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पिवोट टू एशिया के बाद पिवोट टू लैटिन अमेरिका – 1

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चार साल पहले ओबामा सरकार ने ‘पिवोट टू एशिया‘ की घोषणां की थी, जिसका मकसद चीन की सामरिक घेराबंदी और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में उसके विस्तार को रोकने के लिये उसकी वित्तीय नाकेबंदी थी, ताकि बिजिंग को वाशिंगटन के सामने घुटने टेकने के लिये विवश किया जा सके।

अपनी इस घोषणां को कारगर बनाने के लिये अमेरिका ने दक्षिण चीन सागर में अपनी सामरिक गतिविधियां तेज कर दी। चीन की दावेदारी वाले छोटे द्वीपों के काफी करीब तक अपने युद्धपोत पहुंचा दिये, उसके युद्धक विमानों ने गश्त लगायी। मीडिया चीन के खिलाफ एशियायी-पड़ोसी देशों को आशंकित करने वाली खबरें बनाती रही और इसी बीच जापान, फिलिपिन्स, वियतनाम और अन्य एशियायी देशों को चीन के विरूद्ध अपने विवादों को बढ़ाने के लिये अमेरिका बढ़ावा देता रहा।

इसी दौरान अमेरिका ने भारत को भी चीन केे विरूद्ध खड़ा करने के लिये कार्य नीतियों को लागू किया। सीमा विवाद को बढ़ाने और आर्थिक प्रतिद्वन्दिता को, दोनों देशों के बीच नये विवाद के रूप में प्रचारित किया।

‘पिवोट टू एशिया‘ को चीन ने कूटनीतिक मात दी। आर्थिक विकास और मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों का निर्माण करने के लिये, उसने विवादों को वार्ताओं की मेज पर हल करने की नीतियां तय की।

कह सकते हैं, कि अमेरिका को ‘पिवोट टू एशिया‘ से अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

चीन को एशियायी प्रतिद्वन्दी मानने की उसकी नीति भी गलत ही प्रमाणित हुई। अमेरिका चीन के वैश्विक विस्तार को जानते हुए भी, उसे क्षेत्रीय शक्ति ही प्रमाणित करने में लगा रहा, जबकि चीन की चुनौती वैश्विक थी। रूस के साथ उसके आर्थिक, सामरिक एवं कूटनीतिक सम्बंधों ने तेजी से विस्तार पा लिया। ब्रिक्स देश और शंघाई सहयोग संगठन ने भी एक वैकल्पिक व्यवस्था को विस्तार दिया। एशिया के अलावा अफ्रीका और लातिनी अमेरिकी महाद्वीप के देशों का चीन महत्वपूर्ण साझेदार बन गया। यूरोप और अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी चीन पर निर्भर होती चली गयी।

ओबामा सरकार को चीन के वैश्विक विस्तार को स्वीकार करने में काफी समय लग गया। अब भी ओबामा यही मान कर चल रहे हैं, कि ‘‘विश्व समुदाय अपनी समस्याओं के समाधान के लिये चीन या रूस की ओर नहीं संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर देखता है।‘‘ उन्होंने अपने आखिरी सम्बोधन में अमेरिकी लोगों को यही समझाने की कोशिश की।

पेंटागन ने हाल ही में अमेरिकी साम्राज्यवाद से अपने संघर्ष को विस्तार देने की मांग की है। ‘पिवोट टू एशिया‘ की तरह ही ‘पिवोट टू लैटिन अमेरिका‘के निशाने पर चीन है। पेंटागन ने स्पष्ट किया है, कि ‘‘चीन को पूर्वी प्रशांत क्षेत्र एवं यूरेशियायी क्षेत्र में ही नहीं, उसके वर्चस्व एवं आधिपत्य विस्तार को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर चुनौती देनी चहिये।‘‘ अमेरिकी सेना के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, कि ‘‘लातिनी अमेरिकी देशों में चीन के बढ़ते वर्चस्व को रोकने की नीति को, हमें वरियता देनी चाहिये।‘‘

पेंटागन के इस नजरिये की जानकारी ‘यूएस आर्मी वार काॅलेज‘ के जरनल -‘पैरामीटर्स‘ में प्रकाशित उस आर्टिकल से मिली, जिसका शीर्षक- ‘एक्सपेंडिंग द री-बैलेन्स – कन्फर्टिंग चाइना इन लैटिन अमेरिका‘ है। जिसके लेखक कर्नल डेनियल मार्गन हैं, जो कि वरिष्ठ सैन्य अधिकारी होने के साथ ही व्हाईट हाउस तक पहुंच रखते है।

अमेरिकी वाॅर काॅलेेज, पेंटागन के लिये सर्वोच्च सैन्य अधिकारी एवं कमाॅण्डर के निर्माण करने का काम करता है। यह ‘मिलिट्री थिंक टैंक‘ का भी काम करता है, जो अमेरिकी साम्राज्यवाद के विस्तार के लिये समर्पित है।

