेचते हैं, वह भी उनका नहीं होता,

जिसे वो खरीदते हैं, वह भी उनका नहीं होता,

फिर भी, या कहें बेचने या बिकवाने, खरीदने या खरीदवाने में उन्हें जो मिलता है, वही उनका होता है- दलाली।

सम्मान को सरकारों ने दलाली बना दिया है।

जो सरकार के पक्ष में है, वो सम्मानित है,

जो सरकार के पक्ष में नहीं है, उसे सम्मानित करने का कोई मतलब नहीं है। उसके लिये उपेक्षा, उत्पीड़न है और उत्पाद बनने की बाजारपरक प्रेरणा है। कुछ ऐसा करने का प्रस्ताव है, कि वह भी चल निकले।

अब आप सोचिये कि आप जो लिखते हैं, वह उत्पाद है, या बाजार ने आपको ही अपने लिये उत्पाद बना लिया है?

यदि आपके कुछ कहने या करने से कहीं हलचल होती है, तो आप मान लें कि बाजार में कहीं कोई जगह आपकी है।

भारत में लेखक बस इस मामले में बेचारा है, कि उसको पढ़ने, जानने और पहचानने वालों की तादाद कम है। जो चूरन की पुडि़या बांध लेते हैं, उनको तो थोड़ी-बहुत जगह भी मिल जाती है, लेकिन जिनकी पुडि़या में कुनैन है, उन्हें अपने होने की बात खुद ही करनी पड़ती है। मुश्किल यह है, कि वो मुट्ठी की तरह बंधे भी नहीं हैं। देश और समाज और लोगों की फिक्र वो अपने ही बनाये मंच पर खड़ा हो कर करते हैं।

देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता की फिक्र उन्हें हुई और उन्होंने जो सम्मान हासिल किया था, उसे लौटा दिया।

लौटाने का निर्णय और तारीख उनकी अपनी थी।

सरकार की नाराजगी भी अपने तरीके की थी।

अपने पक्ष में खड़ा होने वालों को अपने तरीके से उसने गणतंत्र दिवस के दिन सम्मानित भी कर दिया।

कुछ लोग ऐसे भी निकल आये जिन्हें लगा साहित्य-सम्मान को अखाड़ा क्यों बनायें? समाज को जितना जीना था, हमने लेखन में जी लिया। और उन्होंने अपने पक्ष में, जिसे सिर के बल खड़ा कर दिया था, उसे अपने पांव के बल खड़ा कर दिया। और उन्हें पता ही नहीं चला कि वो अब सिर के बल खड़ा है।

जिन्होंने ऐसा नहीं किया है, उनसे बस इतना ही कहना है, कि जिनके लिये लिखते हैं, उनके बीच खड़े हों। मामला मुट्ठी भर लोगों का नहीं है। मुद्दों को आपस में जोड़ें। सरकार की सोच में, हम और आप नहीं बाजार है।

-आलोकवर्द्धन

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