कर्नल मार्गन ने अपने आलेख में चेतावनी के लहजे में लिखा है, कि ‘‘चीन का लैटिन अमेरिका में विस्तार, हो सकता है कि एशिया में अमेरिका पुर्नसंतुलन से काफी बढ़ कर हो।‘‘

आलेख में कहा गया है, कि ‘‘चीन की शक्ति का उदय एशिया-प्रशांत और लातिनी अमेरिकी क्षेत्रों में अमेरिकी कार्यनीति के लिये चिंता का विषय है।‘‘ जिसे वाशिंगटन अपने लिये चुनौती ही नहीं अमेरिकी साम्राज्य के लिये खतरा मानती है। इस समय अमेरिका मध्य-पूर्व एशिया पर केंद्रित है। कर्नल मार्गन का मानना है, कि जिसकी वजह से प्रशांत क्षेत्र से लेकर लातिनी अमेरिकी देशों में राजनीतिक, आर्थिक एवं सामरिक विस्तार को चीन के लिए आसान बना दिया। नव वैश्विक वित्त व्यवस्था ने चीन और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के अन्य देशों के साथ उसके ग्रोथ और आपसी संबंधों के विकास की संभावनाओं के द्वार खाले दिये। जबकि ऐसे संबंधों के बीच पहले अमेरिका की उपस्थिति होती थी। कुछ देशों ने व्यापार और निवेश की शर्त पर चीन को बड़ी जगह दे दी, वह उनकी अर्थव्यवस्था और विकास के लिये जरूरी बन गया। साथ ही पेरू, चिली, कोलम्बिया, निकारागुआ और कोस्टारिका जैसे देशों की सरकारों ने भी हथियारों की बिक्री, सैन्य प्रशिक्षण और शैक्षणिक सहयोग के लिये चीन को अंतर्राष्ट्रीय रूप से राजनीतिक समर्थन का आश्वासन दिया। जिसके मूल में चीन के द्वारा इन देशों को दिया जाने वाला आर्थिक सहयोग की शर्त है।

यह विकास अमेरिकी कार्यनीति के लिये बड़ी चुनौती है। चीन की मौजूदगी विवादहीन रूप से एशिया-प्रशांत क्षेत्र एवं लातिनी अमेरिकी क्षेत्र में वाशिंगटन और बिजिंग के बीच तनाव एवं प्रतिस्पद्र्धा का अनिवार्य अंग है। जिसकी वजह से यह दो क्षेत्रों की अलग-अलग नहीं, बल्कि दोनों देशों की बीच की वैश्विक समस्या है। ओबामा सरकार इसे अब, खुले तौर पर चीन की वैश्विक चुनौती के रूप में स्वीकार करने लगी है।

मार्गन ने स्पष्ट चेतावनी दी है, कि ‘‘इस क्षेत्र में चीन के व्यापार एवं निवेश से ‘आर्थिक निर्भरता‘ का निर्माण हो रहा है, जो अमेरिका के प्रभाव एवं वर्चस्व को कमजोर कर रहा है। जिसकी वजह से आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक तनाव लगातार बढ़ रहा है।‘‘ वैसे यह तनाव अमेरिका की अपनी एकाधिकारवादी नीतियों की वजह से है।

एक से डेढ़ दशक के भीतर ही चीन लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों का दूसरा सबसे बड़ा निवेशक एवं व्यावसायिक देश बन गया है। जिसे वहां की सरकर ही नहीं, उन देशों की आम जनता का भी समर्थन प्राप्त है। चीन और लातिनी अमेरिकी देशों के बीच के व्यापार में 20 गुणा से ज्यादा की वृद्धि हुई है। साल 2000 में दोनों के बीच 12 बिलियन डाॅलर का व्यापार था, जो 2013 में बढ़ कर 289 बिलियन डाॅलर हो गया।

अमेरिका अभी भी लातिनी अमेरिकी देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार देश है, किंतु ब्राजील, चिली और पेरू में अमेरिका को हटा कर चीन पहले नम्बर का व्यापारिक साझेदार बन गया है।

चीन लातिनी अमेरिका में सबसे बड़ा कर्ज देने वाला देश बन गया है। उसने अर्जेन्टीना को 19 बिलियन डाॅलर, ब्राजील को 22 बिलियन डाॅलर, वेनेजुएला को 56.3 बिलियन डाॅलर, इक्वाडोर को 10.8 बिलियन डाॅलर और पेरू को 2.3 बिलियन डाॅलर का लोन दिया है।

2015 में चीन के राष्ट्रपति शि-जिनपिंग ने अगले एक दशक में लैटिन अमेरिका में 250 बिलियन डाॅलर के निवेश की घोषणा की थी। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में चीन के युआन और एशिया इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक में लातिनी अमेरिकी देश महत्वपूर्ण साझेदार हैं। किंतु इस बीच 2013 से चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट आने लगी है, जिसका गहरा प्रभाव लातिनी अमेरिकी देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। तेल, काॅपर, लोहा और सोया जैसे कच्चे मालों की कीमतों में आयी गिरावट ने ब्राजील, वेनेजुएला, अर्जेन्टीना और अन्य देशें में गंभीर राजनीतिक संकट को जन्म दिया है।

कर्नल माॅर्गन ने चीन के कर्ज, निवेश और व्यापार नीतियों की निंदा की है, उन्होंने कहा, कि ‘‘चीन की नीतियां अमेरिका विरोधी हैं। वह वेनेजुएला, बोलिविया, इक्वाडोर को मजबूत करती है।‘‘ उन्होंने अपने आलेख में स्पष्ट रूप से लिखा कि ‘‘चीन लातिनी अमेरिकी देशों में निवेश करके अमेरिका के पहुंच को रोक रहा है, और ऐसा वह वहां की सरकारों को आर्थिक सहयोग की वैकल्पिक व्यवस्था करके कर रहा है।‘‘ उन्होंने इस तथ्य का विशेष उल्लेख किया है, कि ‘‘2010 से इस क्षेत्र की सरकारों को आर्थिक सहयोग एवं कर्ज देने की घोषणां के साथ इस क्षेत्र के देशों को चीन के द्वारा दिया गया कर्ज एवं आर्थिक सहयोग विश्व बैंक, इण्टर अमेरिकन डव्लपमेंट बैंक और यूएस इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट बैंक के द्वारा दिये गये कुल कर्ज से ज्यादा हो गया है।‘‘ दूसरे शब्दों में कहें तो चिंता की बात यह है, कि चीन का कर्ज लातिनी अमेरिकी देशों में वाशिंगटन के हितों का गला घोंट रहा है। अमेरिका के द्वारा इन देशों को कर्ज दे कर, जिस तरह उन देशों की सरकारों से अपनी शर्त मनवाने और अमेरिकी हितों के लिये उन्हें कुचलने का जो तरीका उसके पास था, चीन उसे उसके इस अधिकार से वंचित कर रहा है।‘‘

अमेरिकी आर्मी वाॅर काॅलेज के मैगजिन -‘पैरामीटर्स‘ में प्रकाशित कर्नल मार्गन का यह आलेख लातिनी अमेरिकी देशों के बारे में अमेरिकी सेना और अमेरिकी सरकार की नीतियों का ऐसा खुलासा है, जिसे वही लिख और स्वीकार कर सकता है, जिसे अमेरिकी प्रशासन और अमेरिकी सेना में प्रशिक्षित किया गया हो, जो पेंटागन, सीआईए, एनएसए को वाॅल स्ट्रीट, फेडरल रिजर्व और व्हाईट हाउस को साम्राज्य विस्तार का जरिया मानता हो। जिसके लिये किसी दूसरे देश और महाद्वीप का शोषण और दमन सिर्फ इसलिये जायज है, कि यह समृद्धि और वर्चस्व के लिये जरूरी है। माॅर्गन की नाराजगी अमेरिकी सोच है। एक ऐसी कार्यनीति है, जिसने विश्व को संकटग्रस्त कर दिया है।

‘पिवोट टू लैटिन अमेरिका‘ सिर्फ चीन की चुनौती को लातिनी अमेरिकी देश में एशिया की तरह रोकना नहीं है, (जिसमें अब तक अमेरिका को उल्लेखनिय सफलता नहीं मिली है, भले ही ट्रांस-पैसेफिक पार्टनरशिप का निर्माण हो चुका है) बल्कि यह उस महाद्वीप और तीसरी दुनिया के देशों के अबाध शोषण, दमन और उन्हें अमेरिकी बाजार बनाने की और बनाये रखने की बेचैनी है।

हम नव उदारवादी वैश्वीरण और मुक्त व्यापार पर आधारित बाजारवादी अर्थव्यवस्था के पक्षधर नहीं हैं, जिसमें ‘उदार‘ और ‘मुक्त‘ कुछ भी नहीं, जो सरकारों को जन विरोधी बनाने, जन विरोधी सरकारों को बाजार का साझेदार बनाने और राज्य को बौना बनाने की साजिश है। जिसने सम्पूर्ण विश्व को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। चीन जिस मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना कर रहा है, वह रूस के साथ अमेरिकी मनमानी पर अंकुश है, इसलिये हम रूस और चीन के पक्ष में है। हमारी यह पक्षधरता बहुध्रुवी विश्व और जन समर्थक सरकारों की पक्षधरता की तात्कालिक अनिवार्यता है। वैकल्पिक व्यवस्था के निर्माण की अनिवार्यता है।

अमेरिकी सरकार और पेंटागन इस बदलाव के खिलाफ है। लातिनी अमेरिकी देशों में चीन के विरूद्ध उसकी सक्रियता बढ़ गयी है। वैधानिक तख्तापलट की नीतियों को अर्जेन्टीना के बाद वेनेजुएला में कार्यरूप में बदला जा रहा है, जहां साम्राज्यवादी सहयोग से प्रतिक्रियावादी ताकतें सरकारों को अपने कब्जे में लेती जा रही हैं। लातिनी अमेरिकी देशों में आर्थिक एवं राजनीतिक संतुलन बदल रहा है। इसे सामरिक आधार भी दिया जा रहा है।

क्रमशः- अगली किश्त भी

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